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ओमकार चौधरी का लेख : तालिबान सरकार में देरी क्यों

अफगानिस्तान में कब्जे के बाद तालिबान सरकार के अस्तित्व में आने की बात की गई, लेकिन टल गई। उसके बाद शनिवार को ऐलान करने की बात आई परंतु वह भी नहीं हुआ और इसे सप्ताहभर के लिए फिर टाल दिया गया है। कहीं तालिबान गुटों के बीच पदों की बंदरबांट को लेकर नई जंग तो नहीं छिड़ गई है?ये चर्चाएं भी तेज़ हैं कि दो बार सरकार का गठन टाला गया है तो इसकी वजह पाकिस्तान ही है, जो चाहता है कि हक्कानी नेटवर्क को सरकार में अहम ज़िम्मेदारियां मिलें। रक्षा समेत जो मंत्रालय मांगे जा रहे हैं, उन पर मुल्ला गनी बरादर राज़ी नहीं हैं। ऐसा क्यों हुआ। सरकार के गठन में आख़िर क्या पेंच फंसा है।

ओमकार चौधरी  का लेख : तालिबान सरकार में देरी क्यों
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ओमकार चौधरी

ओमकार चौधरी

पहले कहा गया कि जुमे की नमाज़ के बाद अफगानिस्तान में तालिबान सरकार अस्तित्व में आ जाएगी। ऐसा नहीं हुआ। शनिवार को ऐलान करने की बात आई परंतु वह भी नहीं हुआ। सप्ताहभर के लिए इसे टाल दिया गया है। ऐसा क्यों हुआ। सरकार के गठन में आख़िर क्या पेंच फंसा है। कहीं तालिबान गुटों के बीच पदों की बंदरबांट को लेकर नई जंग तो नहीं छिड़ गई है? या समावेशी सरकार गठित करने के जो संकेत दिए जा रहे थे, उस पर सहमति नहीं बन पा रही। किसे सरकार का प्रधान बनाया जाए, इस पर तो दो राय नहीं हैं फिर माजरा क्या है। दुनियाभर से यह प्रश्न पूछे जाने लगे हैं। यह वैसे ही है, जैसे पूरा विश्व बड़ी बेसब्री से तालिबानियों के काबुल पहुंचने की बाट जोह रहा था। ठीक उस अंदाज में जैसे पिता बार-बार पूछता है कि बारात कहां तक पहुंची। इससे हास्यास्पद और आश्चर्यजनक कुछ नहीं हो सकता कि पाकिस्तानी सेना, आईएसआई, लश्कर, जैश, अलक़ायदा सहित कई दूसरे आतंकवादी संगठनों की मदद से तालिबान ने एक चुनी हुई सरकार का तख्ता पलट दिया और दुनिया तमाशबीन बनी रही। एक अच्छे-खासे खूबसूरत देश को कुछ ही दशकों में शक्तिशाली देशों के शग़ल ने बर्बाद करके रख दिया। अभी गनी सरकार की पार्थिव देह आंगन में पड़ी है और तालिबान से हक्कानी नेटवर्क तक अपने हिस्से के मांस के टुकड़ों के लिए गिद्धों की तरह लड़ रहे हैं। इससे अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि वहां कैसी सरकार बनने जा रही है।

यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि अभी काबुल में नई सरकार गठित भी नहीं हुई है, ऐसे में पाकिस्तान ख़ुफ़िया एजेंसी आईएसआई प्रमुख फैज हमीद काबुल पहुंचकर तालिबानी नेतृत्व से क्यों मिल रहे हैं। ये चर्चाएं तेज़ हैं कि दो बार सरकार का गठन टाला गया है तो इसकी वजह पाकिस्तान ही है, जो चाहता है कि हक्कानी नेटवर्क को सरकार में अहम ज़िम्मेदारियां मिलें। रक्षा समेत जो मंत्रालय मांगे जा रहे हैं, उन पर मुल्ला गनी बरादर राज़ी नहीं हैं। यहां तक ख़बरें आ रही हैं कि हक्कानी नेटवर्क और तालिबानियों के बीच बैठक में तीखी झड़पें हुई हैं। एक पूर्व सांसद ने दावा किया है कि सत्ता पर कब्जे के लिए होड़ छिड़ गई है। पाकिस्तान नहीं चाहता कि मुल्ला बरादर सरकार का नेतृत्व करें क्योंकि वह कराची में गिरफ्तारी के बाद कई साल तक पाकिस्तान की जेल में रखे गए थे, जिन्हें अमेरिका की दख्ाल के बाद 2018 में रिहा किया गया था। मुल्ला बरादर भारत के साथ अच्छे रिश्ते चाहते हैं। वह कश्मीर में दखलंदाजी के पक्ष में नहीं हैं। पाकिस्तान और हक्कानी नेटवर्क तालिबान सरकार बनने के बाद अफगानिस्तान में भारत की किसी भी तरह की भूमिका नहीं चाहता है। पाकिस्तान के पेट का पानी तब से ढीला होना शुरू हुआ है, जब तालिबान के प्रवक्ता ने साफ-साफ कह दिया कि कश्मीर भारत का अंदरूनी मामला है, हम इसमें हस्तक्षेप नहीं करेंगे। बाद में उसके रुख में हल्का सा बदलाव दिखाई दिया, जब कहा गया कि तालिबान को कश्मीर के मुसलमानों की आवाज़ उठाने का भी हक़ है। दरअसल, मुल्ला बरादर का भारत और कश्मीर के प्रति यह रुख पाकिस्तान को अखर रहा है और अब उसकी कोशिश हक्कानी नेटवर्क को अहम पद दिलाने की है ताकि मुल्ला बरादर को पीछे धकेला जा सके। फैज का दौरा यह दिखाता है कि पाक किस तरह नई सरकार के गठन में हस्तक्षेप करने की कोशिश कर रहा है।

