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डॉ. चंद्र त्रिखा का लेख : आखिर कब समझेंगे हम

हम उन योद्धाओं पर भी हमले कर रहे हैं जो हमारी जान बचाने के लिए अपनी जान का जोखिम उठा रहे हैं। यह एक हकीकत है कि हमने महामारी में भी अपनी सोच नहीं बदली। हम पहले से ज्यादा साम्प्रदायिक हो चले हैं। मीडिया चैनल दो भागों में बंटे हैं। एक पर गोदी-मीडिया का लेबल चस्पा कर दिया गया है जबकि दूसरे भाग ने प्रगतिशीलता व प्रामाणिकता का बैनर उठाया हुआ है यानी इतने गंभीर हालात में भी हम एक-दूसरे के खिलाफ चीख रहे हैं और कीचड़ उछाल प्रतियोगिता में जुटे हैं।

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डॉ. चंद्र त्रिखा

मेरे सामने दो आईएएस अधिकारियों का ब्लॉग खुला है। शुरुआत में दोनों ने आबिदा परवीन की गाई एक गज़ल शहर सुनसान है किधर जाएं/खाक होकर कहीं बिखर जाएं का जिक्र किया है। विमला महाराष्ट्र कैडर से हैं और सुमेधा कटारिया हरियाणा केडर से। दोनों ने एक महत्वपूर्ण सवाल उठाया है जो आज के वक्त में ज़्यादा प्रासंगिक है। सवाल यह है कि एक ऐसे विकासशील देश के नागरिक होने के नाते, जिस देश में आबादी कहीं-कहीं गहरे घनत्व में है, हमने सामान्य सामाजिक बर्ताव करना भी क्यों नहीं सीखा।

हम उन योद्धाओं पर भी हमले कर रहे हैं जो हमारी जान बचाने के लिए अपनी जान का जोखिम उठा रहे हैं। यह एक हकीकत है कि हमने महामारी के इन दिनों में भी अपनी सोच नहीं बदली। हम पहले से ज्यादा साम्प्रदायिक हो चले हैं। मीडिया चैनल दो भागों में बंटे हैं। एक पर गोदी-मीडिया का लेबल चस्पां कर दिया गया है जबकि दूसरे भाग ने प्रगतिशीलता व प्रामाणिकता का बैनर उठाया हुआ है यानि इतने गंभीर हालात में भी हम एक-दूसरे के खिलाफ चीख रहे हैं, कीचड़-उछाल प्रतियोगिता में जुटे हैं। पूरे देश के राज्य दो खेमों में बंटे हैं। भाजपा-शासित और गैर भाजपा-शासित। ममता दीदी अपने मोदी-विरोधी तेवर छोड़ने को तैयार नहीं। कैप्टन अमरेंदर सिंह चाहते हैं कि उन्हें शराब-बिक्री की अनुमति मिले ताकि चार पैसे सरकारी खजाने में आएं। महाराष्ट्र में भीतरी विसंगतियां एवं टकराव थमने का नाम नहीं ले रहे। बिहार में अप्रवासी श्रमिकों को लेकर उठापटक जारी है। हम ऐसे वक्त में भी अपनी पुरानी आदतों से बाज नहीं आ रहे, जबकि पूरा सामाजिक ढांचा चरमराने लगा है। सोनिया गांधी भाजपा पर नफरत का वायरस फैलाने का आरोप लगा रही है जबकि इस वक्त उन्हें जो भी कहना था, बिना भाजपा का नाम लिए भी कह सकती थीं। बेहतर होता कि वह कोरोना-योद्धाओं की तारीफ में बयान दागती। पार्टी के कार्यकर्ताओं से सार्थक पहलकदमी की अपील करती।

नेताओं का एक वर्ग और मीडिया का एक वर्ग अभी भी स्थिति की गंभीरता का जमीनी अनुमान नहीं लगा पा रहा। उन्हें इस बात की खबर कम है कि आम आदमी इन दिनों बिछुड़ जाने वाले अपनों को कंधा भी नहीं दे पा रहा। लोग न गले लिपटकर रो पा रहे हैं न दु:ख बांट पा रहे हैं। शवों को चिता पर रखने के लिए भी चार आदमी नहीं जुट पा रहे, कब्रिस्तानों में कब्रों की खुदाई नहीं हो पा रही। वेतन में कटौती निजी संस्थानों की विवशता बन चली है। केंद्र सरकार ने भी डेढ़ वर्ष तक महंगाई भत्ता न बढ़ा पाने की घोषणा कर दी है। किसान अपनी फसलें अब भी मंडी में आराम से बेच नहीं पा रहे। बेचने के लिए लाए भी हैं तो उठाने वाले नहीं मिल पा रहे। बैंकों में पूरे वक्त काम हो ही नहीं पा रहा।

स्वाधीनता के 70 वर्ष बाद अब भी हमें यह बताने की ज़रूरत पड़ रही है कि सड़कों पर थूकेंगे तो जुर्माना लगेगा। देश का सामान्य आदमी अब तक सड़कों के किनारे लघुशंका निवारण करता रहा है। नाक साफ करते हैं तो दीवारों पर ही हाथ रगड़ते रहे हैं। जागरुकता के लिए अब कड़ी सजा का प्रावधान हो रहा है। हमने कभी सोचा भी नहीं था कि सार्वजनिक स्थलों पर छींकना भी खतरनाक है। मॉल बंद हैं, मगर जिंदगी ठहर नहीं गई। लेकिन मजदूरों व दिहाड़ीदारों की जिंदगी ठहर सी गई है। वे मुसीबत में हैं। रिक्शा चालक, आटो वाले, तांगे वाले, रेहड़ी वाले, खोमचे वाले, ये लोग भी करोड़ों में हैं, ये क्या करें, कहां जाएं?

