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डाॅ. रहीस सिंह का लेख : दुनिया को किधर ले जा रहा रूस-यूक्रेन युद्ध

रूस-यूक्रेन युद्ध शुरू हुए चार महीने पूरे हो गए। इतने दिनों में दुनिया कितनी बदली, इसे कैसे देखा जाए और इससे आगे क्या हो सकता है, इसके आकलन भी अच्छे संकेत नहीं दे रहे हैं। यूक्रेनी राष्ट्रपति और उनके सलाहकार अपने अलग-अलग बयानों में यह कहते दिख रहे हैं कि लड़ाई अब ‘फियरफुल क्लाइमेक्स’ में प्रवेश कर गई है। प्रश्न यह यह है कि यह डरावना अंत किसके संदर्भ में है-रूस अथवा यूक्रेन या फिर पूरी दुनिया के संदर्भ में? सामान्यतया तो यह विषय यूक्रेन या रूस तक ही सीमित है, लेकिन सही अर्थों में इसकी परिधियां बहुत व्यापक हैं। स्वाभाविक है कि प्रभाव भी जटिल एवं व्यापक होंगे।

डाॅ. रहीस सिंह का लेख : दुनिया को किधर ले जा रहा रूस-यूक्रेन युद्ध
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डाॅ. रहीस सिंह।  

डाॅ. रहीस सिंह

रूस-यूक्रेन युद्ध शुरू हुए चार महीने पूरे हो गए। इतने दिनों में दुनिया कितनी बदली? इसे कैसे देखा जाए? आगे क्या हो सकता है, इसके आकलन भी अच्छे संकेत नहीं दे रहे हैं। यूक्रेनी राष्ट्रपति और उनके सलाहकार अपने अलग-अलग बयानों में यह कहते दिख रहे हैं कि लड़ाई अब 'फियरफुल क्लाइमेक्स' (डरावने अंत) में प्रवेश कर गई है। प्रश्न यह यह है कि यह डरावना अंत किसके संदर्भ में है-रूस अथवा यूक्रेन या फिर पूरी दुनिया के संदर्भ में? सामान्यतया तो यह विषय यूक्रेन या रूस तक ही सीमित है, लेकिन सही अर्थों में इसकी परिधियां बहुत व्यापक हैं। स्वाभाविक है कि प्रभाव भी जटिल एवं व्यापक होंगे।

यदि रूस-यूक्रेन युद्ध का विश्लेषण करते समय नजरिया सीधा-सपाट न रखकर उन आड़े-तिरछी रेखाओं पर भी टिकाएं तो स्पष्ट हो जाएगा कि असल में शिकार कौन हो रहा है और शिकारी कौन-कौन है। दरअसल यह युद्ध सिर्फ रूस और यूक्रेन के बीच नहीं लड़ा जा रहा बल्कि यह नई विश्वव्यवस्था में नए जियो-पाॅलिटिकल और जियो-इकोनाॅमिक हितों को लेकर लड़ा जा रहा युद्ध है, जिसमें यूक्रेन केवल युद्ध का एक मैदान भर है। पिछले तीन दशकों में एशिया से लेकर अफ्रीका व लातिन अमेरिका के भू-राजनीतिक खंडों पर ऐसी बहुत सी कथाओं के उदाहरण मिलेंगी जिनमें ध्वंस के विशेष अभिप्राय शामिल होंगे, लेकिन विश्वव्यवस्था के नायकों ने इनका परवाह नहीं की जिसका परिणाम नए समूहों यानी मिनीलैटरल्स या एक्सक्लूसिव ग्रुप्स के रूप में देखने को मिल रहा है। खास बात यह है कि ये बड़े समूहों के मुकाबले कहीं अधिक रणनीतिक और एकजुट हैं, लेकिन बड़ी शक्तियों को यह स्वीकार्य नहीं है कि बहुध्रुवीयता अपने वास्तविक रूप में आए। अब इन्हें दो प्रकार से खत्म किया जा सकता था। एक-इनमें प्रवेश लेकर और दूसरे ऐसी परिस्थितियों को जन्म देकर जिनमें ये नए खतरे को महसूस करें और फिर से वाशिंगटन, माॅस्को या बीजिंग की ओर देखने लगें। यूक्रेन युद्ध इसी रणनीति का एक छोर है। दरअसल यूक्रेन युद्ध एक तरह का शक्ति परीक्षण है। इसमें जहां रूस एक शक्ति बनने की कोशिश कर रहा है वहीं अमेरिका वैश्विक शक्ति के रूप में अपनी अभिलाषाओं को जिंदा रखने की कोशिश में है।

