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ओमकार चौधरी का लेख : हर फैसले का विरोध क्यों

लोकतंत्र में हर एक को अपनी बात रखने का अधिकार है। शांतिपूर्ण धरने, प्रदर्शन, जनसभा करने का हक है। लोकतांत्रिक तरीके से चुनी हुई सरकारें जनता के प्रति उत्तरदायी हैं। संविधान के तहत कार्य करने को बाध्य हैं। लोकतंत्र में विरोधी दलों, संगठनों आदि के बहुत अहम दायित्व हैं। एक स्वस्थ लोकतंत्र के लिए मजबूत विपक्ष का होना आवश्यक माना गया है। जिस प्रकार राज्यों और केन्द्र की सरकार हर मामले में अपने विरोधियों से सहयोग और समर्थन की अपेक्षा नहीं कर सकती, उसी तरह विरोधियों से यह अपेक्षा नहीं की जाती कि वह सरकारों के हर फैसले का विरोध करे।

ओमकार चौधरी का लेख : हर फैसले का विरोध क्यों
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प्रतीकात्मक फोटो

ओमकार चौधरी

लोकतंत्र में हर एक को अपनी बात रखने का अधिकार है। शांतिपूर्ण धरने, प्रदर्शन, जनसभा करने का हक है। लोकतांत्रिक तरीके से चुनी हुई सरकारें जनता के प्रति उत्तरदायी हैं। संविधान के तहत कार्य करने को बाध्य हैं। जो वादे करके वो जनादेश हासिल करती हैं, उन्हें पूर्ण करने को लेकर जवाबदेह हैं। वो कानून व्यवस्था और आम जन के जान-माल से जुड़ी घटनाओं, वारदातों के लिए जिमेदार मानी जाती हैं। केन्द्र के अपने दायित्व और कर्तव्य हैं। राज्य के अलग। कुछ दायित्व साझा हैं। जब राज्यों और केन्द्र में तालमेल, सामंजस्य, सहयोग की भावना होती है, तब शांति और अपेक्षाकृत तेज़ विकास की संभावनाएं बढ़ जाती हैं। केन्द्र के स्तर पर यदि राष्ट्रहित से जुड़े मसलों पर पक्ष-विपक्ष में समन्वय, सहयोग और समझबूझ हो तो जनहित के फैसले लेकर देशवासियों के जीवन को बेहतर बनाने की दिशा में तेजी से बढ़ने में मदद मिलती है। लोकतंत्र में विरोधी दलों, संगठनों आदि के बहुत अहम दायित्व हैं। एक स्वस्थ लोकतंत्र के लिए मजबूत विपक्ष का होना आवश्यक माना गया है। जिस प्रकार राज्यों और केन्द्र की सरकार हर मामले में अपने विरोधियों से सहयोग और समर्थन की अपेक्षा नहीं कर सकती, उसी तरह विरोधियों से यह अपेक्षा नहीं की जाती कि वह सरकारों के हर फैसले का विरोध करे और क़ानून व्यवस्था का माहौल पैदा करके अराजकता की स्थितियां निर्मित कर विकास की गति को अवरुद्ध करने पर आमादा हो जाए।

भारत में जीवंत लोकतंत्र है। दुनिया के कुछ गिने-चुने लोकतांत्रिक गणराज्यों में यदि हमारा एक विशिष्ट स्थान है तो इसकी वजह यह है कि 1975 को छोड़ दें तो कभी आपातकाल के नाम पर नागरिक अधिकारों को निलंबित करके तानाशाही नहीं थोपी गई। विरोध के स्वर का सदैव सम्मान किया गया। सदनों में और बाहर भी ऐसी व्यवस्थाएं विकसित कर ली गई ताकि जनता द्वारा चुने गए प्रतिनिधियों और नहीं चुने गए लोगों की आवाजें भी सुनी जा सकें। कौन दल, संगठन, नेता अथवा सरकार कितना जनहितैषी है। लोकतांत्रिक है। जवाबदेह और ज़िम्मेदार है, यह तय करने का हक भी जनता को ही सौंपा गया है। वही हर पांच साल में तय करती है कि अगले पांच साल कौन उनकी सेवा करेगा। लोकतंत्र में जनादेश को सर्वोपरि माना जाता है। उसे शिरोधार्य करने की परिपाटी चली आ रही है। जिन्हें जनता शासन चलाने के लिए चुनती है, वह अपने कर्तव्य का निर्वहन करने और किए गए वादों को पूरा करने के प्रति जवाबदेह है। वादे निभाने के लिए उसे कानून भी बनाने होते हैं। सदनों और राष्ट्रपति से मंज़ूरी भी लेनी होती है। किए गए वादों के अनुरूप यदि वह फैसले नहीं करती है तो उसे जनता दंडित करने में देर नहीं करती।

