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प्रमोद जोशी का लेख : कांग्रेस में असुरक्षा बोध क्यों

कुछ समझदार लोगों ने कहा है कि चीन का खतरा बहुत बड़ा है और राजनीतिक नेताओं को इसकी संजीदगी को समझना चाहिए। ऐसी बातें पुलवामा कांड और बालाकोट में की गई जवाबी कार्रवाई के बाद भी हुईं थीं। फिर 2019 के लोकसभा चुनाव के परिणाम सामने आने के बाद काफी देर तक विश्लेषण होता रहा कि कांग्रेस ने कहां पर गलती की। अब फिर कहा जा रहा है कि बीजेपी चीन के हमले का राजनीतिक लाभ बिहार के चुनाव में उठाना चाहती है।

प्रमोद जोशी का लेख : कांग्रेस में असुरक्षा बोध क्यों

प्रमोद जोशी

मंगलवार को हुई कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक में अध्यक्ष सोनिया गांधी ने सरकार पर निशाना साधा और सवाल पूछा कि चीन ने जिस जमीन पर कब्जा कर लिया है, उसे वापस कैसे लिया जाएगा? लगता है कि पार्टी ने चीन के साथ वर्तमान तनातनी को लेकर सरकार पर हमले करने की रणनीति तैयार की है। राहुल गांधी ने भी एक वीडियो जारी करके कहा है कि चीन ने लद्दाख के तीन इलाकों में घुसपैठ की है। चीनी घुसपैठ और 20 जवानों की शहादत को लेकर राहुल गांधी लगातार सरकार से तीखे सवाल कर रहे हैं। उन्होंने जापान टाइम्स के एक लेख को ट्वीट कर लिखा है, नरेंद्र मोदी असल में सरेंडर मोदी हैं।

पार्टी ने शुक्रवार को भारत-चीन सीमा पर शहीद हुए जवानों को श्रद्धांजलि देने के लिए शहीदों को सलाम दिवस मनाया। इस मौके पर सोनिया गांधी ने वीडियो संदेश के जरिए कहा, देश जानना चाहता है कि अगर चीन ने लद्दाख में हमारी सरजमीन पर कब्जा नहीं किया तो फिर हमारे 20 सैनिकों की शहादत क्यों और कैसे हुई? मनमोहन सिंह की टिप्पणी भी आई। कुछ फौजी अफसरों की टिप्पणियां भी सोशल मीडिया पर प्रकट हुईं, जिनमें सरकार से सवाल पूछे गए हैं। क्या ये टिप्पणियां अनायास थीं या किसी ने इशारा करके करवाई थीं?

इन हमलों पर बीजेपी ने भी जवाबी कार्रवाई की है। कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद ने कहा कि चीन ने राजीव गांधी फाउंडेशन को पैसे दिए थे। कांग्रेस बताए कि यह कैसा प्रेम है? इनके कार्यकाल में ही चीन ने हमारी जमीन पर कब्जा किया। कानूनन कोई भी पार्टी बिना सरकार की अनुमति के विदेश से पैसा नहीं ले सकती। कांग्रेस ने इस दान को लेने के पहले क्या सरकार से मंजूरी ली थी? इसी दौरान संघ के विचारक और बीजेपी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य शेषाद्रि चारी ने एक लेख में कहा है, लद्दाख गतिरोध पर प्रधानमंत्री की सर्वदलीय बैठक में भले ही एकजुटता का प्रदर्शन किया गया, लेकिन उसके बाद से भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस एक-दूसरे पर कीचड़ उछालने में व्यस्त हैं। दोनों ही खेमों के विचारशील लोगों को कड़वाहटों को भुलाकर न केवल मौजूदा संकट से पार पाने, बल्कि भविष्य में पेश आने वाली चुनौतियों से निपटने के लिए एकजुट होकर नई रणनीति बनानी चाहिए, खासकर यह देखते हुए कि चीन की फितरत बदलने वाली नहीं है। चीनी घुसपैठ के बावजूद हमारे फौजी कमांडर चीनी सेना से लगातार बातचीत कर रहे हैं। जरूरी नहीं कि बातचीत का परिणाम फौरन निकले। पर दूसरा रास्ता भी नहीं है। जहां तक जमीन पर कब्जे की बात है पूर्व विदेश सचिव और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार परिषद के तत्कालीन अध्यक्ष श्याम सरन ने सन 2013 में कहा था कि चीन ने 640 वर्ग किलोमीटर जमीन पर कब्जा कर लिया है। सरकार ने उनकी बात नहीं मानी। वजह यह है कि ऐसे नक्शे नहीं हैं, जिनसे पता लग सके कि वास्तविक नियंत्रण किसका कहां तक है। कांग्रेस पार्टी को इस बात की बेहतर जानकारी है कि यह मामला कितना जटिल है।

