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डायन के चंगुल से कब आजाद होगा भारत ?

झारखंड के पाटन प्रखंड के एक गांव में कुछ लोगों ने 80 साल की एक महिला शैरून बीबी को डायन बताकर बेलन से उसकी दोनों आंखें फोड़ दी, दांत तोड़ दिए और पीट–पीटकर उसे अधमरा कर दिया। पीटने वालों का आरोप था कि उस महिला की वजह से गांव के अलीजाम का बेटा मौत की कगार पर पहुंच गया है जबकि उसे कैंसर है।

डायन के चंगुल से कब आजाद होगा भारत ?
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झारखंड के पाटन प्रखंड के एक गांव में कुछ लोगों ने 80 साल की एक महिला शैरून बीबी को डायन बताकर बेलन से उसकी दोनों आंखें फोड़ दी, दांत तोड़ दिए और पीट–पीटकर उसे अधमरा कर दिया। पीटने वालों का आरोप था कि उस महिला की वजह से गांव के अलीजाम का बेटा मौत की कगार पर पहुंच गया है जबकि उसे कैंसर है।

बेटे का इलाज कराने की बजाय किसी बेकसूर महिला को दोष देकर उस पर जुल्म करना कहां का इंसाफ है। जादू टोना करने के संदेह में किसी महिला को पीटना, उसके साथ दुर्व्यवहार करना, उसके बाल मुंडवाकर और मुंह पर कालिख पोत कर गांव में घुमाना अथवा उसे डायन बताकर प्रताड़ित करना ग्रामीण समाज में कोई नई बात नहीं है।

गांवों में आज भी चुड़ैल या डायन की धारणा आम है। वहां लोगों को इस बात का पूरा विश्वास है कि डायन होती है और वो जादू-टोना करती है। इस बात की जड़ें इतनी गहरी हैं कि वे मानते हैं कि डायन को सजा मिलेगी तभी मुक्ति मिलेगी, इसलिए उसे मार दिया जाना चाहिए. लेकिन इस बात का जवाब कोई नहीं देता कि हमेशा औरत ही दोषी क्यों होती है?

कोई पुरुष इसका जिम्मेदार क्यों नहीं माना जाता? यह कैसा विरोधाभास है कि एक तरफ हम ज्ञान-विज्ञान, प्रौद्योगिकी और सूचना क्रान्ति के क्षेत्र में अपनी उपलब्धियों का डंका पीट रहे हैं और दूसरी तरफ भूख, बेरोजगारी, अशिक्षा, कुपोषण और अंधविश्वासों के दलदल में फंसा देश का एक ऐसा तबका है जिन तक आधुनिक सभ्यता की रोशनी भी नहीं पहुंच पाई है।

विकसित देशों की कतार में खड़े होने के सपने संजो रहे भारत में अंधविश्वास आज भी मुंह चिढ़ा रहे हैं। हम भले ही महिलाओं की उपलब्धियों का डंका पीटें, पर इस सत्य से इनकार नहीं किया जा सकता कि ग्रामीण नारी कि स्थिति आज भी दयनीय है। झारखंड के आदिवासी बाहुल्य क्षेत्र में डायन प्रथा गंभीर है। वहां की औरतें गरीबी, शराबखोरी और अंधविश्वास की गिरफ्त में हैं।

पति की सम्पत्ति और जमीन-जायदाद पर महिला का कोई हक नहीं है। विधवा होते ही ससुर, जेठ, देवर आदि उसका बच्चों के साथ घर में रहना मुश्किल कर देते हैं। इतना ही नहीं उस महिला को डायन घोषित कर उससे जुर्माना तक वसूला जाता है। यदि उस विधवा के पास कुछ जेवर है तो उसे गिरवी रखकर या सूखी लकड़ी बेचकर जो पैसा मिलता है उससे उसे दोषी ठहराने वालों को दो-तीन दिन तक खाना खिलाना पड़ता है।

