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नक्सलियों के खिलाफ भी आर-पार की लड़ाई हो

आज देश का एक बड़ा हिस्सा नक्सलवाद से प्रभावित है,151 जिले नक्सली आतंक की चपेट में हैं।

नक्सलियों के खिलाफ भी आर-पार की लड़ाई हो
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नई दिल्ली. आतंकवाद की तरह हमें नक्सलवाद के खिलाफ भी कठोर कदम उठाने की जरूरत है। जैसे आतंकवाद बेकसूरों को निशाना बनाता है और विकास को डिरेल करता है, वैसे ही नक्सलवाद निर्दोषों को अपनी अंध हिंसा का शिकार बनाता है और क्षेत्र के विकास रथ पर ब्रेक लगाता है। आतंकवाद की तरह नक्सलवाद भी इस मायने में खतरनाक है कि विचारधारा के नाम पर यह गरीब लोगों को अपना हथियार बनाता है और हिंसा के लिए उनका इस्तेमाल करता है।
आज देश का बड़ा हिस्सा नक्सलवाद से प्रभावित है। 151 जिले नक्सली आतंक की चपेट में हैं। आंध्र प्रदेश से पश्चिम बंगाल तक नक्सल प्रभावित क्षेत्रों का एक लाल गलियारा बन चुका है। यह लाल गलियारा आठ राज्यों-आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, ओडिशा, झारखंड, बिहार और पश्चिम बंगाल से गुजरता है। उत्तर प्रदेश, तमिलनाडु, कर्नाटक, असम, मेघालय, मणिपुर, त्रिपुरा और नागालैंड के कुछेक जिले भी नक्सल प्रभावित हैं।
संयोग से लाल गलियारा का क्षेत्र खनिज संपदा से भी भरपूर है। ऐसे में नक्सली आतंक के चलते इन क्षेत्रों में खनिज उत्खनन के कामकाज पर खतरा मंडराता रहता है। आंध्र प्रदेश और ओडिशा सीमा पर मुठभेड़ में 23 माओवादियों को मार गिराना पुलिस की बड़ी कामयाबी है। मारे गए माओवादियों में छह महिलाएं भी हैं। नक्सलियों का एक बड़ा गुट अब खुद को माओवादी कहने लगे हैं। दोनों राज्यों की संयुक्त पुलिस ने इसे मुठभेड़ को अंजाम दिया है।
इस साल इससे पहले भी सुरक्षा बलों के ऑपरेशनों में बिहार-झारखंड और छत्तीसगढ़ में कई नक्सली मारे गए हैं। गृह मंत्रालय के मुताबिक देश में करीब पंद्रह हजार नक्सली हैं। इनमें करीब नौ हजार एक्टिव व हथियारबंद हैं। लाल गलियारे की जंगलों में इनके कैंप हैं। इन्हीं कैंपों के जरिये नक्सली सुरक्षा बलों व नागरिकों पर हमला करते रहे हैं।
पिछले साल नक्सलियों ने 30 से ज्यादा सीआरपीएफ व पुलिस जवानों की हत्या की थी। दो साल पहले उसने 72 सीआरपीएफ जवानों की हत्या थी। 50 सालों में नक्सलियों ने सैकड़ों सुरक्षा जवानों व बेकसूर नागरिकों को मौत के घाट उतारे हैं। 1967 में माओ की विचारधारा से प्रभावित चारू मजूमदार ने पश्चिम बंगाल के नक्सलबाड़ी से सामाजिक क्रांति के मकसद से एक सशस्त्र किसान आंदोलन की शुरूआत की थी। जो बाद में नक्सल आंदोलन कहलाया। इसकी विचारधारा नक्सलवाद कहलाई।
1969 में चारू ने भाकपा माले का गठन किया। 80 के दशक में कानू सान्याल, जंगल संथाल, कदम मल्लिक, सीतारमैया आदि नेताओं के नेतृत्व में नक्सलवाद पसरा। अभी 13 के करीब नक्सली या समकक्ष विद्रोही गुट सक्रिय हैं। इनमें पीपुल्स वार, एमसीसी ( दोनों ने मिलकर सीपीआई माओवादी नाम से ग्रुप बना लिया है), सीपीआईएमएल-पीसीसी, उल्फा, पीपुल्स लिब्रेशन आर्मी, नेशनल लिब्रेशन फ्रंट ऑफ त्रिपुरा, कामतापुर लिब्रेशन आर्गेनाइजेशन और तमिलनाडु लिब्रेशन आर्मी आदि प्रमुख हैं। इनमें सीपीआई माओवादी का सबसे अधिक विस्तार है।
इन्हीं का मुख्य गढ़ आंध्र प्रदेश व ओडिशा में है। 90 के दशक के बाद नक्सली पूरी तरह हिंसा, अपहरण व लूट में लिप्त हो गए। वे माफियाओं के सिंडिकेट बन गए है। नक्सली गुटों को विदेश से मदद मिलती रही है व पाक खुफिया एजेंसी आईएसआई भी इसका इस्तेमाल करती रही है। ऐसे में अब केंद्र सरकार को चाहिए कि आतंकवाद की तरह ही नक्सलियों व माओवादियों के खिलाफ आर-पार की लड़ाई लड़े। इनका खात्मा जरूरी है।
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