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उत्तराखंड से क्या कोई सबक सीखेगी कांग्रेस

कांग्रेस अपने घर को दुरुस्त करे ताकि इस तरह की नौबत ही नहीं आए।

उत्तराखंड से क्या कोई सबक सीखेगी कांग्रेस
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हिमालय के आंचल में बसे और देवभूमि कहे जाने वाले उत्तराखंड राज्य में सुप्रीम कोर्ट के ताजा फैसले के बाद भले ही फौरी तौर पर राजनीतिक और संवैधानिक संकट खत्म हो गया हो, परन्तु वहां कब तक शांति रहेगी, पक्के तौर पर कुछ कहा नहीं जा सकता। नवम्बर 2000 में अपने जन्म से लेकर अब तक यह राज्य राजनीतिक अस्थिरता का शिकार होता रहा है। झारखंड और छत्तीसगढ़ भी इसी के साथ बने थे। लंबे समय तक झारखंड में भी सरकारें बनती और बिगड़ती रहीं, जिसके चलते जितना विकास होना चाहिए था, वह नहीं हो सका। उत्तराखंड में 2002 से 2007 तक का पांच साल का नारायणत्त तिवारी के मुख्यमंत्री काल का समय छोड़ दें तो कोई और मुख्यमंत्री न तो अपना कार्यकाल पूरा कर पाया और न राज्य के विकास को वैसी गति देने में सफल रहा, जैसी इस पहाड़ी राज्य के लोगों को उम्मीदें थीं। सब जानते हैं कि उत्तराखंड को भी झारखंड की तरह लंबे आंदोलन के बाद अलग प्रदेश बनाया गया था।

लोगों को उम्मीद थी कि अलग राज्य बनने से उपेक्षा बंद होगी। विकास के द्वार खुलेंगे। संभावनाओं और अवसरों का आकाश खुलेगा। गरीबी, बेकारी, बेरोजगारी खत्म होगी। पहाड़ की जवानी का पलायन रुकेगा। वे अपने घर के आसपास ही रोजगार पा सकेंगे, परन्तु उत्तर प्रदेश से अलग होने का इस क्षेत्र को कोई विशेष लाभ नहीं मिला। पर्यटन तक को उस तरह बढ़ावा नहीं मिल सका, जैसी उम्मीद की जा रही थी। करीब साढ़े पंद्रह साल की इस छोटी सी अवधि में उत्तराखंड में सात मुख्यमंत्री बन चुके हैं। एनडी तिवारी के पांच साल निकाल दें तो कह सकते हैं कि दस साल की अवधि में छह मुख्यमंत्री बने हैं। उनके हिस्से में दो साल का कार्यकाल भी नहीं आ सका है। मार्च 2012 में जब कांग्रेस सत्ता में लौटी, तब कयास लगाए जा रहे थे कि हरीश रावत को कमान सौंपी जाएगी, परन्तु हेमवतीनंदन बहुगुणा के सुपुत्र विजय बहुगुणा को मुख्यमंत्री बनाने का फैसला कांग्रेस नेतृत्व ने ले लिया।
हरीश रावत ने इसके खिलाफ बगावती तेवर अपनाए। तब उन्हें मुश्किल से समझा बुझाकर मनाया गया। केदारनाथ हादसे के बाद बहाना बनाकर कांग्रेस नेतृत्व ने विजय बहुगुणा को 22 महीने के भीतर पद से हटा दिया। उनकी जगह हरीश रावत को मुख्यमंत्री बनाकर असंतुष्ट खेमे को शांत करने की कोशिश की गई, लेकिन नारायणदत्त तिवारी और विजय बहुगुणा के सर्मथकों ने भीतर ही भीतर हरीश रावत के खिलाफ जबरदस्त खेमेबंदी जारी रखी, जिसका नतीजा 18 मार्च को सामने आया, जब कांग्रेस के इन नौ विधायकों ने अपनी ही सरकार के खिलाफ विधानसभा में बगावत का बिगुल फूंक दिया। इन विद्रोहियों में खुद पूर्व मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा, सतपाल महाराज की पत्नी और वरिष्ठ नेता हरक सिंह रावत भी शामिल थे। यानी यह पूरी तरह से कांग्रेस के भीतरी असंतोष का मसला था, जिसे बाद में कांग्रेस बनाम भारतीय जनता पार्टी बना दिया गया।
जिस तरह कांग्रेस ने पिछले दो साल से राज्यसभा में मोदी सरकार की नाक में दम कर रखा है, बहुत संभव है कि भाजपा ने इस असंतोष को हवा दी हो और राजनीति के खेल में इसे आप पूरी तरह अनुचित भी नहीं कह सकते, परन्तु पहले अरुणाचल प्रदेश में बगावत हुई, जिसके फलस्वरूप वहां कांग्रेस सरकार का विघटन हुआ। इसके बाद उत्तराखंड में भी पार्टी के भीतर से बगावत हुई, जिसके चलते हरीश रावत सरकार का पतन हुआ। वहां खरीद फरोख्त की खबरों के बीच केन्द्र ने राष्ट्रपति शासन लगाने का फैसला किया। राष्ट्रपति शासन लगाना सही था या नहीं, इस पर अभी सुप्रीम कोर्ट से व्यवस्था आनी है, परन्तु उत्तराखंड की इस उठापटक से एक बात साफ हो गई है कि कांग्रेस के भीतर कुछ भी सही नहीं चल रहा है। अच्छा यही होगा कि केन्द्र पर अपनी सरकारों को अस्थिर करने के आरोप लगाने वाली कांग्रेस अपने घर को दुरुस्त करे ताकि इस तरह की नौबत ही नहीं आए।

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