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भारतीय लोकतंत्र का इससे बड़ा दुर्भाग्य क्या हो सकता है

गुरुओं की नगरी अमृतसर में दशहरे के दिन जो कुछ भी घटित हुआ उससे सारे देश का मर्माहत होना समझ आता है। रावण वध को देखने जुटी श्रद्धालुओं की भारी भीड़ पर कहर टूट पड़ा। अमृतसर ने लगभग 100 सालों के बाद एक फिर से जलियांवाला बाग की यादें ताजा कर दीं। दोनों हादसों में मासूम लोगों की भीड़ ही मारी गई थी।

भारतीय लोकतंत्र का इससे बड़ा दुर्भाग्य क्या हो सकता है

गुरुओं की नगरी अमृतसर में दशहरे के दिन जो कुछ भी घटित हुआ उससे सारे देश का मर्माहत होना समझ आता है। रावण वध को देखने जुटी श्रद्धालुओं की भारी भीड़ पर कहर टूट पड़ा। अमृतसर ने लगभग 100 सालों के बाद एक फिर से जलियांवाला बाग की यादें ताजा कर दीं। दोनों हादसों में मासूम लोगों की भीड़ ही मारी गई थी।

ये दिल दहलाने वाला हादसा चीख-चीखकर पूछ रहा है कि क्या हम कभी भी बड़े धार्मिक आयोजनों को सही तरह से आयोजित कर सकेंगे। भारत में बीते 70 सालों के दौरान हजारों मासूम लोग धार्मिक आयोजनों के दौरान अपनी जान गंवा बैठे हैं। क्या हम अब यह मान लें कि ये हादसे कभी नहीं थमेंगे।

क्या रामलीला, छठ, दुर्गा पूजा या कुंभ जैसे आयोजनों से पहले होने वाली अफसरों की तैयारी बैठकों और वादों का कोई मतलब ही नहीं रह गया है? लगता है कि निष्क्रियता, निकम्मापन और काहिली हमारे शरीर में अन्दर तक प्रवेश कर चुकी है। ताजा हादसे में जालंधर से अमृतसर जा रही डीएमयू ट्रेन नंबर 74943 करीब 100 किलोमीटर प्रति घंटा की रफ्तार से ट्रैक पर मौजूद लोगों को कुचलती हुई आगे निकल गई।

देखते ही देखते 150 मीटर के दायरे में लाशें ही लाशें बिछ गईं। लोहे की पटरियां तक खून से सुर्ख हो गईं। अब आरोपों.-प्रत्यारोपों का क्रम चालू हो गया है। मरने वाले तो बेचारे मर गए हैं। उनके परिवार वाले जीवनभर इस हादसे को नहीं भूलेंगे। पंजाब प्रशासन ने मृतकों के परिजनों और घायलों के लिए मुआवजे और मुफ्त इलाज की घोषणा तो कर दी है।

लेकिन, जिनके परिवार के सदस्य मारे गए हैं, उनके परिवारों के उल्लास का माहौल तो घोर मातम में बदल गया है। अफसर घटना स्थल पर पहुंच रहे हैं, पहुंचते रहेंगे। बड़े नेताओं ने ट्वीट कर अपना शोक संदेश भेज कर खानापूरी कर दी है। यानी जो पहले होते रहे रेल हादसों में होता रहा है, वही तो अब भी हो रहा है। मानो सारी पटकथा पहले से तैयार हो।

उसमें कहीं कोई बदलाव नहीं। पहले के हादसों की ही तरह से इस रेल हादसे के बाद भी कुछ लोग लाल बहादुर शास्त्री को याद करने लगे हैं। कह रहे हैं, उन्होंने रेल हादसे की नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए अपने पद से इस्तीफा दे दिया था। इसलिए मौजूदा रेल मंत्री भी इस्तीफा दें। जाहिर है कि यह मांग करने वाले बीमार मानसिकता से ग्रस्त हैं। अमृतसर हादसे से कई अहम सवाल पैदा हुए हैं।

