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विश्वविद्यालयों की गुणवत्ता पर आखिर कब सजग होंगे

अब अच्छी शिक्षा के लिए भारतीय छात्र अमेरिका और ब्रिटेन के विश्वविद्यालयों का रुख कर रहे हैं।

विश्वविद्यालयों की गुणवत्ता पर आखिर कब सजग होंगे
नई दिल्‍ली.दुनिया के शीर्ष सौ विश्वविद्यालयों की सूची में भारत का एक भी विश्वविद्यालय या संस्थान का शामिल नहीं होना चिंता की बात है। टाइम्स हायर एजुकेशन मैगजीन की यह सूची हमारे नीति-निर्माताओं को एक तरह से आईना भी दिखा रही है। यही नहीं अंतरराष्ट्रीय शैक्षणिक रैंकिंग एजेंसी क्यूएस की रिपोर्ट के अनुसार तो विश्व स्तर पर शीर्ष दौ सौ विश्वविद्यालयों में भी भारत का कोई विश्वविद्यालय शामिल नहीं है।
इससे देश के बड़े-बड़े शिक्षण संस्थानों और विश्वविद्यालयों पर एक सवालिया निशान जरूर लगता है। प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह से लेकर राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी तक देश में शिक्षा और शिक्षण संस्थानों की बदहाली पर चिंता जाहिर कर चुके हैं, लेकिन प्रमुख सवाल बना हुआ है कि भारतीय शिक्षण संस्थान प्रतियोगिता में क्यों पिछड़ रहें? एक तरफ हम 2020 तक महाशक्ति बनने की बात करते हैं।
यह दावा करते हैं भारत दुनिया की पांचवीं बड़ी अर्थव्यवस्था है, परंतु जमीनी स्तर पर वास्तविक तस्वीर एकदम उलटी है। ऐसा लगता है कि हम अपनी बुनियादी समस्याओं को दूर करने की बजाय ऐसे ही विकसित होने का सपना देख रहे हैं। आजादी के 65 साल बाद भी न तो सभी को शिक्षा मुहैया कराई जा सकी है, न ही रोजगार के अवसर ही प्रदान किए जा सके हैं। सबको शिक्षा का अधिकार देने वाला देश में कानून बन चुका है, लेकिन उसे अभी तक पूरी तरह लागू नहीं किया जा सका है।
कम बजट और अनदेखी के कारण आज हमारे शिक्षण संस्थानों का स्तर लगातार गिर रहा है। साथ ही गुणवत्ता के मानकों पर भी वे खरा नहीं उतर पा रहे हैं। जाहिर है ऐसे शिक्षण संस्थानों से निकलने के बाद छात्रों को रोजगार मिलने की गारंटी नहीं होती है। छात्र अधकचरी शिक्षा लेकर बाहर निकलते हैं, जिनका बाजार में कोई मोल नहीं होती है। एसोचैम के अनुसार तकनीकी और प्रबंधन संस्थानों से निकलने वाले मात्र 30 फीसदी छात्र ही नौकरी पाने के काबिल होते हैं।
ज्ञान के क्षेत्र में हम ऐसे शिक्षण संस्थानों के बल पर दुनिया से मुकाबला नहीं कर सकते हैं। पैसे वाले अपने बच्चों को विदेशों में भेज अच्छी शिक्षा दिला देते हैं। कुछ संस्थान खुले भी हैं, मगर उनमें शिक्षा काफी महंगी है और ये शिक्षण संस्थान गुणवत्ता के लिहाज से विश्वस्तरीय भी नहीं हैं। तो सवाल उठता है कि हम किस तरह के कौशल का विकास कर रहे हैं। अभी देश में 700 विश्वविद्यालय व 35539 कॉलेज हैं, लेकिन फिर भी उच्च स्तर के शिक्षण संस्थानों की कमी है।
प्राचीन काल में तक्षशिला, नालंदा व विक्रमशिला विश्वविद्यालयों का उच्च शिक्षा के क्षेत्र में वैश्विक स्तर पर दबदबा था। दुनिया भर से छात्र शिक्षा ग्रहण करने यहां आते थे। मगर अब अच्छी शिक्षा के लिए भारतीय छात्र अमेरिका और ब्रिटेन के विश्वविद्यालयों का रुख कर रहे हैं।
यदि शिक्षा और शिक्षण संस्थानों को विश्वस्तरीय बनाना है तो सरकार को शिक्षा सेक्टर पर जीडीपी का छह फीसदी से अधिक खर्च करना होगा, जैसा कि कोठरी आयोग ने सुझाव दिया था पर भारत सरकार ने कभी भी शिक्षा पर इतना खर्च नहीं किया है। साथ ही यह भी देखना होगा कि शिक्षा की गुणवत्ता को ऊपर उठाने को लेकर हमारी नीति और नीयत कैसी है।

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