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प्रभात कुमार रॉय का लेख : नाटो के साथ सतर्क दूरी जरूरी

नॉटो के सेक्ट्ररी जनरल जेंस स्टोलनबर्ग भले ही भारत के साथ निकट सहयोग कायम करने के लिए उत्सुक हैं, किंतु चीन के विस्तारवाद का प्रबल प्रतिरोध करते हुए भी भारत वस्तुतः अमेरिका के नेतृत्व वाले सैन्य गुट नॉटो में शामिल नहीं होगा। भारत यदि नॉटो शक्तियों के साथ अपने निकट संबंध स्थापित करेगा तो फिर रूस सरीखे भरोसेमंद दोस्त को पूरी तरह से गंवा देगा, क्योंकि नॉटो ताकतें रूस को अपना प्रबल विरोधी करार दे रही हैं। अतः विश्वपटल पर शानदार कूटनीतिक संतुलन को कायम बनाए रखते हुए भारत को अपनी अनुभव सिद्ध समझदारी से काम लेना होगा। भारत की स्पष्ट विदेशनीति है कि सभी विश्व शक्तियों के साथ अपने मधुर कूटनीतिक संबंधों को कायम रखना है।

प्रभात कुमार रॉय का लेख : नाटो के साथ सतर्क दूरी जरूरी
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प्रभात कुमार रॉय 

प्रभात कुमार रॉय

रायसीना डॉयलाग के पटल पर विश्व को संबोधित करते हुए नार्थ अटलांटिक ट्रिटी आर्गेनाइजेशन (नॉटो) के सेक्ट्ररी जनरल जेंस स्टोलनबर्ग ने फरमाया कि ऩॉटो वस्तुतः भारत के साथ अत्यंत निकट ताल्लुक कायम करने के बेहद उत्सुक है। रायसीना डायलॉग वस्तुतः विश्व के राजनीतिक एवं आर्थिक मुद्दों पर चर्चा करने के लिए आयोजित किया जाने वाला एक वार्षिक सम्मेलन है, जिसका आयोजन भारत के विदेश मंत्रालय और ऑब्जर्वर रिसर्च फाऊडेशन द्वारा संयुक्त रूप से किया जाता है। वर्ष 2016 में पहली दफा रायसीना डायलॉग आयोजित किया गया। रायसीना डॉयलॉग के माध्यम से भारत ने विश्वपटल पर एक खुले विचार विमर्श का आगाज अंजाम दिया ताकि दुनिया के समक्ष कड़ी चुनौतियां पेश करने वाली वैश्विक समस्याओं का संयुक्त तौर पर मिलकर निदान ढूंढा जाए।

नॉटो के सेक्ट्ररी जनरल ने फरमाया कि हिंद प्रशांत क्षेत्र की संयुक्त सुरक्षा के लिए भारत सरीखे विश्व के सबसे जनतांत्रिक देश के साथ और अधिक नजदीकियों के साथ नॉटो घनिष्ठ सहयोग स्थापित करना चाहता है। नॉटो सैक्ट्ररी जनरल जेंस स्टोलनबर्ग कहते हैं कि नॉटो द्वारा रुस और चीन सरीखे विरोधी देशों के साथ कूटनीतिक बातचीत को बाकायदा जारी रखा गया है, किंतु अभी तक नॉटो का भारत के साथ निरंतर बातचीत करने का कोई रिश्ता कायम नहीं हो सका है, जबकि वर्ष 2010 से निरंतर नॉटो और चीन के मध्य वार्षिक मिलिट्री मीटिंग आयोजित की जाती रही है। नॉटो का संक्षिप्त परिचय है कि नॉटो का मुख्यालय ब्रुसेल्स, बेल्जियम में स्थित है। 1949 में नॉटो की स्थापना अंजाम दी गई और इसके 12 संस्थापक देश, संयुक्त राज्य अमेरिका, बेल्जियम, कनाडा, डेनमार्क, फ्राँस, आइसलैंड, इटली, लक्ज़मबर्ग, नीदरलैंड, नॉर्वे, पुर्तगाल और यूनाइटेड किंगडम हैं। वर्तमान में नॉटो में 29 देश शामिल हैं। नॉटो के सेक्ट्ररी जनरल साहब ने कहा कि हिंद प्रशांत क्षेत्र में साउथ कोरिया, जापान, ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड के साथ नॉटो द्वारा एक सशक्त साझेदारी स्थापित की जा चुकी है।