यह सवाल पंजाब सरकार, रेल प्रशासन और दूसरे संबंधित विभागों से पूछे जाएंगे। पहला सवाल यह है कि इतने व्यस्त रेल रूट के ठीक बगल में रावण का पुतला जलाने की इजाजत किस आधार पर दे दी गई। रेल पटरियों के दोनों ओर कुछ मीटर तक रेलवे विभाग की संपति होती है। तो क्या रेलवे के अधिकारियों से रावण दहन का कार्यक्रम पटरियों के पास आयोजित करने की अनुमति ली गई थी।

यह बात तो स्पष्ट है कि अगर सरकारी इंतजाम पुख्ता होते और रावणवध देखने आए श्रद्धालु भी समझदारी का परिचय देते तो कोई जानें जाती ही नहीं। सवाल यह है कि अमृतसर में गाजर-मूली की तरह से कटे मासूम लोगों की मौत का जिम्मेदार कौन है। सरकारी तंत्र, रेलवे प्रशासन, ट्रेन ड्राइवर, किसी की जिम्मेदारी तो तय करनी ही होगी।

अमृतसर रेल हादसे की जिम्मेदारी आयोजकों और स्थानीय प्रशासन को लेनी ही होगी। लीपापोती से काम नहीं चलेगा। रेल तो अपनी पटरी पर अपने निर्धारित समय पर ही आएगी। ड्राइवर रेलवे सिग्नल देख कर चलने का आदी होता है। सौ किलोमीटर की स्पीड से चलती गाड़ी एकदम से तो नहीं रोकी जा सकती। अगर पटरी पर अचानक ड्राइवर को कुछ असामान्य दिखता भी है तो तेजी से चलती रेल को अचानक रोका भी नहीं जा सकता है।

इमरजेंसी ब्रेक हर गाड़ी में लगाया भी नहीं जा सकता है। इससे तो और बड़ी दुर्घटना हो सकती है। सैकड़ों रेल यात्रियों की जान जा सकती हैं। रेल पलट भी सकती है। रेल पटरी के निकट रावण दहन का कार्यक्रम रखना ही था तो रेलवे ट्रैक की तरफ भीड़ न जाए इसकी भी व्यवस्था तो करनी ही चाहिए थी। रेलपथ की ओर बैरिकेडिंग भी होनी चाहिए थी। स्थानीय प्रशासन को रेल विभाग से भी सामंजस्य बनाये रखना भी जरूरी था।

स्थानीय प्रशासन ने अनुमति दी थी या नहीं यह स्पष्ट नहीं किया जा रहा है। दाल में काला नहीं पूरी दाल ही काली लग रही है। आयोजक मंत्री नवजोत सिंह सिद्धू की पत्नी थीं। क्या इसीलिए नियम-कानून ताख पर रख दिए गए। यह कैसे हो गया कि न पुलिस, न फायर ब्रिगेड और रेलवे ट्रैक पर रावण दहन। इससे बड़ा पागलपन सोचा भी नहीं जा सकता।

रेलवे की संपत्ति पर भीड़ जमा करने की अनुमति रेलवे प्रशासन से क्या मिसेज सिद्धू ने लिया था। यदि अनुमति ली थी तो रेलवे के अधिकारी जिन्होंने अनुमति दी थी उसे तत्काल जेल भेजकर गैरइरादतन हत्या का मुकदमा चलाना चाहिए। और यदि सिद्धू ने अनुमति नहीं ली थी तो उन्हें जेल जाने के लिय तैयार हो जाना चाहिए उनके पति सिद्धू जी और मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह के मात्र यह कह देने से थोड़े ही लीपापोती की रस्म अदायगी हो जाएगी कि यह दुर्घटना थी जिसे स्वीकार कर लेना चाहिए।

