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ध्यान रहे हम भारतीय हैं

किसी को कुछ कहने की जरूरत कहां है। हमें दान करने में महारथ हासिल है। कोई क्षेत्र अछूता नहीं हमसे। हमने अपने घर दान में दे दिए और ट्रस्ट बना लिया। बेसहारा का सहारा बनने। धंधा करना और गुजारा करने की कला भी हम ही उन्हें सिखा रहे।

ध्यान रहे हम भारतीय हैं
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किसी को कुछ कहने की जरूरत कहां है। हमें दान करने में महारथ हासिल है। कोई क्षेत्र अछूता नहीं हमसे। हमने अपने घर दान में दे दिए और ट्रस्ट बना लिया। बेसहारा का सहारा बनने। धंधा करना और गुजारा करने की कला भी हम ही उन्हें सिखा रहे। आखिर हमें जो ईश्वर प्रदत्त है उसका उपयोग और उपभोग करना हमारा अधिकार है।

सरकारी जमीन को दान धर्म के लिए कब्जिया कर जगह-जगह धार्मिक स्थलों को खड़ा करने से सीधा राजनीति में घुसने की दिशा मिलती है। जितने बड़े बाहुबली बलशाली दान करते हैं, हम पूरा का पूरा मतलब हमारा इंट्रेस्ट तो बनता ही है, सफेद करके लौटा देते हैं। बदले में हम उनका दायां बायां हाथ पैर सब बन जाते हैं। दान को हम उन्हीं के लिए इस्तेमाल भी करते जो हमें दान करते हैं।

मतलब दान-दान का व्यवहार दना-दन चलता है। एक हाथ से दो दूसरे से लो की तर्ज पर। हमारे इंट्रेस्ट की कोई सीमा नहीं है। हम आकाश से लेकर पाताल तक अपना इंट्रेस्ट दिखा सकते। हमारे अपने भुखमरी के शिकार हों पर चुकाना केवल उन्हें ही है जिसने हमें दिया है। हम माल उन्हीं पर लगाते जिनके निशाने पर हम होते। हम इतने दिलवाले हैं कि दुनिया का कोई भी व्यक्ति हमारा दिल जीत सकता है।

कोई भी मतलब कोई भी। इसमें कोई भेदभाव की गुंजाइश नहीं। चाहे वह आतंकी, चोर, उचक्का, बड़ा अपराधी, धंधा करने वाला, सट्टा व्यापारी या दुनिया के नीचे से अंदर ही अंदर काम करने वाला हो। पर हो वो विदेशी ही। उसने हमसे कुछ मांगा, न भी मांगा तो भी हम दे देते। हम दानवीर हैं। दुश्मनों को भी अपना मानते। मीडिया की सुर्खियां बटोरने के लिए ऊल-जलूल बयान देना हमारा परम कर्तव्य है।

अपनों को देने से कोई कभी सुर्खियों में नहीं रहता। इसीलिए हमारी दानी वृत्ति बाहर वालों के लिए। धीरे धीरे हम केवल उन्हें ही अपना मानने लगते हैं और पूरा मान भी देते। घर की मुर्गी दाल बराबर भी नहीं रह जाती है। बाहरी लोगों के आने से हमारी कॉलर सोसायटी में तन जाती। इसमें हमारी शान बढ़ती है। हमारी संस्कृति गवाह है कि हमने हमेशा ही बाहरी को अपनाया पूरे तन मन धन से।

कभी पूछताछ नहीं की कि भाई तुम कितने दिन के लिए आए हो? कब अपने वतन लौटोगे? न कभी नहीं पूछेंगे। पूछना कितनी ओछी हरकत होती है। हम तो अतिथि देवो भव: के गूढ़ वाक्य पर चलते। फिर देवों को कोई धक्के मारकर घर से बाहर तो नहीं निकालता। घर पर खाने के लाले पड़े हों पर उन्हें सुई के बराबर भी तकलीफ न हो इसके लिए हम वचनबद्ध हैं। हमारी वचनबद्धता भी बाहर वालों के लिए है।

घर वाले तो वैसे भी हकीकत से वाकिफ होते हैं। इसीलिए हम उन्हें, अपनों के बदले का वो सब कुछ मतलब कपड़ा लत्ता खाना यहां तक कि नौकरी, धंधा और रोजगार तक सब कुछ मुहैया कराने लगते हैं। हमारा आतिथ्य उन्हें इतना भाता कि अब वे धीरे-धीरे यहीं के हो जाते हैं। दान अब यहां और ज्यादा काम आता। तब-जब कोई सोचे, उन्हें अपने वतन लौटाने की। उसके खिलाफ मोर्चा खोलने के लिए।

जिन पर खर्च किया उन्हें ऐसे थोड़ ही जाने दिया जाएगा। यदि वे कम हो जाएंगे तो हम जीतेंगे कैसे। नोट और वोट एक-दूजे के संगी साथी हैं। कभी भाई भतीजावाद नहीं दिखा इनमें। पर इतिहास गवाह है, विभीषण भी जगह-जगह हैं और रावण भी। दोनों की प्रवृत्ति भी पूरी तरह से एक समान है, पूरी राक्षसी। हमने दान से पूरा कारोबार खड़ा किया। पूरा अम्पायर। बाहरियों का सपोर्ट सिस्टम तैयार किया।

उस पर कोई पत्थर भी उछाल कर देखे। अपनों को बदनाम करने में कोई नुकसान नहीं। कुछ दिन उनके पीछे मानव अधिकार वालों जैसे लतीफे छोड़ दो। नए-नए की खोज में बहुत मददगार हैं ये। इतना ही नहीं हम इस दान को ऐसा सर्कुलेट करते कि जगह-जगह हमारे हिमायतदार हमारा स्वागत करने के लिए पलक पांवड़े बिछाए तैयार रहते। हमारी ताकत बढ़ती और अब हम विरोध करने के सब तरीकों से लैस रहते।

उम्मीद करने लगते हैं कि हमारा बाल बांका करने वाले हमसे डरकर कुछ दूरी बना लेंगे। पर तब ये भूल जाते कि जिन्हें हम डराने का दंभ भर रहे वे हमारे अपने हैं। उन्हें लूपहोल्स तो पता ही होंगे। मूषक क्या ऐसे ही वाहन बन गया। अपने स्वामी से तेज बुद्धि होगी न। दान करने वाले को ये क्यों लगे कि उसे स्वर्ग पहुंचाने का काम हम करेंगे। ना जी ना। दुश्मनों को कर्ज देने की बात करने वालों का साथ काफी नहीं है क्या...।

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