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Editorial : टीके की कीमत राज्य व केंद्र के लिए अलग क्यों

एक देश एक विधान की वकालत करने वाली सरकार को चाहिए कि समूचे देश में टीके की कीमत एक होनी चाहिए। टीके के वितरण में भी सरकार जनता से सहयोग ले सकती है।

Editorial : टीके की कीमत राज्य व केंद्र के लिए अलग क्यों
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संपादकीय लेख

Haribhoomi Editorial : यूं तो केंद्र सरकार की मांग पर सीरम इंस्टीट्यूट ने कोरोना वैक्सीन कोवीशील्ड के दाम घटा कर राहत दी है, लेकिन फिर भी राज्यों को केंद्र के मुकाबले दोगुनी कीमत चुकानी होगी। कोविशील्ड बनाने वाली सीरम और कोवैक्सीन बनाने वाली भारत बायोटेक केंद्र सरकार को 150 रुपये में टीका उपलब्ध करा रही हैं, जबकि राज्यों को सीरम 300 में भारत बायोटेक 600 रुपये में वैक्सीन दे रही हैं। फिर सवाल है कि केंद्र किसके लिए टीका ले रही है, जब वैक्सीनेशन का दाम राज्यों को ही चुकाना है? अब तक के सभी वैक्सीनेशन ड्राइव केंद्र ने चलाए हैं तो कोविड टीकाकरण का महाभियान केंद्र सरकार को ही चलाना चाहिए।

टीकाकरण में निजी अस्पतालों को शामिल करना भी उचित नहीं है, जैसा कि कंपनियों ने निजी अस्पतालों के लिए राज्य सरकार से भी दोगुने रेट टीके के तय किए हैं। निजी क्षेत्र के साथ महंगा व्यवहार क्यों? टीकाकरण में तेजी लाना जरूरी है, देश के 70 फीसदी से अधिक आबादी को टीका लगना चाहिए। केंद्र व राज्य सरकारों ने लोगों को मुफ्त टीका देने की घोषणा की है। केंद्र को चाहिए कि वह टीका खरीद कर राज्यों को जरूरत के हिसाब से आपूर्ति करे। केंद्र व राज्य सरकार के लिए अलग-अलग रेट का कोई मतलब नहीं है। राज्य सरकार अगर केंद्र सरकार से दोगुने रेट पर टीका खरीद रही है तो अंतत: यह जनता के पैसे का ही नुकसान है। कोविड वैक्सीनेशन ड्राइव को केंद्र सरकार को ही अपने नियंत्रण में चलाना चाहिए। देश में वैक्सीन की कीमत में यूनिफॉर्मिटी होनी चाहिए।

एक देश एक विधान की वकालत करने वाली सरकार को चाहिए कि समूचे देश में टीके की कीमत एक होनी चाहिए। टीके के वितरण में भी सरकार जनता से सहयोग ले सकती है। केवल बीपीएल को ही मुफ्त में टीका लगाया जा सकता है, बाकी जनता से 250 से 300 रुपये प्रति डोज सरकार वसूल सकती है। पर अगर सरकार ने मुफ्त में सबको टीका लगाना का फैसला किया है तो यह स्वागत योग्य है, लेिकन केंद्र व राज्य सरकार के लिए उसकी कीमत अलग-अलग नहीं होनी चाहिए। केंद्र को चाहिए कि टीका बनाने वाली कंपनियों से वह खुद वैक्सीन खरीदे और राज्यों को मुहैया कराए। टीकाकरण के अभियान में निजी अस्पतालों को शामिल करने और उसके लिए राज्यों से दोगुणे रेट फिक्स करने से कंपनियों की दिलचस्पी निजी क्षेत्र को देने में होगी, जिससे कांट्रेक्ट के बावजूद सरकारी आपूर्ति में देरी हो सकती है। एक देश एक कीमत के आधार पर टीके के दाम तय होने चाहिए।

सबसे अहम है कि 17 से अधिक राज्य मुफ्त टीका लगाने की घोषणा कर चुके हैं और राज्य सरकार अपने बजट के लिए केंद्र से आवंटन पर निर्भर रहती है, ऐसे में अधिक कीमत का भार भी केंद्र पर ही पड़ना है। टीका बनाने वाली कंपनियों के साथ अगर केंद्र सरकार की डील करे तो अच्छा है। अभी एक मई से देश भर में 18 वर्ष से 45 वर्ष की उम्र के लोगों के टीकाकरण का अभियान शुरू होने वाला है, खबर आ रही है कि टीके की कमी के चलते महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, राजस्थान ने 18+ को टीका लगाने का कार्यक्रम टाल दिया है। अगर यह सियासत है तो यह गलत है, पर अगर वाकई में कमी है तो राज्य सरकारों को इंतजाम करना चाहिए। कंपनियों ने दावा किया है कि कुल प्रोडक्शन का 50 फीसदी राज्यों को भेजा जाता है, ऐसे में राज्यों को अपने लिए जरूरत के मुताबिक टीका लेना चाहिए। एक मई से टीके के लिए पंजीकरण करने वाली एप साइट क्रेश कर गई है। इससे साफ है कि सरकारों ने टीकाकरण के लिए तिथि की घोषणा से पूर्व उसकी तैयारियों को नहीं परखा है। गृहमंत्री अमित शाह ने वैक्सीन की उपलब्धता, आपूर्ति और इसकी योजना को लेकर उच्च स्तरीय बैठक की है। लेकिन अब दौर आपूर्ति सुनिश्चित करने का है। इसके लिए उत्पादन बढ़ाने व वितरण ठीक करने की जरूरत है।

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