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कैसा होना चाहिए भारत का अगला राष्ट्रपति

देश के अगले राष्ट्रपति के चुनाव को लेकर सरगर्मियां शुरू हो चुकी हैं।

कैसा होना चाहिए भारत का अगला राष्ट्रपति

देश के अगले राष्ट्रपति के चुनाव को लेकर सरगर्मियां शुरू हो चुकी हैं। इस क्रम में झारखंड की राज्यपाल द्रौपदी मुर्मू का नाम भी न जाने कहां से सामने आने लगा है। हालांकि इसका क्या आधार क्या है, ये समझ नहीं आ रहा।

पर उनकी चर्चा करते वक्त उन्हें आदिवासी बताया जा रहा है। क्या देश के राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार के नाम पर विचार करते हुए उसके आदिवासी, अल्पसंख्यक या जेंडर संबंधी बिंदुओं को महत्व देना चाहिए।

क्या यह पर्याप्त नहीं है कि राष्ट्रपति पद को इस तरह की शख्सियत सुशोभित करे, जिसका सारा देश सम्मान करता हो। वह बुद्धिमान हो और उसका सार्वजनिक जीवन बेदाग हो।

दुर्भाग्यवश अब देश में जाति, क्षेत्र और धर्म जैसे गौण प्रश्नों को अतिरिक्त महत्व मिलने लगा है। देखा जाए तो इसकी कोई आवश्यकता नहीं है। जब केआर नारायणन देश के दसवें राष्ट्रपति निवार्चित हुए तो सारा देश कह रहा था कि वे देश के पहले दलित राष्ट्रपति हैं।

तब उनके अंतरराष्ट्रीय मामलों के बड़े विद्वान होने या कि वे लब्धप्रतिष्ठ शिक्षाविद्ध हैं, पर कोई खास चर्चा नहीं हो रही थी। यह स्थिति दुर्भाग्यपूर्ण ही मानी जाएगी। हालांकि वे ईसाई धर्म स्वीकार चुके थे।

उनकी और उनकी पत्नी की कब्र नई दिल्ली के हुमायूं रोड के कब्रिस्तान में है। हालांकि यह सच है कि देश में राष्ट्रपति पद से किसे सुशोभित किया जाए, इस सवाल को विवादास्पद बहुत पहले बना दिया गया था।

भारत सरकार के पूर्व इंटेलिजेंस अधिकारी आरपीएन सिंह ने अपनी किताब नेहरू ए ट्रब्लड लिगेसी में दावा किया कि पंडित जवाहर लाल नेहरू नहीं चाहते थे कि डाॅ. राजेंद्र प्रसाद देश के राष्ट्रपति बनें।

नेहरू जी ने 10 सितंबर, 1949 को डाॅ. राजेंद्र प्रसाद को पत्र लिखकर कहा कि उन्होंने (नेहरू) और सरदार पटेल ने फैसला किया है कि सी. राजगोपालाचारी को भारत का पहला राष्ट्रपति बनाना सबसे बेहतर होगा। नेहरू ने जिस तरह से यह पत्र लिखा था।

उससे डाॅ. राजेंद्र प्रसाद को खासा कष्ट हुआ था और उन्होंने उस पत्र की एक प्रति सरदार पटेल को भिजवाई। पटेल उस वक्त बंबई में थे। सरदार पटेल उस पत्र को पढ़कर सन्न थे, क्योंकि उनकी इस बारे में नेहरू से कोई चर्चा नहीं हुई थी कि राजाजी (राजगोपालाचारी) या डाॅ. राजेंद्र प्रसाद में से किसे राष्ट्रपति बनाया जाना चाहिए।

न ही उन्होंने नेहरू के साथ मिलकर यह तय किया था कि राजाजी राष्ट्रपति पद के लिए उनकी पसंद के उम्मीदवार होंगे। इसके बाद डाॅ. राजेंद्र प्रसाद ने 11 सितंबर, 1949 को नेहरू को पत्र लिखा, जिसमें उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा था कि पार्टी में उनकी जो स्थिति रही है, उसे देखते हुए वह बेहतर व्यवहार के पात्र हैं।

खैर राजेंद्र बाबू देश के पहले राष्ट्रपति बने। वास्तव में डाॅ. राजेंद्र प्रसाद एक दूरदर्शी नेता थे। राजेंद्र बाबू के राष्ट्रपति भवन से मुक्त होने के बाद देश को सर्वपल्ली राधाकृष्णन के रूप में एक विद्वान राष्ट्रपति मिला।

वे हिंदू धर्म के भी प्रकांड विद्वान थे। डॉ. राधाकृष्णन ने अपने लेखों और भाषणों के माध्यम से विश्व को भारतीय दर्शन शास्त्र से परिचित कराया। राधाकृष्णन ने वेदों और उपनिषदों का भी गहन अध्ययन किया था।

