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आर.के. सिन्हा का लेख : हिन्दी वाले फिसड्डी क्यों

हिन्दी माध्यम से भारतीय प्रशासनिक सेवा परीक्षा को पास करने वालों की संख्या तेजी से घट रही हैं। इस बार हिन्दी माध्यम से परीक्षा देने वाला सबसे अव्वल अम्यार्थी 317वें स्थान पर रहा। यानी उससे ऊपर लगभग सब अंग्रेजी से पेपर देने वाले ही रहे। आखिर हिन्दी वाले क्यों फिसड्डी साबित हो रहे हैं सिविल सर्विस परीक्षा में। कुछ कारण जो समझ आ रहे हैं। उनका तुरंत निदान करना होगा। अगर ऐसा न हुआ तो हिन्दी को लेकर देखे गए सपना धराशायी हो जाएंगे।

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यूपीएससी

आर.के. सिन्हा

संघ लोक सेवा आयोग ने अपनी परीक्षा 2019 के परिणामों की घोषणा कर दी है। उसमें कुल 829 उम्मीदवारों का चयन हुआ है। अब ये सफल उम्मीदवार बनेंगे देश के बड़े बाबू, राजनयिक, आला पुलिस अफसर। यहां तक तो सब ठीक है। पर बीते कुछ सालों से चल रहा रुझान इस बार भी जारी रहा। दरअसल, हिन्दी माध्यम से भारतीय प्रशासनिक सेवा परीक्षा को पास करने वाले तेजी से घट रहे हैं। इस बार हिन्दी माध्यम से परीक्षा देने वाला सबसे अव्वल अम्यार्थी 317वें स्थान पर रहा। यानी उससे ऊपर लगभग सब अंग्रेजी से पेपर देने वाले ही रहे। इसका छोटा-मोटा अपवाद भी हो सकता है।

अब जो उम्मीदवार 317वें स्थान पर रहा है, उसे आईएएस, आईपीएस या आईएफएस जैसा उच्च कैडर तो मिलना असंभव है। जो भारतीय प्रशासनिक सेवाओं के क्रीम कैडर माने जाते हैं । यह दस साल पुरानी बात होगी जब टॉप 10 में तीन-तीन, चार-चार हिन्दी माध्यम वाले विद्यार्थी आते थे। थोड़ा पीछे चलते हैं। साल 2010 तक हिन्दी माध्यम के लगभग 45 फीसद अम्यार्थी प्री- क्वालीफाई करके मुख्य परीक्षा देते थे। जो अब यह आंकड़ा घट कर 10 से 12 फीसदी हो गया है। कहने वाले यह भी कह रहे हैं कि सबसे बड़ा फैक्टर यह है कि प्री क्वालीफाई करके मुख्य परीक्षा में ही न पहुंच पाना।

मान लें कि कुछ तो कमी जरूर है सिस्टम में, नहीं तो ऐसे ही हिन्दी वाले गायब नहीं हो जाते। हिन्दी वालों का सिविल सर्विसेज की परीक्षा से बाहर होना देश की आधी से ज्यादा आबादी को बुरी तरह चिंतित कर रहा है। सवाल यह है कि आखिर कुछ वर्ष पहले तक जो छात्र समूह बढ़िया परिणाम दे रहा था, वो एकाएक दुर्दशा का शिकार क्यों होने लगा।

मुझे लगता है कि बात भाषा की नहीं, मानसिकता की भी है। हिन्दी में दिए गए उत्तरों की परीक्षकों की निगाह में कद्र नहीं है। भले ही वे सही हों। फिर हिन्दी बोलने वालों का आत्मविश्वास तो वैसे ही हमेशा धरातल पर होता है। रही-सही कसर इंटरव्यू का अंग्रेजीदां हाव-भाव पूरी कर देता है। अगर आप मुख्य परीक्षा को पास कर भी लेते हैं तो इंटरव्यू में पर्याप्त नंबर नहीं मिलते हैं। तो क्या मातृ भाषा में शिक्षा देने वाली बातें मात्र नाटक हैं? अकबर इलाहाबादी ने ठीक ही लिखा था, तालीम का जोर इतना, तहजीब का शोर कितना। बरकत जो नहीं होती, नीयत की खराबी है।'

आखिर हिन्दी वाले क्यों फिसड्डी साबित हो रहे हैं सिविल सर्विस परीक्षा में। कुछ कारण जो समझ आ रहे हैं, वे इस तरह से हैं, पठन सामग्री की कमी, अनुवादित पुस्तकों और प्रश्नपत्रों में गलत अनुवाद, परीक्षकों द्वारा हिन्दी माध्यम परिक्षार्थियों की उपेक्षा या जानबूझकर कम अंक देना, हिन्दी विद्यार्थियों और परीक्षकों की कमजोर शैक्षणिक पृष्ठभूमि, हिन्दी माध्यम परीक्षार्थियों का अंग्रेजी माध्यम के अनुपात में कम होना, वगैरह।

