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प्रदीप सरदाना का लेख : चीन से सीख सकते हैं हम

हालिया टोक्यो ओलंपिक की पदक तालिका में अमेरिका और चीन पहले दो स्थान पर हैं। चीन ने ओलंपिक में अपनी मात्र 36 वर्षों की यात्रा में खुद को बेहद शक्तिशाली बना लिया है। लेकिन ओलंपिक में हम 7 पदक तक भी, एक सदी का लंबा सफर तय करने के बाद पहुंच सके। दरअसल उसकी खेल विशेषकर ओलंपिक को लेकर योजनाएं, नीतियां काफी अच्छी हैं। चीन उन प्रतियोगिताओं में अधिक भाग लेता है जिनमें पदकों की भरमार है या जिन प्रतियोगिताओं में अन्य देश कम दिलचस्पी रखते हैं। अपनी ऐसी ही योजनाओं और कूटनीति से चीन हर बार अपनी झोली पदकों से भर लेता है। चीन की ऐसी खेल नीतियों से हम भी सीख ले सकते हैं।

प्रदीप सरदाना का लेख : चीन से सीख सकते हैं हम
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प्रदीप सरदाना 

प्रदीप सरदाना

करीब साठ साल पहले अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति जॉन एफ केनेडी ने ओलंपिक को लेकर जो कहा था, वह आज भी सटीक है। केनेडी ने कहा था- किसी देश की शक्ति और प्रतिष्ठा की पहचान उस देश के अन्तरिक्ष यान और ओलंपिक में प्राप्त पदकों से होती है।

लगता है अमेरिका ने आज भी केनेडी के इस मूल मंत्र को पूरी तरह अपनाया हुआ है। साथ ही चीन, रूस, ब्रिटेन और जापान जैसे शक्तिशाली देश भी जाने अनजाने, कहीं न कहीं केनेडी के इसी 'आदर्श वाक्य' से प्रभावित हैं। ये देश अंतरिक्ष में भी अपने लड़ाकू विमानों, मिसाइलों से विश्व में अपना वर्चस्व बनाए हुए हैं। उधर ओलंपिक पदकों की तालिका में भी अक्सर ये ही पांच देश शिखर पर रहते हैं। हालिया टोक्यो ओलंपिक की पदक तालिका में भी अमेरिका और चीन पहले दो स्थान पर हैं, जबकि जापान, ब्रिटेन और रूस उनके बाद के तीन स्थानों पर अपना प्रभुत्व स्थापित किए हुए हैं, इसलिए अब समय आ गया है जब भारत को भी इस 'आदर्श वाक्य' को पूरी तरह अपना लेना चाहिए।

अंतरिक्ष शक्ति के मामले में तो हम काफी सशक्त हो गए हैं, लेकिन ओलंपिक खेलों मे हम अपना 120 वर्ष का सफर तय करने के बावजूद पदक पाने के मामले में बहुत पीछे हैं। हमारी इस कमजोरी पर चीन भी तंज कसने का मौका नहीं छोड़ता। हालांकि चीन इस बार खुद टोक्यो ओलंपिक में प्रथम स्थान पर आने से चूक गया। बीजिंग ओलंपिक में कुल 100 पदक पाने वाले चीन को टोक्यो में कुल 88 पदक मिले, लेकिन वह इठला इसलिए रहा है कि भारत उसे कई अन्य क्षेत्रों में तो कड़ी टक्कर देने में समर्थ है, लेकिन ओलंपिक में वह भारत से बहुत-बहुत आगे है। तभी चीन की सरकारी एजेंसी शिन्हुआ ने एक लेख में लिखा है-विश्व की दूसरी सबसे बड़ी जनसंख्या वाले देश भारत का टोक्यो ओलंपिक का अभियान मात्र एक स्वर्ण पदक के साथ समाप्त हो गया। भारत पदक जीतने वाले 93 देशों की सूची में 48वें नंबर पर है। भारत ने 127 खिलाड़ियों को भेजा, लेकिन सफलता सिर्फ 7 को मिली। उधर वहां के ग्लोबल टाइम्स अखबार ने भी कटाक्ष करते हुए लिखा-भारत को कुल 7 मेडल। इससे ज्ञात होता है कि भारत को कितनी ही जगह आधुनिकीकरण करने में लंबी दूरी तय करनी है। यह सच है कि चीन ने ओलंपिक में अपनी मात्र 36 वर्षों की यात्रा में खुद को बेहद शक्तिशाली बना लिया है। अमेरिका, रूस, ब्रिटेन और जापान जैसे देश भी सिर्फ चीन से भय खाते हैं। इन सभी की बड़ी और कड़ी स्पर्धा मुख्यतः चीन से रहती है, जबकि हमारा भारत ज्ञान, विज्ञान, तकनीक, स्वास्थ्य, योग, अध्यात्म, सिनेमा कृषि, सैन्य शक्ति सहित अंतरिक्ष शक्ति के प्रतीक लड़ाकू विमान और मिसाइलों आदि के मामले में तो बहुत आगे बढ़ गया है। खेलों में भी हम क्रिकेट में तो प्राय शिखर छूते रहते हैं, लेकिन ओलंपिक में हम 7 पदक तक भी,एक सदी का लंबा सफर तय करने के बाद पहुंच सके।

