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डॉ. मोनिका शर्मा का लेख : सोच बदलने से रुकेगी हिंसा

आज महिलाएं बाहर ही नहीं घर के भीतर भी सुरक्षित नहीं हैं। उनके साथ हिंसा और प्रताड़ना की घटनाएं दुनियाभर में चिंता का विषय हैं। दरअसल, महिलाओं के साथ होने वाली हिंसा के बीज उस मानसिकता से पोषित होते हैं, जिसमें उन्हें मनुष्य होने का मान ही नहीं दिया जाता। जरूरत इस बात की है कि सामाजिक सोच में बदलाव आए। हर स्तर पर औरतों को दोयम दर्जा देने की मानसिकता जड़ से खत्म की जाए। आधी आबादी के लिए घर के भीतर और बाहर सुरक्षित माहौल बनाने के लिए विचार और व्यवहार के धरातल पर बदलाव जरूरी हैं। संस्कार और संवेदनाओं को पोषित किए बिना यह सिलसिला नहीं रुकेगा।

डॉ. मोनिका शर्मा का लेख : सोच बदलने से रुकेगी हिंसा
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डॉ. मोनिका शर्मा

संवेदनाओं और सोच के धरातल पर आज भी महिलाओं के प्रति शोषण और दोयम दर्जे की सोच बरकरार है। भारत ही नहीं दुनियाभर में महिलाओं के प्रति घरेलू हिंसा, मानसिक प्रताड़ना और उत्पीड़न की घटनाएं बढ़ रही हैं। कोरोना काल में भी घरेलू हिंसा और मानसिक प्रताड़ना की घटनाएं हमारे देश ही नहीं दुनिया के हर हिस्से से सामने आए हैं। भारत में तो आइसोलेशन केंद्रों में मरीज़ों के साथ दुष्कर्म और छेड़छाड़ जैसे मामले भी सामने आए हैं। कहना गलत नहीं होगा कि कोरोना की जिस आपदा ने जीवन को एक अन्य सिरे से समझने का अवसर दिया है, उस संकट के दौर में भी महिलाओं के साथ हुई ऐसी अमानवीय घटनाएं औरतों के प्रति मौजूद विकृत सोच की ही बानगी बनी हैं।

गौरतलब है कि अंतरराष्ट्रीय महिला हिंसा उन्मूलन दिवस के लिए साल 2020 का विषय भी इस महामारी से उपजी स्थितियों से ही जुड़ा है। ऑरेंज द वर्ल्ड-फंड, रिस्पोंड, प्रीवेंट, कलेक्ट इस वर्ष की थीम है। जो कोविड के प्रकोप के बाद से, महिलाओं व लड़कियों के खिलाफ सभी प्रकार की हिंसा, विशेष रूप से घरेलू हिंसा के बढ़ने से जुड़ी रिपोर्ट्स को लेकर काम करने का उद्देश्य लिए है। इसके तहत कोविड-19 महामारी के बढ़ते संकट के बीच महिलाओं के विरुद्ध हो रही हिंसा को रोकने के लिए वैश्विक स्तर पर सामूहिक प्रयास की जरूरत पर जोर दिया जा रहा है। यह विषय कोरोना के दौर में महिलाओं के खिलाफ हिंसा को संबोधित करने को प्राथमिकता देने और आधी आबादी की सुरक्षा को लेकर गंभीर प्रयास किए जाने की जरूरत से जुड़ा है।

घर के भीतर हों या बाहर, आधी आबादी के साथ हो रही हिंसक घटनाओं के आंकड़े संयुक्त राष्ट्र संघ के लिए भी चिंता का विषय बने हुए हुए हैं। गौरतलब है कि स्त्रियों के प्रति होने वाली हिंसा के उन्मूलन के लिए आज का खास दिन मनाया जाता है। अंतरराष्ट्रीय महिला हिंसा उन्मूलन दिवस, दुनिया के हर कोने में आधी आबादी के विरुद्ध हिंसा रोकने, जागरूकता लाने और संवेदनशील परिवेश बनाने की कोशिशों पर विमर्श का दिन होता है। ऐसी योजनाओं को व्यावहारिक धरातल पर उतारने के प्रयासों को बल दिया जाता है, जो हर उम्र की औरतों को शारीरिक-मानसिक प्रताड़ना से बचाने में कारगर हो सकते हैं। विचारणीय है कि असुरक्षा के ऐसे हालात महिलाओं से जीने का सहज और सकारात्मक परिवेश भी छीन रहे हैं। सयुंक्त राष्ट्र संघ के मुताबिक महिलाओं के खिलाफ हिंसा मानवाधिकार का उल्लंघन है जिसका सबसे अहम्ा कारण उनके प्रति भेदभाव की मानसिकता है। व्यापक रूप से देखा जाए तो संस्कारहीन सोच और संवेदनाओं से रीत रहा मन ही ऐसी विकृत, हिंसक और भेदभाव भरी मानसिकता को पोषण दे रहे हैं। यही वजह है कि हमारे समाज में घर के बाहर तो महिलाओं की सुरक्षा और सम्मान एक बड़ा सवाल है ही, दहलीज के भीतर भी हालात कुछ अच्छे नहीं हैं। कुछ समय पहले आई यूएन वर्ल्ड पापुलेशन फंड और इंटरनेशनल सेंंटर फॉर रिसर्च ऑन वीमेन की रिपोर्ट में देश के 7 राज्यों में किए गए सर्वे के मुताबिक आज भी 10 में से 6 मर्द अपनी पत्नी के साथ हिंसक व्यवहार करते हैं। ऐसे आंकड़े हमारे समाज और परिवार का वो स्याह चेहरा दिखाते हैं जहां स्त्रियां अपने ही आंगन में, अपने ही लोगों की हिंसा झेलने को विवश हैं।