एक बात तो साफ है कि हमारे यहां कोचिंग संस्थानों की कोई कमी नहीं, लेकिन अच्छे संस्थानों की भारी कमी है। ये ही बच्चों को विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए तैयार करने का दावा करते हैं। देश के सभी शहरों में क्लर्क से लेकर सिविल सर्विस जैसी दूसरी बड़ी परीक्षाओं की इनमें तैयारी करवाई जाती है। हिन्दी में कोचिंग संस्थान तो कुकुरमुत्ते की तरह उग आए हैं, हर शहर के हर गली मोहल्ले में। दिल्ली के मुखर्जी नगर में इस तरह की सैकड़ों संस्थान हैं। पर क्या उनमें फैक्ल्टी कायदे के नहीं है? आपको पढ़ाने वाला ही कमजोर होगा तो आप बेहतर परिणाम की उम्मीद तो मत करें। एक बात ये भी लगती है कि जो कथित तौर पर अच्छे संस्थान हैं, वे भी अपने विद्यार्थियों को स्तरीय पठन सामग्री उपलब्ध नहीं करवा पाते। इसलिए हिन्दी माध्यम के अभ्यार्थी मात खा रहे हैं। उन्हें इंटरनेट पर पठन सामग्री ढूंढने को कहा जाता है। वे सारी पठन सामग्रियां अंग्रेजी में ही होती हैं। अब हिंदी माध्यम के पढ़े बच्चे अपनी बुद्धि से उस पठन सामग्री को समझेंगे, पूरी तरह ग्रहण कर सार्थक उत्तर दे पायेंगे अगर यही स्थिति रही तो देश को भविष्य में कभी शशांक जैसे विदेश सचिव नहीं मिलेंगे। शशांक देश के सफल विदेश सचिव थे। उन्होंने हिन्दी माध्यम से सिविल सर्विस की परीक्षा में शानदार प्रदर्शन किया था।

एक तरफ भारत की चाहत रही है कि हिन्दी को संयुक्त राष्ट्र की आधिकारिक भाषा का दर्जा मिल जाए और दूसरी तरफ हमारी शिखर नौकरशाही से ही हिन्दी गायब हो रही है। हिन्दी को विश्व मंच पर लाने की पहली सार्थक और ठोस पहल अटल बिहारी वाजपेयी ने की थी। पहला विश्व हिन्दी सम्मेलन 1975 में नागपुर में आयोजित हुआ था। जिसमें पारित प्रस्ताव में कहा गया था, संयुक्त राष्ट्र महासभा में हिन्दी को आधिकारिक भाषा के रूप में स्थान दिलाया जाए। इसके दो वर्ष बाद ही अटल बिहारी वाजपेयी ने 4 अक्टूबर 1977 को जनता पार्टी की सरकार के विदेश मंत्री के रूप में संयुक्त राष्ट्र महासभा के अधिवेशन में हिन्दी में जोरदार भाषण दिया था। उनसे पहले किसी भी भारतीय प्रधानमंत्री या विदेश मंत्री ने तो क्या किसी प्रतिनिधि ने भी हिन्दी का प्रयोग संयुक्त राष्ट्र संघ के मंच पर नहीं किया था। अटल जी के उस भाषण के बाद देशभर में ही नहीं विश्वभर के हिन्दी प्रेमियों में खुशी की लहर दौड़ गई थी। पर अब तो अपने घर में ही हिन्दी का असर कम होता जा रहा है। यह एक चिंताजनक ही नहीं दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति है।

यह भी इत्तेफाक ही है कि जब सिविल सेवा की परीक्षाओं में हिन्दी के अभ्यार्थियों के निराशाजनक प्रदर्शन से सब परेशान है, वहीं हाल ही में उत्तर प्रदेश की 10वीं की हाई स्कूल और 12 वीं की इंटर की परीक्षाओं के हाल ही में आए परिणामों में विद्यार्थियों का हिन्दी का परिणाम भी अत्यंत ही निराशाजनक रहा। यानी हिन्दी को लेकर कहीं से भी सुखद खबर तो नहीं आ रही है।

क्या उत्तर प्रदेश में इसे सही से जानने-समझने, पढ़ने में छात्रों में रुचि अब घट रही है? क्या हिन्दी के शिक्षक अपने अध्यापक धर्म का निर्वाह करने के लायक नहीं रह गए हैं? ये दोनों प्रश्न इसलिए भी समीचिन है, क्योंकि अपनी मातृभाषा में लाखों विद्यार्थियों का अनुतीर्ण होना कई सवाल खड़े कर रहा है। इसका असर दूर तक देखने में आ रहा है। जो बच्चे हिन्दी में इंटर और मैट्रिक में हिन्दी माध्यम से परीक्षा देते हैं, वे आगे चलकर हिन्दी में सिविल सेवा जैसी खास परीक्षा को पास कर पाने में नाकामयाब तो रहेंगे ही।

दरअसल अपने को हिन्दी सेवी कहने वाले और हिन्दी के नाम पर रोटी कमाने वालों को इन सवालों के जवाब देने होंगे कि स्कूली स्तर से लेकर अति महत्वपूर्ण परीक्षाओं में हिन्दी के विद्यार्थी और अभ्यर्थी क्यों अपेक्षित नतीजे नहीं दे पा रहे हैं।

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