इस समस्या के अनेक पहलू हैं। अनेक मोर्चे हैं, जिन पर जूझना अनिवार्य चुनौती है। यह महामारी ऐसी भयावह है जिसने महाबली अमेरिका, नखरेदार ग्रेट ब्रिटेन, कला पारखी फ्रांस, इटली, जर्मनी, स्पेन किसी को नहीं बख्शा। अभी अपने देश में 3 मई तक वर्तमान लॉकडाउन है। फिलहाल उम्मीद नहीं कि उसके बाद राहतें शुरू होंगी। जि़ंदगी को सामान्य पटरी पर लाने में बरसों लगेंगे। आवाजाही, रेल सेवा, सड़क परिवहन, विमान सेवा, इनकी सामान्य बहाली में भी छह माह से एक वर्ष तक की अवधि विशेषज्ञ आंक रहे हैं। उधर, गुप्तचर एजेसियां किसी आतंकी वारदात की आशंका की रपटें भी देने लगी हैं।

कुछ बातें ज़रूरी हैं जिन पर सोचना व अमल करना हर नागरिक की जिम्मेदारी है। यह जिम्मेदारी देश पर एहसान नहीं, अपने व अपने परिवारों व मित्रों के लिए इस जि़म्मेदारी का एहसास जरूरी है। पहली बात, अपने बुजुर्गों को संभाले रखें। यदि थोड़ी सी कोताही हुई तो इन बुजुर्गों को सम्मान की मृत्यु भी नसीब नहीं होगी। कंधा देने या राम नाम सत्य कहने की भी अनुमति शायद न मिले। दूसरा अपने छोटे बच्चों का मन घरों में लगाएं। वे बाहर की हवा नहीं ले पा रहे। हो सकता है लम्बी अवधि तक उन्हें हम बाहर न निकाल पाएं। यह अवधि चार से छह माह तो कम से कम है। इसलिए उन्हें व्यस्त रखें। मगर ज़्यादा चूमे नहीं। अपने पढ़ने वाले युवा बच्चों को आन-लाइन शिक्षा की आदत डाल ही लें। हो सकता है सामान्य शैक्षणिक गतिविधियों की बहाली में पूरा एक वर्ष लग जाए। यदि मन हो तो बेजुबान परिंदों को थोड़ा दाना डाल दें, पानी भी किसी बर्तन में डाल दें। इन दिनों ये भी तरस जाते हैं। मुस्लिम भाइयों से यही उम्मीद की जाती है कि वे भी नमाज घर पर रह कर अता करें और पुराने तौर-तरीकों पर परस्पर दोनों ओर गले मिलने की रवायत भी इस बार स्थगित रखें। इन्शा अल्लाह गले तो मिला ही जा सकता है, हालात के सामान्य होने पर।

यदि अखबार पढ़ते हैं तो अपने हॉकर को वक्त से पहले ही उसके वितरण-समय पर ही बिल अदा कर दें। यह उम्मीद न रखें कि वह जब कभी आएगा बिल मांगने, तब अदा करेंगे। यदि टीवी चैनलों पर जहरीली बहस चल रही हो तो उसे बंद कर दें और हो सके तो ई-मेल पर अपना विरोध भी जता दें। यह समय ज़हर उगलने या नफरत फैलाने का नहीं है।

और आखिर में एक विनम्र प्रार्थना बुद्धिजीवियों से। आज उषा गांगुली गई हैं, बीते दिनों सतीश गुजराल चले गए थे। ऐसी शख्सियतों को नमन्ा भी करें और याद भी कर लें। उषा गांगुली एक ऐसी नाट्यकर्मी थीं जिनका योगदान रंगमंच भुला नहीं सकता। हमारे ही क्षेत्र के नाट्य लेखक स्वदेश दीपक के नाटक कोर्ट मार्शल का अनेक बार मंचन कोलकाता, दिल्ली व मुम्बई में उन्होंने किया था। ऐसी शख्सियतों को याद करना भी ऋषि-ऋण से मुक्त होने जैसा है।

और आखिर में एक विनम्र मशविरा। कोरोना से बचाव के लिए होम्योपैथिक दवा जैल्सीमियम 1 एम और कैम्फर 1 एम की एक खुराक तीन दिन के अंतर से स्वयं भी लें, परिजनों को भी दें और आसपास भी बांट दें। और अंत में आबिदा की गाई उसी गज़ल का अंतिम शेर।

रैन अंधेरी है और किनारा दूर।

चांद निकले तो पार उतर जाएं।।

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