1947 में आजादी के पश्चात भारत द्वारा गुटनिरपेक्ष विदेशनीति का अनुसरण किया गया। द्वितीय विश्वयुद्ध के तत्पश्चात दुनिया मुख्यतः दो शक्तिशाली सैन्य खेमों विभाजित हो गई थी। एक तरफ अमेरिका के नेतृत्व में नॉटो मिलिट्री का खेमा था और दूसरी तरफ सोवियत रूस की कयादत में वारसा मिलिट्री पैक्ट का खेमा था। भारत द्वारा दोनों सैन्य खेमों से बराबर की दूरी कायम बनाए रखी गई। भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू, यूगोस्लाविया के राष्ट्रपति मार्शल टीटो, इजिप्ट के राष्ट्रपति कर्नल नारिस, इंडोनेशिया के राष्ट्रपति डा.सुकर्ण आदि नेताओं के द्वारा विश्वपटल पर गुटनिरपेक्ष आंदोलन की आधारशिला रख दी गई। शनैः शनैः गुटनिरपेक्ष आंदोलन ताकतवर होता गया और दुनिया के तकरीबन 150 से अधिक देश इस आंदोलन में शामिल हो गए। यहां तक कि क्यूबा सरीखे अनेक साम्यवादी देश भी गुटनिरपेक्ष आंदोलन के सदस्य देश बने। वर्ष 1991 में सोवियत रूस के पूर्ण पराभव के पश्चात वारसा पैक्ट का अंत हो गया और अमेरिका के नेतृत्व में दुनिया एक ध्रुवीय बन गई और गुटनिरपेक्ष आंदोलन का महत्व समाप्त हो गया। विश्वपटल पर वर्ष 2010 के बाद एक महाशक्ति के तौर पर चीन का उदय हुआ और दुनिया फिर से दो शक्तिशाली ध्रुवों के मध्य विभाजित होते हुए प्रतीत हुई। अपने पराभव के पश्चात मार्च 2014 में रूस ने भी अपने सैन्य तेवरों को पुनः प्रदर्शित किया और नॉटो को ललकारते हुए यूक्रेन के क्रिमिया पर अपना सैन्य आधिपत्य स्थापित कर लिया। सीरिया में सैन्य दखंलदाजी अंजाम देकर रूस ने नॉटो शक्तियों को प्रबल चुनौती दी। चीन ने विस्तारवादी आचरण अंजाम देते हुए साउथ चाइना सागर के अनेक देशों के द्वीपों पर अपना वर्चस्व स्थापित कर लिया। भारत और चीन के मध्य सरहद एलएसी पर अतिक्रमण करके अपनी सैन्य धृष्टता का परिचय दिया।

ऐतिहासिक तौर पर भारत कदाचित किसी सैन्य गुट में शामिल नहीं हुआ है। सोवियत रूस के साथ अपनी घनिष्ठ तौर पर आर्थिक निकटता कायम रखते हुए भी भारत द्वारा सोवियत रूस की हंगरी, पौलैंड और चेकोस्लाविया में सैन्य दखंलदाजी का विरोध किया गया और भारत द्वारा 1979 में अफगानिस्तान में सोवियत रूस की सैन्य दखंलदाजी का कदापि समर्थन नहीं किया गया। उत्तरी कोरिया और वियतनाम में अमेरिका के सैन्य हस्तक्षेप का भारत ने पुरजोर विरोध किया। रूस के साथ भारत की पराम्परागत दोस्ती सदैव कायम बनी रही है। अमेरिका के प्रबल एतराज के बावजूद भारत ने रूस के साथ बड़े रक्षा सौदे अंजाम दिए हैं। रूस और चीन के मध्य निकट दोस्ती कायम है और इस दोस्ती में अब ईरान भी शामिल हो गया है। वर्ष 2001 में 9-11 के जेहादी आतंकवादी आक्रमण के पश्चात अमेरिका की नीतियों में बुनियादी परिवर्तन प्रकट होने लगा और भारत और अमेरिका निकट आने लगे। जेहादी आतंकवाद का खात्मा करने की गरज से जब नॉटो सेनाओं द्वारा जब अफगानिस्तान की राजधानी काबुल पर हमला किया गया तो भारत ने इसका कदाचित विरोध नहीं किया। यही प्रस्थान बिंदु है कि पाकिस्तान के प्रति अमेरिका की नीति बदलने लगती है और डोनॉल्ड ट्रंप के कार्यकाल में अपने चरम बिंदु पर पहुंचती है, जबकि अमेरिका द्वारा पाकिस्तान की सैन्य और आर्थिक मदद बंद कर दी जाती है। भारत की स्पष्ट विदेशनीति है कि वह किसी सैन्य गुट में कदापि शामिल होने के लिए लालायित नहीं है। भारत, अमेरिका जापान व ऑस्ट्रेलिया का समूह क्वाड यकीनन एक सैन्य गुट नहीं है, जिसमें कि भारत एक सक्रिय किरदार निभा रहा है। लेकिन क्वाड सामरिक रूप से एक शक्तिशाली समूह जरूर है।

नॉटो के सेक्ट्ररी जनरल जेंस स्टोलनबर्ग भले ही भारत के साथ निकट सहयोग कायम करने के लिए उत्सुक हैं, किंतु चीन के विस्तारवाद का प्रबल प्रतिरोध करते हुए भी भारत वस्तुतः अमेरिका के नेतृत्व वाले सैन्य गुट नॉटो में शामिल नहीं होगा। भारत की स्पष्ट विदेशनीति है कि सभी विश्व शक्तियों के साथ अपने मधुर कूटनीतिक संबंधों को कायम बनाए रखना है। भारत किसी वैश्विक खेमे में नहीं दिखना चाहता है। क्वाड को लेकर जो गलतफहमियां भारत और रूस के मध्य उत्पन्न हो गई थी, उनका भी बाकायदा निराकरण कर दिया गया है। सऊदी अरब की कयादत में इस्लामिक देशों के संगठन में भारत ने पाकिस्तान को दरकिनार करके अपना दबदबा कायम किया है, किंतु साथ ही साथ ईरान के साथ अपने संबंध को कदापि कमजोर नहीं होने दिया है। भारत यदि नॉटो शक्तियों के साथ अपने निकट संबंध स्थापित करेगा तो फिर रूस सरीखे भरोसेमंद दोस्त को पूरी तरह से गंवा देगा, क्योंकि नॉटो ताकतें रूस को अपना प्रबल विरोधी करार दे रही हैं। अतः विश्वपटल पर शानदार कूटनीतिक संतुलन को कायम बनाए रखते हुए भारत को अपनी अनुभव सिद्ध समझदारी से काम लेना होगा।

(लेखक विदेश मामलों के जानकार हैं, ये उनके विचार हैं।)

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