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जो लिखूंगा सच लिखूंगा...

हाल ही में पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह के प्रैस सलाहकार संजय बारू की पुस्तक आई, जिसमें सत्ता के गलियारे के अनेक विस्फोटक रहस्य उजागर हुए

जो लिखूंगा सच लिखूंगा...
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मैं जो भी लिखूंगा/सच लिखूंगा और सच के सिवाय कुछ नहीं लिखूंगा’ यह शपथ अनिवार्य होनी चाहिए हर उस व्यक्ति के लिए जो अपने संस्मरण लिखता है। मगर अदालतें गवाह हैं कि ऐसी शपथ लेने के बावजूद, बचाव पक्ष व आरोपी पक्ष के लोग ज्यादातर सच नहीं बोलते।

नटवर सिंह एक वरिष्ठ राजनेता, लेखक, कूटनीतिज्ञ व विचारक माने जाते हैं। लगभग 45 बरस तक वह नेहरू-परिवार के करीबी बने रहे। वैसे इस परिवार के करीबी माने जाने वालों से दूरियों के सिलसिले इंदिरा गांधी के शासनकाल में ही शुरू हो गए थे। गांधी का कोपभाजन बनने वालों में संजीवा रेड्डी, मोरारजी देसाई, अतुल्य घोष, निजलिंगप्पा आदि अनेक नेता शामिल थे। गांधी के बाद राजीव-काल में ऐसी दूरियों का सिलसिला निरंतर बढ़ता गया। जैसे इंदिरा-काल में भी असंतुष्टों ने कांग्रेस (ओ) बनाई थी, वैसे ही राजीव काल में कांग्रेस (तिवारी) गठित हुई थी। बाद में बाबू जगजीवन राम को भी ‘कांग्रेस फार डैमोक्रेसी’(सीएफडी) बनानी पड़ी थी। सोनिया काल में यद्यपि अलग से कांग्रेस का कोई नया गुट अस्तित्व में नहीं आया मगर ‘दरबार’ का सिलसिला अवश्य चला। उस ‘दरबार’ के दरबारियों में गैर राजनीतिज्ञों का प्रभामंडल ज्यादा चमका। वे लोग सर्वेसर्वा माने जाने लगे थे, जिनका अपना कोई जनाधार नहीं था। इनमें अहमद पटेल, अम्बिका सोनी, जनार्दन द्विवेदी, मोती लाल वोरा आदि शामिल थे।
बहरहाल लौटें फिलहाल संस्मरणों की ओर। राजनीतिक संस्मरण लिखने का सिलसिला भी नया नहीं है। इसकी शुरुआत भी महात्मा गांधी से हुई थी। उनकी पुस्तक ‘माई ऐक्सपैरिमेंट्स विद दी ट्रूथ’ खूब चर्चा में रही थी। बापू ने उसमें अपनी अनेक मानवीय दुर्बलताओं को स्वीकारा था, मगर बाद में उसके कुछ अंश प्रकाशन के समय काट दिए गए थे। बापू को एक पवित्र महात्मा मानने वालों को लगा था कि वैसी बातें शायद उन्हें एक सामान्य इंसान के रूप में प्रस्तुत कर सकतीं थीं। बाद में इस कड़ी में जुड़े मौलाना आजाद उनकी चर्चित संस्मरणात्मक पुस्तक में कुछ ऐसे ‘सच’ थे, जो उस समय प्रकाश में आते तो विवादों का बवंडर खड़ा हो जाता। इसलिए मौलाना ने अपनी मूल पांडुलिपि के साथ यह आग्रह जोड़ दिया था कि पुस्तक उनके निधन के बाद ही छपे।
उसके बाद तो यह सिलसिला लम्बा चला। इस कड़ी में महारानी गायत्री देवी, मीनू मसानी, पीलू मोदी, लाल कृष्ण आडवाणी, जसवंत सिंह, अरुण शौरी, कुलदीप नैयर, तवलीन सिंह, तस्लीमा नसरीन, खुशवंत सिंह आदि अनेकों नाम जुड़े। लगभग हर पुस्तक विवादों का विषय बनी। जहां-जहां लेखकों ने ‘सच’ बोला, वहां वहां बवंडर पैदा हुए।
हाल ही में पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह के प्रैस सलाहकार संजय बारू की पुस्तक आई, जिसमें सत्ता के गलियारे के अनेक विस्फोटक रहस्य उजागर हुए। अब नटवर सिंह की पुस्तक ‘वन लाइफ इज नॉट एनफ आई है तो उस पर भी बवंडर खड़े हो गए हैं। प्रत्युत्तर में सोनिया गांधी ने भी पुस्तक लिखने की घोषणा की है।
यह भी संभावना है कि सोनिया गांधी के सलाहकार उन्हें ऐसा कोई जोखिम न उठाने का मशविरा दें क्योंकि यह तय है कि ऐसी किसी पुस्तक के प्रकाशन पर अनके नए विवाद भी खड़े होंगे, जिनके स्पष्टीकरण देते देते वह स्वयं थकान महसूस करने लगेंगी।
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