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प्रमोद भार्गव का लेख : कृषि विधेयकों का विरोध क्यों

कृषि एवं किसान की हालत सुधारने वाले विधेयकों का विरोध व दुष्प्रचार समझ से परे है। दरअसल तीन माह पहले जब इन तीन विधेयकों को अध्यादेश के रूप में लाया गया था, तब संसद में लगभग सभी दलों ने इनका स्वागत किया था। अब जब इन्हें कानूनी रूप देने के लिए लोकसभा में पारित कराने के बाद राज्यसभा में प्रस्तुत करने की तैयारी हो रही है तो एकाएक घमासान मचना शुरू हो गया। खेती उन्नत होगी तो किसान संपन्न होगा और ग्रामीण अर्थव्यवस्था समृद्ध होगी।

प्रमोद भार्गव का लेख : कृषि विधेयकों का विरोध क्यों
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हरियाणा किसान

प्रमोद भार्गव

कृषि एवं किसान की हालत सुधारने वाले विधेयकों का विरोध व दुष्प्रचार समझ से परे है। दरअसल तीन माह पहले जब इन तीन विधेयकों को अध्यादेश के रूप में लाया गया था, तब संसद में लगभग सभी दलों ने इनका स्वागत किया था, लेकिन अब जब इन्हें कानूनी रूप देने के लिए लोकसभा में पारित कराने के बाद राज्यसभा में प्रस्तुत करने की तैयारी हो रही है तो एकाएक राजनीतिक गुल खिलना शुरू हो गए। सत्तारूढ़ राजग के भीतर ही घमासान मचना शुरू हो गया। भाजपा के सबसे पुराने सहयोगी शिरोमणि अकाली दल की सांसद और खाद्य प्रसंस्करण उद्योग मंत्री हरसिमरत कौर बादल ने तीनों विधेयकों को किसान विरोधी बताते हुए केंद्रीय मंत्रीमंडल से इस्तीफा दे दिया। आधुनिक खेती और अनाज उत्पादन का गढ़ माने जाने वाले हरियाणा-पंजाब में अन्नदाता आंदोलन पर उतारू हो गए। अनुबंध खेती और न्यूनतम समर्थन मूल्य पर आशंकाएं सामने आने लगीं।

दरअसल इन विधेयकों के माध्यम से सरकार दावा कर रही है कि किसान मंडियों, आढ़तियों और बिचैलियों से मुक्त हो जाएगा। औद्योगिक घरानों के पूंजीनिवेश और तकनीक समावेशन से पूरे देश में कृषि उत्पादकता बढ़ेगी। फिलहाल देश में केवल हरियाणा-पंजाब में गेंहू की उत्पदकता 55-60 क्िवंटल प्रति हेक्टेयर है, जो अंतरराष्ट्रीय कृषि उत्पादन दर से भी 13% ज्यादा है, जबकि अन्य राज्यों में यही उत्पादकता आधी है। गोया, मंडियों का वर्चस्व खत्म कर अनुबंध-खेती लाभदायी होगी। किसानों को पूरे देश में फसल बेचने की छूट रहेगी। इससे किसान वहां अपनी फसल बेचेगा, जहां उसे दाम ज्यादा मिलेंगे। भारत सरकार ने बाधा मुक्त खेती-किसानी के लिए कृषि उपज व्यापार और वाणिज्य (संवर्धन एवं सुविधा) अध्यादेश-2020, मूल्य आश्वासन और कृषि सेवा पर किसान (सशक्तीकरण और सुरक्षा) अनुबंध अध्यादेश-2020 और आवश्यक वस्तु संशोधन अध्यादेश-2020 को कानूनी दर्जा दे रही है। अभी तक किसान राज्य सरकार द्वारा अधिसूचित की गईं मंडियों में ही उपज बेचने को बाध्य थे। अब यह बाधा खत्म हो जाएगी। किसानों को अनुबंध खेती की सुविधा दी गई है। किसान अब कृषि-व्यापार से जुड़ी कंपनियों व थोक-व्यापारियों के साथ अपनी उपज की बिक्री का करार खेत में फसल बोने से पहले ही कर सकते हैं। मसलन किसान अपने खेत को एक निश्चित अवधि के लिए किराए पर देने को स्वतंत्र हैं।

ये कानून किसान को फसल के इलेक्ट्रोनिक व्यापार की अनुमति भी देते हैं। साथ ही निजी क्षेत्र के लोग, किसान उत्पादक संगठन या कृषि सहकारी समिति ऐसे उपाय कर सकते हैं, जिससे इन प्लेटफार्मों पर हुए सौदे में किसानों को उसी दिन या तीन दिन के भीतर धनराशि का भुगतान प्राप्त हो जाए। आवश्यक वस्तु अधिनियम को संशोधित करके अनाज, खाद्य, तेल, तिलहन, दालें, प्याज और आलू आदि को इस कानून से मुक्त कर दिया जाएगा। नतीजतन व्यापारी इन कृषि उत्पादों का जितना चाहे उतना भंडारण कर सकेंगे। इस सिलसिले में किसानों को अाशंका है कि व्यापारी उपज सस्ती दरों पर खरीदेंगे और फिर ऊंचे दामों पर ग्राहकों को बेचेंगे। हालांकि अभी भी व्यापारी इनका भंडारण करके नौकरशाही की मिलीभगत से कालाबाजारी करते हैं। इसे रोकने के लिए ही एसेंशियल कमोडिटी एक्ट बनाया गया है, लेकिन नौकरशाही इसे औजार बनाकर कदाचरण में लिप्त हो जाती है। यदि ये विधेयक राज्यसभा से पारित होने के बाद कानूनी रूप ले लेते हैं, तो भारतीय कृषि को नए युग में प्रवेश का रास्ता खुल जाएगा और किसान का आर्थिक रूप से तो संरक्षण होगा ही, खेती-किसानी का ढांचा भी सशक्त होगा।

