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प्रमोद भार्गव का लेख : जासूसी पर सियासी संग्राम क्यों

भारत की स्थिर सरकार को अस्थिर करने के हथकंडे पश्चिमी मीडिया अपनाता रहा है। इसलिए उसने कथित पेगासस प्रोजेक्ट बम ऐसे समय पटका, जब संसद के मानसून सत्र की शुरूआत होनी थी। नतीजतन पिछले सात वर्ष से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार से मुंह की खा रहे विपक्ष को हंगामे का नया हथियार मिल गया। आईटी कानून के तहत भारत में कार्यरत कोई भी सोशल साइट या साइबर कंपनी यदि व्यक्ति विशेष या संस्था की कोई गोपनीय जानकारी जुटाना चाहती है तो केंद्र व राज्य सरकार से लिखित अनुमति लेना आवश्यक है। पर हंगामे के बीच सफाई कैसे दी जाए? शोर थमे तब सरकार का स्पष्टीकरण सामने आए?

प्रमोद भार्गव का लेख : जासूसी पर सियासी संग्राम क्यों
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प्रमोद भार्गव 

पेगासस फोन जासूसी विवाद संसद में राजनीति के संग्राम में बदल गया है। संसद के दोनों सदनों में विपक्ष के नेताओं, न्यायाधीशों और पत्रकारों समेत प्रमुख हस्तियों के फोन टैप कराए जाने का आरोप लगाते हुए समूचा विपक्ष नरेंद्र मोदी सरकार पर आक्रामक है। विपक्ष इस मुद्दे पर संसद में तत्काल चर्चा के साथ 'संयुक्त संसदीय समीति' से जासूसी प्रकरण की जांच कराने की मांग कर रहा है। वहीं सरकार इस पूरे मामले को ही निराधार बता रही है। राज्यसभा सांसद दिग्विजय सिंह ने ध्यानाकर्षण प्रस्ताव पर चर्चा के दौरान सवाल किया कि सरकार सिर्फ इतना स्पष्ट करे कि सरकार ने पेगासस स्पाईवेयर सॉफ्टवेयर की निर्माता कंपनी एनएसओ से कोई सौदा किया है अथवा नहीं ? इस प्रश्न के उत्तर में पूर्व सूचना एवं प्रौद्योगिकी मंत्री रविशंकर प्रसाद ने कहा कि 'देश में आतंकवाद या सुरक्षा के मसले पर यदि जांच एजेंसियां किसी की निगरानी करती है तो इसके लिए पूरी प्रक्रिया अपनाई जाती है।' यह उत्तर कुछ उस तर्ज पर दिया गया है, जिसमें महाभारत युद्ध के दौरान द्रोणाचार्य ने युधिष्ठिर से पूछा कि अश्वत्थामा की मृत्यु के बारे में सच बताओ ? तब युधिष्ठिर बोले 'अश्वत्थामा मारा गया, परंतु हाथी।' किंतु हाथी शब्द इतना धीमे स्वर में बोला कि उसे ठीक से सुनने से पहले द्रोणाचार्य अचेत होते चले गए। रविशंकर का बयान भी कुछ ऐसा ही रहस्यमयी है।

भारत की स्थिर सरकार को अस्थिर करने के हथकंडे पश्चिमी मीडिया अपनाता रहा है। इसलिए उसने कथित पेगासस प्रोजेक्ट बम ऐसे समय पटका, जब संसद के मानसून सत्र की शुरूआत होनी थी। नतीजतन पिछले सात वर्ष से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार से मुंह की खा रहे विपक्ष को हंगामे का नया हथियार मिल गया। डिजिटल सॉफ्टवेयर पेगासस के जरिए दुनिया की सरकारें अपने नागरिकों, विरोधियों या अन्य संदिग्धों की जासूसी करवाती रही हैं। यह नया कथित खुलासा 16 मीडिया संस्थानों ने मिलकर किया है। इसके नतीजे पश्चिम के प्रमुख अखबार 'द गार्जियन' और 'वाशिंगटन पोस्ट' समेत कई मीडिया पोर्टल पर जारी किए गए हैं। इनमें 40 भारतीयों के नाम हैं। प्रमुख लोगों में राहुल गांधी, ममता बनर्जी के भतीजे अभिषेक बनर्जी, चुनाव रणनीतिकार प्रशांत किशोर, पूर्व चुनाव आयुक्त अशोक लवासा, पूर्व सीजेआई रंजन गोगोई पर यौन उत्पीड़न का आरोप लगाने वाली महिला के साथ पांच भारतीय पत्रकार भी शामिल हैं। 'द वायर' ने भी यह सूची जारी की है। द वायर भारत सरकार के खिलाफ एजेंडा चलाती रही है। यदि वास्तव में इन हस्तियों के मोबाइल फोन टेप किए जा रहे थे, तो इसकी सच्चाई जानने के लिए इन लागों को अपने फोन फॉरेंसिक जांच के लिए एमनेस्टी इंटरनेशनल को देने होगंे। अब तक अकेले प्रशांत किशोर ने अपना मोबाइल जांच के लिए सौंपा है। यहां सवाल उठता है कि यदि अन्य लोग मोबाइल पर आपत्तिजनक कोई बात नहीं कर रहे थे, तब वे अपने फोन जांच के लिए क्यों नहीं दे रहे ? इस खुलासे से संसद से सड़क तक बेचैनी जरूर है, लेकिन इसके परिणाम किसी अंजाम तक पहुंचने वाले नहीं हैं ?

