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अरविन्द मोहन का लेख : रेटिंग देखेें या हालात

जहां तक इस रेटिंग का सवाल है तो यह हर साल होती है और केटो इंस्टीट्यूट तो अमेरिका की सबसे पुरानी संस्थाओं में एक है। पिछले साल भारत को 94वां स्थान मिला था, पर एक साल में सत्रह पोजिशन नीचे आना भी एक बड़ा मसला है, पर सबसे बड़ी बात भारत को ‘आजाद’ वाली ग्रेडिंग से नीचे करके ‘हाफ फ्री’ की श्रेणी में डाल देना है। रेटिंग पर एक हद तक सहमत होने का यह मतलब नहीं है कि भारत के न्ाक्शे से छेड़छाड़ या कश्मीर को भारत से अलग दिखाने पर भी सहमति है। यह घोर निन्दनीय काम है।

अरविन्द मोहन का लेख : रेटिंग देखेें या हालात
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अरविन्द मोहन

अरविन्द मोहन

आजादी मापने की चीज है या नहीं अनुभव करने की चीज है या नहीं या फिर देश और नेता के नाम पर सब कुछ भूल जाने की आदत डाल लेनी चाहिए, यह सवाल अमेरिका की संस्था, केटो इंस्टीट्यूट और कनाडा की संस्था फ्रेजर इंस्टीट्यूट द्वारा जारी दुनिया के 162 देशों की रैंकिंग के बाद ढंग से उठाए जाने चाहिए थे क्योंकि इसमें भारत की आजादी को 'आधी' बताया गया है और उसकी रैंकिंग 94वें स्थान से गिरकर 111 स्थान पर आ गई है।

इस रिपोर्ट के साथ जो नक्शा लगाया गया है वह और चौंकाने वाला है, क्योंकि उसमें पूरे जम्मू और कश्मीर को बाहर कर दिया गया है और हैरानी की बात है कि इतनी बड़ी चूक या शरारत के बाद भी भारत की तरफ से इस बात पर आपत्ति भी नहीं की गई है। यह काम भी एक कांग्रेसी सांसद ने किया। यह चुप्पी कोई गलती भी नहीं लगती। इस रिपोर्ट की अनदेखी करने की सोची समझी रणनीति लगती है। ऐसा कई मामलों में दिखा है। गुजरात स्थानीय निकाय चुनाव के नतीजों का शोर मचाने और पंजाब के नतीजों पर चुप्पी साध लेना हाल की बात है।

यह चुप्पी भी सन्देह को गहराती है कि कहीं सब कुछ योजनाबद्ध ढंग से दबाने या उजागर करने की कोई बड़ी योजना तो काम नहीं कर रही है। जहां तक इस रेटिंग का सवाल है तो यह हर साल होती है और केटो इंस्टीट्यूट तो अमेरिका की सबसे पुरानी संस्थाओं में एक है। पिछले साल भारत को 94वां स्थान मिला था, पर एक साल में सत्रह पोजिशन नीचे आना भी एक बड़ा मसला है, पर सबसे बड़ी बात भारत को 'आजाद' वाली ग्रेडिंग से नीचे करके 'हाफ फ्री' की श्रेणी में डाल देना है। दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के लिए यह रेटिंग ठीक नहीं है और यह बात इसलिए भी महत्व की है कि सरकार अभी तक ऐसी रेटिंग पर जश्न मनाती रही है।

मुश्किल यह है कि रेटिंग में गिरावट की यह अकेली घटना नहीं है। अनेक अंतरराष्ट्रीय रेटिंग एजेंसियों ने जब आर्थिक कामकाज और प्रदर्शन पर भारत की रेटिंग गिरानी शुरू की तो इस बार संसद में पेश आर्थिक सर्वेक्षण में बाजाप्ता इस बात की शिकायत की गई है कि हमारी आर्थिक स्थिति जैसी है वह बाहर की रेटिंग में क्यों प्रदर्शित नहीं होती। हम जानते हैं कि शासन में आने के बाद जब मोदी सरकार ने सकल घरेलू उत्पादन समेत अन्य गणनाओं के आधार में बदलाव कराया तब भी काफी शोर मचा था क्योंकि लोगों ने उसमें झोल का आरोप लगाया था। सो कई लोग मानते हैं कि सरकारी आंकड़े कुछ भी कहें दुनिया उसे मान ले यह जरूरी नहीं। इस बार की रेटिंग में भारत को व्यक्तिगत स्वतंत्रता के मामले में दस में से 6.30 अंक मिले हैं तो आर्थिक स्वतंत्रता के मामले में 6.56 और नागरिक स्वतंत्रता के मामले में 6.43. कुल 76 पैमानों के आधार पर यह रेटिंग हुई है और इसमें स्वीडन और नार्वे जैसे देश अधिकांश पैमानों पर अव्वल बताए गए हैं। पिछले दिनों जब फ्रेजर इंस्टीट्यूट ने एक भारतीय एनजीओ के साथ मिलकर ग्लोबल इकानामिक फ्रीडम की रैंकिंग की थी तब उसमें भी भारत 79वें स्थान से गिरकर 105 पर पहुंच गया था। एक अन्य अमेरिकी संस्था फ्रीडम हाउस ने जब अपनी रैंकिंग दी थी तब उसमें भी इंटरनेट की आजादी के मामले में भारत लगातार तीसरे साल नीचे लुढ़का। जिस हिसाब से भारत में सबसे ज्यादा बार इंटरनेट सेवा बाधित की जा रही है उसे देखते हुए यह कुछ अटपटा भी नहीं लगता है।

रेटिंग पर एक हद तक सहमत होने का यह मतलब नहीं है कि भारत के न्ाक्शे से छेड़छाड़ या कश्मीर को भारत से अलग दिखाने पर भी सहमति है। यह घोर निन्दनीय काम है और सच कहें तो रेटिंग करने वालों की अपनी रेटिंग को ही कम करता है। यह भी सही है कि रेटिंग का खेल भी कोई एकदम साफ सुथरा या विवादों से परे का नहीं होता। खास तौर से आर्थिक रेटिंग के पीछे साफ व्यावसायिक खेल होते हैं, पर दो बातें नहीं भूलनी चाहिए, एक तो यह कि यह काम इस हिसाब से और एक हद तक पारदर्शी तरीके से किया जाता है कि इसका यश दिनों-दिन बढ़ता गया है और उससे ज्यादा बड़ी बात यह है कि इन पर दुनिया भरोसा करती और उसके अनुसार आचरण करती है। आर्थिक रेटिंग गिरने या चढ़ने का मतलब पूंजी का पलायन या भरपूर नई पूंजी का आगमन होता है, फिर यह भी देखना होगा कि दोष एजेंसियों में है या हमारे अन्दर भी है। न्यायपालिका, कार्यपालिका, मीडिया, राजनीतिक विपक्ष, लोकतांत्रिक संस्थाओं का हाल देखकर तो लगता है कि रेटिंग कम गिरी है, हालात ज्यादा खराब हुए हैं।

( लेखकों के अपने विचार हैं)

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