इस रिपोर्ट में 60 फीसदी पुरुषों ने स्वीकारा है कि वे अपनी पत्नी के साथ हिंसक बर्ताव करते हैं। ऐसे आंकड़े दहलीज के भीतर होने वाले स्त्रियों के भावनात्मक और शारीरिक उत्पीड़न का खुलासा करने को काफी है। यूनाइटेड नेशन्स की एक रिपोर्ट के अनुसार भी भारत में दो तिहाई महिलाएं हिंसा का शिकार हैं। इतना ही नहीं 2009 में राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण की रिपोर्ट के मुताबिक हमारे देश में 40 फीसदी महिलाएं रोज किसी न किसी बहाने पति की मारपीट का शिकार बनती हैं। कुछ समय पहले आई यूनिसेफ की एक रिपोर्ट के मुताबिक देश में 15 से 19 साल की 25 लाख शादीशुदा लड़कियां कभी न कभी यौन और भावनात्मक हिंसा का शिकार हुई हैं। इतना ही नहीं रंजिश के चलते प्रतिशोध की भावना से भी महिलाओं से दुर्व्यवहार के मामले सामने आते हैं। महिलाओं से बेहूदगी के वीडियो बनाकर सोशल मीडिया पर पोस्ट, ऑनलाइन ट्रोलिंग व साइबर क्राइम जैसे अपराध भी दंश बने हुए हैं। समाज में मौजूद संवेदनहीनता और स्त्रियों के प्रति भेदभाव भरी सोच का ही नतीजा है कि प्रेम या शादी जैसे मसले पर उनकी असहमति भर एसिड अटैक और सामूहिक दुष्कर्म जैसी बर्बर घटनाओं का कारण बन जाती है। ऐसे में समझना मुश्किल नहीं कि हिंसा उन्मूलन के लिए गंभीर प्रयास किए जाने की दरकार है।

संयुक्त राष्ट्र के महिलाओं के सशक्तीकरण, सुरक्षा के क्षेत्र में कार्य करने वाले महिला प्रभाग के मुताबिक दुनियाभर में औरतें मानसिक और दैहिक पीड़ा को झेलने को विवश हैं। संयुक्त राष्ट्र के आंकड़ों के मुताबिक दुनिया भर में लगभग 15 करोड़ किशोर लड़कियां अपने जीवन में कभी-न-कभी यौन उत्पीड़न का शिकार होती हैं। हिंसा की शिकार 50 प्रतिशत से अधिक महिलाओं की हत्या उनके परिजनों द्वारा ही की जाती है। 3 अरब महिलाएं वैवाहिक बलात्कार की शिकार होती हैं। हालात इतने भयावह हैं कि वैश्विक स्तर पर मानव तस्करी के शिकार लोगों में 50 फीसदी वयस्क महिलाएं हैं। डब्ल्यूएचओ के मुताबिक़ हर दिन 3 में से 1 महिला शारीरिक हिंसा झेलती हैं। चिंतनीय है कि कोविड-19 की विपदा ने महिलाओं के लिए हिंसा की स्थितियां और बढ़ा दी हैं।

देखा जाए तो बाहर ही नहीं घर में भी औरतों को लेकर मानसिकता में खास बदलाव नहीं आया है। मौजूदा दौर में घर के कामकाज के साथ-साथ औरतों को बाहर की जिम्मेदारी तो मिल गई पर उसके आत्मसम्मान और अस्तित्व की मोल आज भी कुछ नहीं आंका जाता। पत्नी पर हाथ उठाना या तानेबाजी करना कई पुरुष अपना हक समझते हैं। कभी दहेज के कभी बेटी को जन्म देने का उलाहना देने के नाम पर महिलाओं को ससुराल वालों और पति का दुर्व्यवहार झेलना पड़ता है। आम धारणा है कि जो महिलाएं कामकाजी हैं, वे घरेलू हिंसा का शिकार नहीं होतीं। 2005-06 में हुए एक सर्वे में यह बात सामने आ चुकी है नौकरी करने वाली लगभग 80 फीसदी महिलाओं को गृहिणियों की तुलना में पति की ज्यादतियों का ज़्यादा शिकार होना पड़ता है। अपने साथी द्वारा किये गए शारीरिक और यौन दुर्व्यवहार की शिकार 42 फ़ीसदी महिलाएं चोटिल हो जाती हैं।

दरअसल, महिलाओं के साथ होने वाली हिंसा के बीज उस मानसिकता से पोषित होते हैं, जिसमें उन्हें मनुष्य होने का मान ही नहीं दिया जाता। जरूरत इस बात की है कि सामाजिक सोच में बदलाव आए। हर स्तर पर औरतों को दोयम दर्जा देने की मानसिकता जड़ से खत्म की जाए। आधी आबादी के लिए घर के भीतर और बाहर सुरक्षित माहौल बनाने के लिए विचार और व्यवहार के धरातल पर बदलाव जरूरी हैं। संस्कार और संवेदनाओं को पोषित किए बिना यह सिलसिला नहीं रुकेगा।

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