यह मुखबिरी पेगासस के माध्यम से भारत के लोगों पर ही नहीं 40 देशों के 50 हजार लोगों पर कराई जा रही थी। इस सॉफ्टवेयर की निर्माता कंपनी एनएसओ ने दावा किया है कि इसे वह अपराध और आतंकवाद से लड़ने के लिए केवल सरकारों को ही बेचती है। पूर्व आईटी मंत्री रविशंकर प्रसाद ने संसद में एनएसओ का पत्र लहराते हुए पूरे मामले को नकार दिया। तय है कि सरकार ने ऐसा कोई अनाधिकृत काम नहीं किया है, जो निंदनीय हो अथवा अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को बाधित करता हो। इसीलिए इस रहस्य का खुलासा करने वाली फ्रांस की कंपनी फारबिडन स्टोरीज और एमनेस्टी इंटरनेशनल ने ऐसे कोई तथ्य नहीं दिए हैं, जो फोन पर की बातचीत को प्रमाणित करते हों? गोया बिना साक्ष्यों के कथित खुलासा व्यर्थ है और हंगामा भी संसद में कीमती समय की बर्बादी है। अतएव सत्ताधारी दल पर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और लोकतंत्र की हत्या जैसे आरोप वेबुनियाद हैं।

एक तरफ भारत ही नहीं दुनिया की नीतियां ऐसी बनाई जा रही हैं कि नागरिक डिजिटल तकनीक का उपयोग करने के लिए बाध्य हो या फिर स्वेच्छा से करे। दूसरी तरफ सोशल साइट ऐसे ठिकाने हैं, जिन्हें व्यक्ति निजी जिज्ञासा पूर्ति के लिए उपयोग करता है। इस दौरान की गई बातचीत पेगासस सॉफ्टवेयर ही नहीं, कई ऐसे अन्य सॉफ्टवेयर भी हैं जो व्यक्ति की सभी गतिविधियों का क्लोन तैयार कर लेने में सक्षम हैं। इसकी खासियत है कि इसके प्रोग्राम को किसी स्मार्टफोन में डाल दिया जाए तो यह हैकर का काम करने लगता है। नतीजतन फोन में संग्रहित सामग्री आॅडियो, वीडियो, चित्र, लिखित सामग्री, ईमेल और व्यक्ति के लोकेशन तक की जानकारी पेगासस हासिल कर लेता है। इसकी विलक्षणता यह भी है कि यह एन्क्रिप्टेड संदेशों को भी पढ़ने लायक स्थिति में ला देता है। पेगासस स्पाईवेयर इजराइल की सर्विलांस फर्म एनएसओ ने तैयार किया है। पेगासस नाम का यह एक प्रकार का वायरस इतना खतरनाक व शाक्तिशाली है कि लक्षित व्यक्ति के मोबाइल में मिस्ड कॉल के जरिए प्रवेश कर जाता है। इसके बाद यह मोबाइल में मौजूद सभी डिवाइसों को एक तो सीज कर सकता है, दूसरे जिन हाथों के नियंत्रण में यह वायरस है, उनके मोबाइल स्क्रीन पर लक्षित व्यक्ति की सभी जानकरियां क्रमवार हस्तांरित होने लगती हैं। गोया, लक्षित व्यक्ति की कोई भी जानकारी सुरक्षित व गोपनीय नहीं रह जाती। यह वायरस इतना चालाक है कि निशाना बनाने वाले मोबाइल पर हमले के कोई निशान नहीं छोड़ता। कम से कम बैटरी, मेमौरी और डेटा की खपत करता है। यह महज एक सेल्फ-डिस्ट्रक्ट आॅप्शन (विनाशकारी विकल्प) के रूप में आता है, जिसे किसी भी समय इस्तेमाल किया जा सकता है।

वैसे पेगासस या इस जैसे सॉफ्टवेयर पहली बार चर्चा में नहीं हैं। देश के रक्षा संस्थानों की हनीट्रेप के जरिए जासूसी करने के भी अनेक मामले ऐसे ही सॉफ्टवेयरों से अंजाम तक पहुंचाए गए हैं। इजरायली प्रौद्योगिकी से वाट्सऐप में सेंध लगाकर 1400 भारतीय सामाजिक कार्यकताओं व पत्रकारों की बातचीत के डेटा हैक कर जासूसी का मामला भी 2019 में आम चुनाव के ठीक पहले सामने आया था। इसमें देश के 13 लाख क्रेडिट-डेबिट कार्ड का डेटा लीक कर हैकर्स आॅनलाइन बेच रहे थे। साफ है, इन डिजिटल महा-लुटेरों से निपटना आसान नहीं है। बावजूद यह शायद आम चुनाव के ठीक पहले मोदी सरकार की छवि खराब करने की दृष्टि से सामने लाया गया था। वैसे आइटी कानून के तहत भारत में कार्यरत कोई भी सोशल साइट या साइबर कंपनी यदि व्यक्ति विशेष या संस्था की कोई गोपनीय जानकारी जुटाना चाहती है तो केंद्र व राज्य सरकार से लिखित अनुमति लेना आवश्यक है।

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं, ये उनके अपने विचार हैं।)

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