इसके बावजूद किसान संगठन आशंका जता रहे हैं कि कानून के अस्तित्व में आने के बाद उपज न्यूनतम समर्थन मूल्य पर नहीं खरीदी जाएगी, क्योंकि विधेयक में इस बाबत कुछ भी स्पष्ट नहीं है। जबकि स्वयं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा है कि एमएसपी को नहीं हटाया जाएगा। मोदी के इस कथन को किसान जुबानी आश्वासन मान रहे हैं, क्योंकि एमएसपी पर फसल खरीद की गारंटी विधेयक नहीं देता है। अच्छा है, सरकार इस मुद्दे को विधेयक की इबारत में स्पष्ट कर दे। साथ ही यह भी तय होना चाहिए कि व्यापारी एमएसपी दर से नीचे फसल नहीं खरीद सकें। ये शंकाएं दूर हो जाती हैं तो किसान निश्चिंत हो जाएगा। विपक्ष का कहना है कि कंपनियां धीरे-धीरे मंडियों को अपने प्रभुत्व में ले लेंगी, मंडियों की श्रृंखला खत्म हो जाएगी और किसान कंपनियों की गिरफ्त में आकर आर्थिक शोषण के लिए विवश हो जाएंगे। यह आशंका इसलिए बेबुनियाद है, क्योंकि राज्यों के अधिनियम के अंतर्गत संचालित मंडियां भी राज्य सरकारों के अनुसार चलती रहेंगी। किसान को तो मंडी के अलावा फसल बेचने का एक नया रास्ता खुलेगा। साफ है, किसान अपनी मर्जी का मालिक बने रहने के साथ दलालों के जाल से मुक्त रहेगा। अपनी उपज को वह गांव में ही बेचने को स्वतंत्र रहेगा। अभी तक मंडी में फसल बेचने पर 8.5 फीसदी मंडी शुल्क लगता था, किंतु अब किसान सीधे व्यापारियों को फसल बेचता है तो उसे किसी प्रकार का कर नहीं देना होगा। नए कानून में तीन दिन के भीतर किसान को उपज का भुगतान करने की बाध्यकारी शर्त रखी गई है। साफ है, किसान को व्यापारी के धन-राशि के लिए चक्कर नहीं लगाने पड़ेंगे।

नरेंद्र मोदी सरकार अस्तित्व में आने के बाद से ही खेती-किसानी के प्रति चिंतित रही है। इस नजरिए से अपने पहले कार्यकाल में न्यूनतम समर्थन मूल्य में भारी वृद्धि की थी, इसी क्रम में प्रधानमंत्री अन्नदाता आय संरक्षण नीति लाई गई थी। तब इस योजना को अमल में लाने के लिए अंतरिम बजट में 75,000 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया था। इसके तहत दो हेक्टेयर या पांच एकड़ से कम भूमि वाले किसानों को हर साल तीन किश्तों में कुल 6000 रुपये देने शुरू किए थे। जाहिर है, किसान की आमदनी दोगुनी करने का बेहतर उपाय है।

केंद्र सरकार फिलहाल एमएसपी तय करने के तरीके में ए-2 फॉर्मूला अपनाती है। यानी फसल उपजाने की लागत में केवल बीज, खाद, सिंचाई और परिवार के श्रम का मूल्य जोड़ा जाता है। इसके अनुसार जो लागत बैठती है, उसमें 50 फीसदी धनराशि जोड़कर समर्थन मूल्य तय कर दिया जाता है। जबकि स्वामीनाथन आयोग की सिफारिश है कि इस उत्पादन लागत में कृषि भूमि का किराया भी जोड़ा जाए। इसके बाद सरकार द्वारा दी जाने वाली 50 प्रतिशत धनराशि जोड़कर समर्थन मूल्य सुनिश्चित किया जाना चाहिए। फसल का अंतरराष्ट्रीय भाव तय करने का मानक भी यही है। यदि भविष्य में ये मानक तय कर दिए जाते हैं तो किसान की खुशहाली और बढ़ जाएगी। एमएस स्वामीनाथन की अध्यक्षता वाले राष्ट्रीय आयोग ने भी वर्ष 2006 में यही युक्ति सुझाई थी। अब सरकार खेती-किसानी, डेयरी और मछली पालन से जुड़े लोगों के प्रति उदार दिखाई दे रही है, इससे लगता है कि भविष्य में किसानों को अपनी भूमि का किराया भी मिलने लग जाएगा। इन वृद्धियों से कृषि क्षेत्र की विकास दर में भी वृद्धि होने की उम्मीद बढ़ेगी। वैसे भी यदि देश की सकल घरेलू उत्पाद दर को दहाई अंक में ले जाना है तो कृषि क्षेत्र की विकास दर 4 प्रतिशत होनी चाहिए। खेती उन्नत होगी तो किसान संपन्न होगा और ग्रामीण अर्थव्यवस्था समृद्ध होगी। इसका लाभ देश की उद्योग आधारित अर्थव्यवस्था को भी मिलेगा।

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