किसी भी सार्वजनिक कार्यक्रम जिसमें हजारों लोगों की भीड़ अपेक्षित हो, उसका एक निर्धारित प्रोटोकाल होता है। अनुमंडल अधिकारी की लिखित अनुमति जरूरी है। अनुमति के पूर्व पुलिस थाने, यातायात पुलिस, बिजली विभाग, नगर निगम, पेयजल और सफाई विभाग के अतितिक्त चूंकि, यह कार्यक्रम रेलवे की संपत्ति पर हो रहा था, रेलवे विभाग सहित सभी की अनापत्ति जरूरी थी। क्या यह सब हुआ। यदि मान लें कि यह सब हुआ होगा, जो कि निष्पक्ष जांच ही तय करेगा, तब भी इस प्रश्न का उत्तर कौन देगा कि जलते रावण को रेलवे ट्रैक पर गिराने का निर्णय किसने लिया।

लोहे के तारों के सहारे खड़े पुतले को तो किसी भी दिशा में गिराया जा सकता था। शायद ही कोई हो, जिसकी आंखें हादसे के बाद के मंजर को देखकर नम न हो रही हों। मासूम लोगों के शव और उनके आगे बिलखते हुए उनके प्रियजनों को देखना आसान नहीं है। खबरिया चैनलों को देखकर साफ है कि वहां रोशनी का भी पर्याप्त अभाव था। रेलवे पटरियों के बारे में हमारी जागरूकता बहुत ही कम है।

चाहे बिना फाटक की क्रासिंग हो या कस्बे गांव से गुजरती रेल लाइन, हम यह भी भूल जाते हैं कि रेलवे ट्रैक पर जाना, उसके अनिर्धारित स्थान से पार करना, उस पर बैठ कर गप्प लगाना रेलवे एक्ट में दंडनीय अपराध है। जांच तो इस घटना की अंततः होगी ही। रेलवे भी करेगी और राज्य सरकार भी। पर दोषी कौन होता है, सज़ा किसे मिलती है, यह देखना है। आयोजकों को लापरवाही के लिए ज़रूर ही दंडित करना चाहिए।

शायद यह अपने देश में ही होता है कि यहां पर कभी किसी हादसे के लिए कोई प्रशासन अपनी गलती नहीं मानता। सारी जिम्मेदारी जनता की ही होती है, जो इन आयोजनों में जाती है। उसे यह समझ क्यों नहीं आता कि उसकी जान की कीमत की किसी को रत्तीभर भी परवाह नहीं है। इन्हें अपनी राजनीति की रोटी सेंकनी है। कभी किसी ने सोचा भी है कि ऐसे हादसे अमेरिका, जर्मनी, जापान, डेनमार्क, नॉर्वे, रूस, अमेरिका इत्यादि देशों में क्यों नही होते हैं।

क्योंकि वहां का प्रशासन अपने लोगों के हितों को लेकर जागरूक रहता है। यह मत भूलिए कि इस ताजा रेल हादसे में मारे गए लोगों को चर्चिल ने भूख से तड़पा कर नहीं मारा है, न ही ये जनरल डायर ने गोलियों से भूनकर मारे गये हैं। उन्हें क्यों नहीं समझ आ रहा कि पंजाब का प्रशासन अब मर चुका है, पूर्णतरू संवेदनहीन हो गया है । दरअसल, हमारे यहां पर्वो के दौरान बार-बार जानलेवा हादसे होने लगे हैं।

पिछले वर्ष की ही बात कर लेते हैं, जब सिर्फ बिहार में छठ पूजा के दौरान डूबने से 73 लोगों की जान चली गयीं थीं। राजधानी दिल्ली में भी दुर्गा पूजा के विसर्जन के दौरान करीब 10 लोग डूबे थे। ये उन तमाम सरकारी दावों-वादों की पोल भी खोलते हैं, जो संबंधित विभाग करते रहे थे कि सुरक्षा के चाक-चौबंद इंतजाम कर लिए गए हैं।

अब यह तो बात मान ही लेनी चाहिए कि हमारे यहां धार्मिक आयोजनों में हादसे होना सामान्य सी बात हो गई है। क्योंकि हादसों के बाद मुआवाजे, मुफ्त इलाज और नेताओं के शोक संदेशों के बाद हम फिर से अगले हादसे के लिए तैयार होने लगते हैं। भारतीय लोकतंत्र का इससे बड़ा दुर्भाग्य क्या हो सकता है।

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