भारत वहां की हर घटना पर बारीक नज़र रखे हुए है। वाशिंगटन में विदेश सचिव हर्षवर्द्धन श्रृंखला ने कल ही बयान देकर भारत के रुख़ को फिर से स्पष्ट किया है। इससे पहले विदेश मंत्री एस जयशंकर ने भी साफ किया था कि अफगानिस्तान की ज़मीन का इस्तेमाल हमारे खिलाफ किसी भी आतंकवादी गतिविधि के लिए नहीं होना चाहिए। दोहा में पिछले सप्ताह भारत के कतर में स्थित राजदूत दीपक मित्तल की तालिबान नेता शेर मोहम्मद अब्बास स्तनेकजई से मुलाकात के दौरान भी यही बात दोहराई गई थी। भारत की अभी भी अफगानिस्तान में सैंतीस परियोजनाएं जारी हैं, जिन पर करीब बीस हज़ार करोड़ रुपये खर्च होने हैं। तालिबान नेतृत्व अच्छे से जानता है कि देश चलाने के लिए उसे न केवल पाकिस्तान और चीन के अलावा दुनिया के दूसरे देशों की मदद की ज़रूरत होगी बल्कि भारत जैसे देश का उसके साथ खड़े रहना बेहद अहम होगा। इसकी एक वजह यह है कि अफगानिस्तान से हमारे सांस्कृतिक, राजनीतिक, कूटनीतिक, सामरिक रिश्ते रहे हैं और हर परिस्थिति में भारत वहां की जनता के साथ मज़बूती से खड़ा रहा है, जो पाकिस्तान को कभी रास नहीं आया। हामिद करजई का समय रहा हो अथवा अशरफ गनी का दौर, भारत ने बिना किसी लालच के अफगानियों की सहायता की। वहां की संसद के निर्माण से लेकर सलमा डैम, सड़कों आदि का निर्माण इसकी बानगी है। यह बात दुनियाभर के देश भी जानते समझते हैं। पाकिस्तान और चीन भारत की भूमिका वहां सीमित करना चाहते हैं। तालिबान का एक बड़ा वर्ग इस चालबाज़ी को समझ गया है, इसीलिए वह पाक की निगाहों में अखर रहा है।

पाकिस्तान तालिबान सरकार को अपने इशारों पर नचाने का जो मंसूबा पाले हुए था, उसे बड़ा झटका लगा है। उसने तहरीक-ए-तालिबान को नियंत्रित करने को कहा तो तालिबान नेतृत्व ने दो टूक जवाब दे दिया कि यह आपकी सिरदर्दी है, हमारी नहीं। आपको जो करना है, खुद करिए। जैश, लश्कर, अलक़ायदा को अमेरिका द्वारा छोड़े गए अत्याधुनिक हथियारों के साथ फिर से कश्मीर में भेजने का जो ख्वाब पाकिस्तान ने पाला है, उसे भी तालिबान के रुख से झटका लगा है। पाकिस्तानी सेना ने अफगानिस्तान से लौटे जैश, लश्कर के आतंकवादियों का पीओके में हीरो की तरह स्वागत किया है, ताकि उनमें नया जोश फूंका जा सके और कश्मीर की उसकी जो लड़ाई करीब सुप्तावस्था में पहुंच गई है, उसे फिर से जीवंत किया जा सके, परंतु तालिबान की कश्मीर को लेकर उदासीनता से वह परेशान हो उठा है। आईएसआई चीफ फैज हमीद का अचानक काबुल पहुंचना बताता है कि पाकिस्तान जीती हुई बाजी को हारना नहीं चाहता। उसे लग रहा है कि मुल्ला गनी बरादर के हाथों में यदि नई सरकार की कमान आ गई तो वह तीन में रहेगा न तेरह में। तालिबान की मदद के लिए उसने क्या कुछ नहीं किया। अमेरिका की आंखों में धूल झोंककर वह उससे मिलने वाले पैसे को भी तालिबान की भेंट चढ़ाता रहा। अमेरिकी सेना की वापसी शुरू हुई तो तालिबान की मदद के लिए उसने जैश, लश्कर और अलक़ायदा के करीब पंद्रह हज़ार आतंकवादी भी वहां भेज दिए। अब जंग सफल हुई तो जो चाहता था, वैसा होता हुआ दिखाई नहीं दे रहा है। उसे लगता है कि उसके मुकाबले चीन और भारत ज्यादा फायदे में दिख रहे हैं। भारत खामोश रहकर भी बड़ी कूटनीतिक विजय प्राप्त करने में कामयाब होता दिखाई दे रहा है।

(ये लेखक के अपने विचार हैं।)

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