आज भी इनका जन्मदिवस शिक्षक दिवस के रूप में मनाया जाता है। डॉ. राधाकृष्णन बहुआयामी प्रतिभा के धनी होने के साथ ही देश की संस्कृति को प्यार करने वाले व्यक्ति भी थे और भारत के तीसरे राष्ट्रपति के रूप में कार्यकाल 13 मई 1967 से 3 मई 1968 तक रहा। वे भी प्रमुख शिक्षाविद् थे।

वे जामिया मिलिया इस्लामिया विश्वविद्यालय के संस्थापकों में शामिल थे। उन्होंने जामिया मिलिया इस्लामिया को राष्ट्रवादी शिक्षण संस्थान के रूप में स्थापित किया। 1969 में असमय देहावसान के कारण वे अपना राष्ट्रपति कार्यकाल पूरा नहीं कर सके।

राष्ट्रपति पद की गरिमा को बट्टा लगना चालू हुआ राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद के समय से। उन्होंने 25 और 26 जून की रात को आपातकाल के आदेश पर दस्तखत करके देश में आपातकाल लागू कर दिया था।

अगली सुबह समूचे देश ने रेडियो पर इंदिरा की आवाज में संदेश सुना किए भाइयो और बहनो, राष्ट्रपति जी ने आपातकाल की घोषणा की है। इससे आतंकित होने का कोई कारण नहीं है...लेकिन सच इंदिरा की घोषणा से ठीक उलटा था।

देशभर में हो रही गिरफ्तारियों के साथ आतंक का दौर पिछली रात से ही शुरू हो गया था। फखरुद्दीन अली अहमद जैसे इंसान को कांग्रेस ने राष्ट्रपति भवन भेजकर देश के साथ अन्याय ही किया।

उसके बाद कांग्रेस वीवी गिरी, ज्ञानी जैल सिंह, आर, वेंकटरामण, शंकर दयाल शर्मा सरीखे नेताओं को राष्ट्रपति भवन भेजती रही। कहने की आवश्यकता नहीं कि इन सबका कार्यकाल बेहद औसत रहा, लेकिन लंबे अतराल के बाद देश को एपेजी अब्दुल कलाम के रूप में एक महान राष्ट्रपति मिला।

कलाम साहब 1931 में रामेश्वरम के पास धनुषकोटि में पैदा हुए थे। वे मृत्यु के बाद भी अमर हो गए। देश उन्हें मिसाइल मैन भी कहकर पुकारता है। वे भारतीय गणतंत्र के ग्यारहवें निर्वाचित राष्ट्रपति थे।

वे चार दशकों तक रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (डीआरडीओ) तथा भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) से जुड़े रहे। कलाम सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी व विपक्षी भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस दोनों के समर्थन के साथ 2002 में भारत के राष्ट्रपति चुने गए थे।

पांच वर्ष की अवधि की सेवा के बादए वह शिक्षा, लेखन और सार्वजनिक सेवा के अपने नागरिक जीवन में लौट आए। कलाम साहब को कभी मुसलमान के रूप में नहीं देखा गया।

वे पहले भारतीय थे। कलाम साहब के बाद देश को प्रतिभा सिंह पाटिल के रूप में एक बेहद सामान्य और संदिग्ध छवि वाले राष्ट्रपति को झेलना पड़ा। अपने राष्ट्रपतिकाल में प्रतिभा पाटिल ने नैतिकताओं और परंपराओं को दरकिनार करते हुए अपने पद की गरिमा को तार-तार किया।

उनकी विदेश यात्राओं में सरकारी खजाने का करीब 205 करोड़ रुपया खर्च हो गया। यह एक रिकॉर्ड है। खर्च का ब्यौरा आरटीआई से मिला। प्रतिभा पाटिल ने विदेश यात्राओं के दौरान सरकारी खजाने से अपने कई रिश्तेदारों कों भी विदेश यात्राएं करवाई।

कहने वाले तो यहां तक कहते हैं कि प्रतिभा पाटिल ने पुणे में बंगला बनाने के लिए तय सीमा से 6 गुना अधिक सेना की जमीन कथित रूप से हथिया ली थी। इस बीच, राष्ट्रपति प्रणब कुमार मुखर्जी का कार्यकाल आगामी 25 जुलाई को समाप्त हो रहा रहा है।

जाहिर तौर पर देश के 14वें राष्ट्रपति के चयन और चुनाव की प्रक्रिया चालू हो चुकी है। प्रणब कुमार मुखर्जी का कार्यकाल निर्विवाद रूप से उत्तम रहा। सारा देश उनकी विद्वता का कायल है,

पर इतनी अपेक्षा रहेगी कि अब देश का जो भी राष्ट्रपति निवार्चित हो तो उसकी जाति, मजहब, प्रांत वगैरह को महिमामंडित करने के स्थान पर उसके सार्वजनिक जीवन में किए कार्यों पर स्वस्थ चर्चा हो।

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