सात दशक से अधिक की हमारी इस लोकतांत्रिक यात्रा के दौरान जनता में अब उचित-अनुचित की समझ तो विकसित हो ही चुकी है। कुछ अपवाद हर जगह होते हैं,परंतु हरेक को यह स्वीकार कर लेना चाहिए कि उसके फैसले बहुत सोचे विचारे होते हैं। किसे देश की बागडोर सौंपनी है, किसे राज्य में जिम्मेदारी देनी है और किसे शिक्षा देनी है, वह जानती है। कई बार कह दिया जाता है कि उसे बहला-फुसला लिया गया, परंतु यदि दूध का दूध और पानी का पानी करने वाली जनता जनार्दन फिर से उन्हीं को चुन ले तो विरोधियों का यह दांव और बहाना भी बेदम हो जाता है। चुनी हुई सरकारों को कार्य नहीं करने देना। उसके फैसलों को लेकर जनता के बीच बार-बार संशय पैदा करना। हर फैसले का विरोध यही दर्शाता है कि या तो जनादेश को विपक्ष स्वीकार नहीं कर रहा अथवा जनता को गुमराह करके चुनी हुई सरकारों की विश्वसनीयता कम करना चाहता है। यदि फिर भी लोग हर चुनाव, उप चुनाव में विपक्ष को ख़ारिज कर दे दो उनकी कुंठा किस हद तक बढ़ती है, यह देश पिछले कुछ वर्षों से देखता और भुगतता आ रहा है। 370 हटाने का निर्णय हो, तीन तलाक विरोधी कानून बनाने का अथवा नागरिकता संशोधन क़ानून लाए जाने का। भारत को आत्मनिर्भर बनाने के लिए कदम लेने का या कोरोना वायरस से बचाव के लिए समय रहते लॉकडाउन लागू का, हर मामले में विपक्ष ने विरोध के ही स्वर उठाए हैं।

मोदी सरकार ने दो हज़ार से अधिक ऐसे क़ानूनों को समाप्त करने का ऐतिहासिक फैसला लिया, जो विकास के लिए होने वाले निर्णयों में बाधा बन गए थे। किसान क़र्ज़ नहीं चुका पाते तो उन्हें हवालात में डाल दिया जाता था। वह आत्महत्या करने को विवश होता रहा। सात दशक की इस यात्रा में वैसे तो कई वर्ग हैं, जो विकास की मुख्यधारा में पिछड़ गए, परंतु अन्नदाता की दशा में आमूलचूल परिवर्तन नहीं हुआ। न्यूनतम समर्थन मूल्य के नाम पर इसकी लूट की जाती रही। मंडियों और दलालों के दुष्चक्र से निकालने की कोशिश की गई तो ऐसे अमीर किसानों को उकसाकर सड़कों और रेलवे पटरियों पर बैठा दिया गया, जो मंडियों के लाभार्थी रहे हैं। कुछ दलों, नेताओं और माफियाओं को अपनी दुकानें बंद होती दिखी तो वह भी हाय तौबा करके छाती पीटते हुए सड़कों पर आ गए। मंडियों के चंगुल से बचाकर जिस छोटे किसान को उपज बेचने का विकल्प उपलब्ध कराया गया, वह फिर से ठगा हुआ सा अनुभव कर रहा है। यही किसानों का वह बड़ा वर्ग है, जिसे ये लोग पनपने नहीं देना चाहते। स्वयं प्रधानमंत्री कई बार बता चुके हैं कि न्यूनतम समर्थन मूल्य व्यवस्था जारी है, परंतु जिन्हें राजनीतिक रोटियां सेंकनी है, वो प्रधानमंत्री की भी सुनने को तैयार नहीं हैं क्योंकि उनका हेतु कुछ और है।

बिचौलियों, दलालों, भ्रष्टाचारियों और माफियाओं का बड़ा चक्रव्यूह तोड़ने, काले धन का साम्राज्य खत्म करने अथवा न्यूनतम कर देने और लाभार्थी को सीधे उसके खाते में लाभ देने के मकसद से विगत साढ़े वर्षों में बहुत से कदम उठाए गए हैं। ऑनलाइन भुगतान की व्यवस्था चलन में लाने और लोगों का समय व धन बचाने के लिए डिजिटल को बढ़ावा देने की बात हो अथवा जीएसटी लागू करने, विमुद्रीकरण का साहसिक फ़ैसला लेने, गरीबों को मुफ्त बिजली कनेक्शन, घरेलू गैस कनेक्शन देने या महिलाओं को सशक्त करने के लिए मुद्रा योजना का सत्तर प्रतिशत लाभ उन्हें देने का फैसला, किसानों की उपज 2022 तक दोगुना करने की दिशा में कड़े फैसले करने की बात हो या हर किसान के खाते में प्रति वर्ष छह हजार की सहायता पहुंचाने का फैसला, इनसे गरीब-गुरबा के जीवन में परिवर्तन दिखना शुरू हुआ है और यही वर्ग मज़बूती से प्रधानमंत्री मोदी के साथ खड़ा होता भी दिख रहा है। यही वजह है कि अब सरकार के हर फैसले का विपक्षी दलों ने येन केन प्रकारेण विरोध करने की ठान ली है। ऐसा करके वह खुद ही एक्सपोज़ हो रहे हैं। हर फैसले का विरोध करके उन्होंने अपनी साख खत्म कर ली है। (ये लेखक के अपने विचार हैं।)

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