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विश्लेषण विधानसभा चुनाव 2018 / पांच राज्यों के नतीजों से क्या बदलेगा देश में..?

भारत जैसे विशाल देश में अलग-अलग प्रदेशों में हर छह आठ महीने में कहीं न कहीं चुनाव होते रहते हैं। हार और जीत का सिलसिला भी चलता रहता है। यह लोकतंत्र का ऐसा अंग है, जिसके बिना स्वस्थ लोकतांत्रिक परंपराएं बने रहना संभव नहीं है। एक बहुत लंबा दौर ऐसा भी चला है, जब एक सिरे से बहुत सारे चुनाव कांग्रेस पार्टी ही जीतती रही।

विश्लेषण विधानसभा चुनाव 2018 / पांच राज्यों के नतीजों से क्या बदलेगा देश में..?
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भारत जैसे विशाल देश में अलग-अलग प्रदेशों में हर छह आठ महीने में कहीं न कहीं चुनाव होते रहते हैं। हार और जीत का सिलसिला भी चलता रहता है। यह लोकतंत्र का ऐसा अंग है, जिसके बिना स्वस्थ लोकतांत्रिक परंपराएं बने रहना संभव नहीं है। एक बहुत लंबा दौर ऐसा भी चला है, जब एक सिरे से बहुत सारे चुनाव कांग्रेस पार्टी ही जीतती रही।

विरोधी दलों को तब कभी कभार किसी-किसी प्रदेश में कामयाबी नसीब हो पाती थी। फिर एक दौर ऐसा आया, जब देश ने अलग-अलग हिस्सों में क्षेत्रीय दलों का उभार देखा। राज्यों तक जिन नेताओं की पहचान थी, उन्हें राष्ट्रीय फलक पर चमकते हुए देखा। इनमें से एक-दो ने देश की कमान भी संभाली। यह अलग बात है कि अनुभव की कमी और दूसरे कारणों के चलते वह लंबे समय तक देश की सेवा करने में सफल नहीं हो सके।

केन्द्रीय राजनीति की बात करें तो 1984 में इंदिरा गांधी की हत्या के बाद कांग्रेस को आखिरी बार पूर्ण बहुमत हासिल हुआ था। उसके कोई तीस साल बाद 2014 में आकर भारतीय जनता पार्टी को पूर्ण बहुमत हासिल हुआ। 1984 की उस प्रचंड कामयाबी के बाद से ही कांग्रेस का जनाधार खिसकना शुरू हुआ। आज हालत यह है कि वह लोकसभा में 48 सीटों पर सिमटी हुई है और चार को छोड़कर बाकी प्रदेशों से उसका बिस्तर बंध चुका है।

जिन राज्यों की सत्ता से वह बाहर हुई है, उनमें से अधिकांश में भारतीय जनता पार्टी की ही सरकारें स्थापित हुई हैं। कांग्रेस के पतन के कारणों का विवेचन करने लगें तो काफी समय लग जाएगा। मोटे तौर पर यह कहा जा सकता है कि उसने जन विरोधी नीतियों के चलते और एक ही परिवार की बंधक बनकर धीरे-धीरे पूरी तरह जन विश्वास खो दिया है।

ऐसा कभी नहीं हुआ कि किसी एक ही नेता के हाथों में अठारह साल तक कांग्रेस की बागडोर रही हो। जब नेहरू जैसे दिग्गज नेता थे, तब भी ऐसा नहीं हुआ परंतु विदेशी मूल की होने के बावजूद सोनिया गांधी के मामले में ऐसा हुआ। और यही वह काल था, जब कांग्रेस तमाम तरह के अंतरविरोधों से घिरी होने के बाद भी सत्ता में लौटी और उन्हीं के अध्यक्षकाल में उसका बुरी तरह अवसान भी हुआ।

अब उनके सुपुत्र राहुल गांधी के हाथों में कांग्रेस की कमान है, जिनके नेतृत्व को सभी कांग्रेसी स्वीकार करने को तैयार नहीं दिख रहे। बाहरी दलों में तो कोई उन्हें गंभीरता से ले ही नहीं रहा है क्योंकि जब से वह महासचिव, उपाध्यक्ष और अध्यक्ष पदों पर काबिज हुए हैं, तब से पार्टी बाईस चुनाव हार चुकी है। इसके विपरीत प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के नेतृत्व में इससे ज्यादा चुनाव भाजपा जीत चुकी है।

दिल्ली और पंजाब सहित कुछ अपवादों को छोड़ दें तो ज्यादातर राज्यों में भाजपा को जन विश्वास हासिल हुआ है। इस बीच मोदी सरकार ने जीएसटी और नोटबंदी जैसे आर्थिक सुधार भी किए हैं, जिन्हें लेकर कांग्रेस और विरोधी दलों ने मीडिया के एक अंग के जरिए बड़ा भारी वितंडा करने की पुरजोर कोशिशें भी की। इस समय भी पांच राज्यों में चुनावी प्रक्रिया जारी है।

छत्तीसगढ़ में दूसरे चरण के मतदान के साथ यह प्रक्रिया पूरी होने जा रही है, जबकि मध्य प्रदेश, राजस्थान, मिजोरम और तेलंगाना में अभी मतदान होना है। ग्यारह दिसंबर को जब संसद का मानसून सत्र शुरू होगा, उसी रोज पांच राज्यों के नतीजे भी घोषित होंगे। हिंदी पट्टी के तीन राज्यों मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में भाजपा की सरकारें हैं।

राजस्थान में उसकी स्थिति कमजोर मानी जा रही है, जबकि बाकी में वापसी के आसार हैं। इन राज्यों में हार जीत का कोई प्रभाव अगले साल 2019 में होने जा रहे लोकसभा चुनाव पर होगा, ऐसी कोई रीत नहीं है।

इसके बावजूद मीडिया के एक हिस्से में और कांग्रेस के कुछ नेता ऐसी हवा बनाने की चेष्टा कर रहे हैं। और इस दौरान प्रधानमंत्री के बारे में जिस तरह के झूठ फैलाने की कोशिश राहुल गांधी और उनके करीबियों की ओर से की गई है, उसे देखकर बहुतों को हैरानी हुई है।

कोई चुनाव जीतने के लिए इस प्रकार के हथकंडे भी अपना सकता है, सहज यकीन करना मुश्किल है। चुनाव आते-जाते रहेंगे, हार-जीत अहम नहीं है। महत्वपूर्ण यह है कि किस तरह से राजनीति कर रहे हैं।

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