यह नया नहीं है। ईरान, सीरिया से लेकर क्रीमिया तक के विवाद अथवा संघर्ष इसी की कड़ियां हैं। क्रीमिया की विशेष रणनीतिक महत्ता है, इसलिए क्रीमिया और सीरिया में मिली सफलता के बाद पुतिन में पूर्वी यूरोप, दक्षिणी काॅकेशस और यूरेशिया तक रूसी नियंत्रण के विस्तार की महत्वाकांक्षा पनपने लगी, लेकिन यह तभी संभव था जब यूक्रेन रूस के नियंत्रण में आ जाए। इस उद्देश्य को पूरा करने के लिए व्लादिमीर पुतिन केवल सैन्य युद्ध ही नहीं लड़ रहे हैं, बल्कि वे रूस के भू-राजनीतिक और भू-आर्थिक हितों को उत्तर और दक्षिण में विस्तार देने की रणनीति भी अपना रहे हैं। यहां तक तो ठीक है, लेकिन इस दौरान बीजिंग-माॅस्को के बीच जो बाॅन्डिंग बनी है, वह केवल यूक्रेन युद्ध तक सीमित नहीं है। इसलिए ड्रैगन-बियर बाॅन्डिंग अधिक खतरनाक साबित हो सकता है। इस युद्ध में वाशिंगटन पहली बार एक ऐसे शक्ति केंद्र के रूप में उभरा नेतृत्व की हैसियत में नहीं दिखा। यहां तक तो ठीक है, लेकिन इसका दूसरे पर बीजिंग है जो असीमित महत्वाकांक्षाओं के साथ आगे बढ़ना चाह रहा है, इसलिए अमेरिका की कमजोरी का मतलब होगा चीन के लिए अवसर। यह अच्छी बात नहीं है। इस युद्ध में यूरोपीय संघ भी सही अर्थों में अमेरिका के साथ नहीं दिखा। तेल और गैस ने उसे दोहरा चरित्र प्रदर्शित करने के लिए विवश किया। यूरोपीय देशों को लगता है कि अमेरिकी निर्णयों को मान लेने से कहीं उनकी अर्थव्यवस्थाओं के कई पहिए थम न जाएं। ऐसे यूरोपीय संघ में प्रवेश लेने के लिए उत्सुक यूक्रेन का नेतृत्व वास्तव में जमीनी हकीकत से वाकिफ हैं, यह कहना मुश्किल हो रहा है। राष्ट्रपति जेलेंस्की को लग रहा है कि यूरोपीय संघ में शामिल होते ही यूक्रेन की तकदीर बदल जाएगी। सवाल यह उठता है कि जो देश पहले से ही यूरोपीय संघ में हैं, वे किस हाल में है? अगर सब कुछ वहां बेहतर है तो 'ब्रेग्जिट' क्यों हुआ? तो कोविड 19 महामारी के दौरान यूरोपीय एकता क्यों नहीं दिखी।

आखिर यूरोप के मजबूत देशों ने कमजोर देशों को बिना किसी सहायता के महामारी से जूझने के लिए क्यों छोड़ दिया था? आज के इस विश्व में फिलहाल सभी की निगाहें रूस-यूक्रेन युद्ध पर टिकी हुई हैं, लेकिन सही मायने में तो यह समय थोड़ा आगे बढ़कर देखने का है। सबसे अहम पक्ष तो शरणार्थियों के रूप में निर्मित हो रही पराश्रित मानव पूंजी का है जिसके नफा-नुकसान सीधे और सपाट नहीं हैं। इस संवेदनशील और पराश्रित मानवपूंजी में पिछले एक वर्ष में एक बहुत बड़ी संख्या जुड़ चुकी है जिसके लिए युद्ध के साथ-साथ खाद्य संकट, जलवायु सुरक्षा सहित बहुत से आंतरिक कारण जिम्मेदार रहे हैं। इस लेकर यूएनएचसीआर अंतरराष्ट्रीय समुदाय का आह्वान कर रहा है कि सभी एक साथ मिलकर मानव त्रासदी से निपटने और हिंसक टकरावों को सुलझाने के स्थाई समाधान ढूंढंे, लेकिन ऐसा तो हो नहीं रहा है। बल्कि दुनिया के ये संभ्रांत देश नए टकरावों के लिए स्थितियों का निर्माण कर रहे हैं। ये स्थितियां उत्तरोत्तर विषम ही होंगी। यूरोप की अग्रणी अर्थव्यवस्था जर्मनी तीव्र मुद्रास्फीति का सामना कर रही है जो कि 1981 के बाद सर्वाेच्च स्तर पर पहुंच चुकी है। केन्या की राजधानी नैरोबी में पेट्रोल पंपों पर लंबी-लंबी कतारें बता रही हैं कि इनका असर कहीं और पड़ने वाला है।

मतलब यह कि तेल की महंगाई और कम आपूर्ति सम्पूर्ण जीवन पर प्रभाव डालेगी। तुर्की जैसे देश रूसी गेहूं की आपूर्ति प्रभावित होने के कारण ब्रेड की मांग से जूझ रहे हैं और इराक में गेहूं के आसमान छूते दामों के कारण धराशायी होने के कगार पर हैं। ये अच्छे संकेत नहीं हैं। मजेदार बात यह है कि नैतिकता के इस पश्चिमी सहयोग (यूक्रेन को) में सही अर्थों में नैतिक कुछ नहीं है। यूरोपीय संघ कह रहा है कि हम रूस से तेल आयातों पर धीरे-धीरे प्रतिबंध लगाएंगे, लेकिन क्यों? अपनी आवश्यकताओं के अनुरूप नीतियों का क्रियान्यवन नैतिकता की श्रेणी में तो नहीं आएगा। जर्मनी तर्क दे रहा है कि तत्काल गैस की आपूर्ति रुक जाने से नौकरियां चली जाएंगी। जो भी हो अर्थशास्त्री तो प्राकृतिक गैस और तेल, के आयातों पर पूर्ण पाबंदी से यूरोप में मंदी आने की भविष्यवाणी कर रहे हैं। चूंकि तेल एक वैश्विक उत्पाद है इसलिए तेल की कीमतें हर किसी के लिए बढ़ेंगी जिससे अर्थव्यवस्था का चक्र धीमा पड़ जाएगा। सम्मिलित रूप से इसका असर अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा। यूरोपीय संघ का रूसी तेल पर प्रतिबंध लगाना एक जोखिम वाला जुआ है। फिलहाल दुनिया एक नई और जटिल चुनौती का सामना कर रही है, जिसकी अनदेखी काफी भारी पड़ने वाली है। हां अमेरिका और यूरोप खुश हो सकते हैं कि वे इस युद्ध में रूस को नुकसान पहुंचाने में सफल रहे लेकिन उनकी खुशी और पुतिन की खीझ के बीच का जो सच है वह डरावना है।

( ये लेखक के अपने विचार हैं। )

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