वहशीपन की हद तो यह कि भोजन करते वक्त महिला को सामने पेड़ से बांध देते हैं और हड्डी चूस-चूस कर उस पर फेंकते जाते हैं। इतना ही नहीं फिर भी महिला अगर जबरन पति के घर में रहती है तो औरत की जिंदगी को खिलौना समझने वाले वहशी उसकी हत्या करने से भी गुरेज नहीं करते। कभी जादू-टोना के शक में, कभी गांव में हो रही दुर्घटनाओं, बीमारी या सूखा आदि के लिए एकल महिला को ही जिम्मेदार ठहराया जाता है।

असामाजिक तत्व अपने फायदे के लिए एकल महिला को डायन बताते हैं और उसकी जमीन पर कब्जा करने के लिए, शारीरिक संबंध बनाने के लिए या महिला द्वारा विरोध करने पर बदला लेने के लिए उसके बारे में गलत अफवाहें फैलाते हैं। अंश्विश्वास के चलते गांव वाले उसका बहिष्कार कर देते हैं और कई बार तो मार-पीट कर गांव से बाहर भी निकाल देते हैं।

ध्यान से देखने पर यह बात उजागर होती है कि इस सबके पीछे व्यक्ति का अपना स्वार्थ है। गावों में अक्सर एक-दो महिलाएं डायन के रूप में प्रचलित होती हैं। उनका सामाजिक बहिष्कार कर दिया जाता है। पुरुष ही नहीं अंधविश्वास की मारी औरतें भी उनसे भयभीत रहने लगती हैं। यह तथ्य सामने आया है कि किसी भी महिला को डायन घोषित करने के पीछे कई साजिश काम करती हैं।

देखा गया है कि जो महिला देखने में सुंदर न हो और जिसके बारे में आसानी से भयावह अफवाहें फैलाई जा सकें उसे डायन घोषित कर दिया जाता है। अधिक पूजा-पाठ करने वाली, संतानहीन, विधवा, जिसका पति परदेस में हो, कमजोर पति या कमजोर परिवार वाली औरतों पर भी इस तरह के आरोप लगाए जाते हैं। झाड़-फूंक करने वाले ओझा और तांत्रिक भी कई बार स्वार्थवश इसमें शामिल हो जाते हैं।

गांव के प्रभावशाली लोगों के साथ मिलकर वे इस षड्यंत्र को अंजाम देते हैं। जनजातियों के सीधेपन का भी फायदा उठाते हैं और उन्हें अपने ही परिवार को खत्म कर देने के लिए उकसाते हैं ताकि उनकी सम्पत्ति पर कब्जा कर सकें। कैसी विडबना है कि ‘डायन' को अपने ही परिवार या कुल के साथ विश्वासघाती ठहराया जाता है। यह साफ़ है कि इस सबका मूल कारण अशिक्षा है।

अशिक्षा एवं अज्ञान के कारण महिलाएं अंधविश्वासों और रूढ़ियों का विरोध नहीं कर पातीं। इसी का फायदा उठाकर उन्हें अंधविश्वासों और रूढ़ियों के नाम पर डराया-धमकाया जाता है। जाहिर है कि समाज के पिछड़े और गरीब तबके में आज भी महिलाओं के साथ घनघोर भेदभाव बरता जाता है। पुरुष का अंह और स्वयं को श्रेष्ठ बताने की भावना इतनी प्रबल है कि वह मानवता को नुक्सान पहुंचा रही है।

शिक्षित न होने की वजह से महिलाएं किसी भी बुराई का विरोध नहीं कर पातीं और चुपचाप जुल्म सहती रहती हैं, जबकि महिलाएं किसी भी देश की सामाजिक चेतना का प्रतीक हैं। भारत के स्वतन्त्रता संग्राम में भी औरतों ने अहम भूमिका निभाई थी। पंचायतों में महिलाओं को भले ही आरक्षण मिल चुका हो, लेकिन ग्रामीण महिलाएं आज भी कूप मंडूक बनी जी रही हैं।

हालांकि राष्ट्रीय एकल नारी अधिकार मंच इस दिशा में कुछ काम कर रहा है और उसके माध्यम से महिलाओं में कुछ जागृति आई है और वे मुखर भी हुई हैं, लेकिन सफर अभी लंबा है। उनके पूरे परिवेश को बदलना होगा। शिक्षा का उजाला ही उन्हें इस अंधियारे से मुक्ति दिला सकता है।

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