चीन की अनेक नीतियों की हम चाहे लाख आलोचना करें, लेकिन उसकी खेल विशेषकर ओलंपिक खेल प्रतियोगिताओं को लेकर योजनाएं, नीतियां काफी अच्छी हैं। चीन विश्व में जनसंख्या के मामले में सबसे बड़ा देश होने के बावजूद खेलों पर प्रतिदिन, प्रति व्यक्ति 6 रुपये 10 पैसे खर्च करता है। यह राशि कितनी बड़ी है, इसका अनुमान इससे लगाया जा सकता है कि भारत प्रतिव्यक्ति सिर्फ 3 पैसे ही खेलों पर खर्च करता है। उधर ब्रिटेन प्रति व्यक्ति 50 पैसे खर्च करता है। यूं अमेरिका खेलों पर 22 रुपये प्रति व्यक्ति खर्च कर शिखर पर है, लेकिन अमेरिका की आबादी जहां 33 करोड़ और ब्रिटेन की 6 करोड़ है, जो चीन और भारत से काफी कम है। उन जैसे विकसित देश के लिए खेलों पर यह राशि खर्च करना कोई खास मुश्किल नहीं है, लेकिन 144 करोड़ की जनसंख्या वाला चीन प्रति व्यक्ति प्रति दिन 6 रुपये से भी ज्यादा खर्च करे तो यह बहुत बड़ी बात है।

खेलों के लिए भारी भरकम बजट से अलग वहां एक बात और भी अहम है। वह यह कि चीन अपने यहां बच्चों को छह बरस की उम्र से ही खेलों की दुनिया में उतार देता है। सभी बचपन में ही खेलों में रुचि ले सकें, इसके लिए चीन में कई योजनाएं हैं। वहां स्कूल में तो खेल शुरू से अनिवार्य विषय है ही। साथ ही देश में 3 हज़ार स्पोर्ट्स स्कूल अलग से बनाए गए हैं। ये स्पोर्ट्स स्कूल अपने और अपनी विभिन्न खेल संस्थाओं के माध्यम से खेल प्रतिभाओं की तलाश करने में हर पल जुटे रहते हैं। इन स्कूल का उद्देश्य है कि देश के अधिक से अधिक बच्चों को खेल प्रशिक्षण और कड़ा अनुशासन देकर उन्हें कम उम्र में ही ओलंपिक के लिए तैयार किया जा सके। जो बच्चे खेलों में होनहार होते हैं उन्हें तराश कर स्पोर्ट्स कैंप में भेज दिया जाता है। सूचनाओं के अनुसार चीन के तीन लाख खिलाड़ी देश के 150 विशेष स्पोर्ट्स कैंप में प्रशिक्षण लेते हैं। चीन के युन्नान प्रांत की राजधानी खुनसिंग में हैगन बेस देश का सबसे बड़ा खेल केंद्र है। साथ ही वुहान और चच्यांग में भी शारीरिक शिक्षा और खेल संस्थान के विशाल केंद्र हैं। इस सबसे चीन में खेल संस्कृति व्यापक रूप ले चुकी है। माता-पिता अपने बच्चों को खेल प्रशिक्षण दिलाने में अहम भूमिका निभाते हैं। चाहे बच्चे उन्हें 'हानिकारक बापू' कहते रहें।

चीन में खेल में कड़ा प्रशिक्षण देने के साथ उन्हें पदक जीतने के गुण भी सिखाए जाते हैं। ओलंपिक में चीन अपने अधिक से अधिक खिलाड़ी भेजने के भरसक प्रयास करता है। खिलाड़ियों में पुरुषों से अधिक महिलाएं होती हैं। चीन ने इस बार टोक्यो में कुल 406 खिलाड़ी भेजे थे। उनमें 125 पुरुष और 281 महिलाएं थीं, क्योंकि चीन में कुल पदकों में से करीब 65 से 70 प्रतिशत पदक महिलाएं ही जीतती हैं।

फिर चीन उन प्रतियोगिताओं में अधिक भाग लेता है जिनमें पदकों की भरमार है या जिन प्रतियोगिताओं में अन्य देश कम दिलचस्पी रखते हैं। चीन ने 1984 में पहली बार ओलंपिक खेलों में हिस्सा लिया था। पहली बार में ही चीन ने तब 15 स्वर्ण सहित कुल 32 पदक जीतने में सफलता पाकर सभी को चकित कर दिया था। तभी से चीन 6 खेलों जिम्नास्टिक, टेबल टेनिस, निशानेबाजी, भारोत्तोलन, गोताखोरी और बैडमिंटन पर फोकस बनाए हुए है। चीन को कुल पदकों में 75 प्रतिशत पदक इन छह खेलों से मिलते रहे हैं। अपनी ऐसी ही योजनाओं और कूटनीति से चीन हर बार अपनी झोली पदकों से भर लेता है। चीन की ऐसी खेल नीतियों से हम भी सीख ले सकते हैं।

(ये लेखक के अपने विचार हैं।)

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