कुछ समझदार लोगों ने कहा है कि चीन का खतरा बहुत बड़ा है और राजनीतिक नेताओं को इसकी संजीदगी को समझना चाहिए। ऐसी बातें पुलवामा कांड और बालाकोट में की गई जवाबी कार्रवाई के बाद भी हुईं थीं। फिर 2019 के लोकसभा चुनाव के परिणाम सामने आने के बाद काफी देर तक विश्लेषण होता रहा कि कांग्रेस ने कहां पर गलती की। अब फिर कहा जा रहा है कि बीजेपी चीन के हमले का राजनीतिक लाभ बिहार के चुनाव में उठाना चाहती है। कहा गया है कि बिहार रेजिमेंट के जवानों की शहादत को बिहार के विधानसभा चुनाव को देखते हुए इस्तेमाल किया गया है। चीन-भारत विवाद का उपयोग बिहार चुनाव जीतने के लिए मोदी करना चाहते हैं।

क्या वास्तव में कांग्रेस को डर है कि जैसे पुलवामा एयर स्ट्राइक से मोदी सरकार को लोकसभा चुनाव में लाभ मिला, उसी तरह बिहार और फिर पश्चिम बंगाल, असम, तमिलनाडु और केरल सहित आने वाले चुनाव में उसे लाभ मिलेगा? यह असुरक्षा-बोध गलत है। गलवान में हुए संघर्ष के बाद जब भारत के 20 सैनिकों के वीरगति को प्राप्त करने की खबरें आईं, तबसे इस बात की चर्चा है कि चीनी कितने मरे? चीन ने इस मामले में चुप्पी साधी। बाद में यह स्वीकार किया कि उनके कमांडर की मौत हुई है और लोग भी मरे हैं।

दूसरे स्रोतों से खबरें हैं कि चीनी सेना के चार कैप्टन, मेजर और कर्नल सहित 40 से 55 तक सैनिक मारे गए हैं। शहीद हुए सैनिक बिहार रेजिमेंट से जुड़े थे। क्या इसके पीछे कोई साजिश थी? टकराव अभी खत्म नहीं हुआ है, पर यह बहस शुरू हो गई है कि क्या इस परिघटना का बिहार के चुनाव पर असर होगा? यह अनुचित है। कांग्रेस पार्टी को भी बालाकोट के बाद की अपनी रणनीति पर पुनर्विचार करना चाहिए। 14 फरवरी को पुलवामा कांड के फौरन बाद कांग्रेस पार्टी ने सरकार को अपने पूरे सहयोग का वादा किया था। सर्वदलीय बैठक के बाद पार्टी के सुर बदले। उसके बाद कांग्रेस नेता बीके हरिप्रसाद ने कहा कि पुलवामा आतंकी हमला प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और पाकिस्तानी प्रधानमंत्री इमरान खान के बीच मैच फिक्सिंग का नतीजा है। पार्टी ने इस बयान की सायास अनदेखी की और कहा कि यह उनकी व्यक्तिगत राय है। उसके बाद पार्टी प्रवक्ता रणदीप सिंह सुरजेवाला के ट्वीटों में कहा गया कि मोदी सरकार के रहते यह 18वां बड़ा आतंकी हमला है। मोदी सरकार का 56 इंची सीना इनका जवाब कब और कैसे देगा वगैरह। फौरी प्रतिक्रियाओं और बयानों की बात छोड़ दें तो जिस वक्त बीजेपी पुलवामा और बालाकोट के नाम पर जनता के बीच जा रही थी, उस वक्त कांग्रेस पार्टी आर्म्ड फोर्सेस स्पेशल पावर्स एक्ट को बदलने और भारतीय दंड संहिता की धारा 124ए यानी देशद्रोह के कानून को भी हटाने की बात कर

रही थी। यह बात उसके चुनाव घोषणापत्र का हिस्सा थीं। घूम-फिरकर वैसी ही बातें अब हो रही हैं। सीमा पर जो भी हो रहा है, वह देर तक और दूर तक देश पर असर डालेगा। उसे फिलहाल चुनाव की राजनीति से दूर रखना चाहिए। सही और गलत जनता देख रही है। उसे देखने दें।

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