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डाॅ. एलएस यादव का लेख : भारतीय शौर्य की विजय गाथा

वर्ष 1971 के युद्ध में पाकिस्तान पर मिली ऐतिहासिक विजय के उपलक्ष्य में हर साल 16 दिसम्बर को विजय दिवस के रूप में मनाया जाता है। भारतीय सेना ने मुक्ति वाहिनी सेना के योद्धाओं के साथ मिलकर पाकिस्तान पर ऐतिहासिक जीत हासिल की थी। यह युद्ध भारत के लिए आज भी ऐतिहासिक है। इस लड़ाई में 93000 पाकिस्तानी सैनिकों ने भारतीय सेना के सामने आत्मसमर्पण कर दिया था। इस संग्राम में पाकिस्तान को मिली करारी शिकस्त के बाद पूर्वी पाकिस्तान को आजादी प्राप्त हुई और एक नया स्वतन्त्र बांग्लादेश बना। वर्ष 1971 की इस लड़ाई में लगभग 3900 भारतीय जवान शहीद हुए थे और लगभग 9851 सैनिक घायल हो गये थे।

डाॅ. एलएस यादव का लेख : भारतीय शौर्य की विजय गाथा
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डाॅ. एलएस यादव 

डाॅ. एलएस यादव

वर्ष 1971 के युद्ध में पाकिस्तान पर मिली ऐतिहासिक विजय के उपलक्ष्य में हर साल 16 दिसम्बर को विजय दिवस के रूप में मनाया जाता है। इस साल इस विजय की यह 50वीं वर्षगांठ है। भारतीय सेना ने मुक्ति वाहिनी सेना के योद्धाओं के साथ मिलकर पाकिस्तान पर ऐतिहासिक जीत हासिल की थी। यह युद्ध भारत के लिए आज भी ऐतिहासिक है। इस लड़ाई में 93000 पाकिस्तानी सैनिकों ने भारतीय सेना के सामने आत्मसमर्पण कर दिया था। इस संग्राम में पाकिस्तान को मिली करारी शिकस्त के बाद पूर्वी पाकिस्तान को आजादी प्राप्त हुई और एक नया स्वतन्त्र बांग्लादेश बना। वर्ष 1971 की इस लड़ाई में लगभग 3900 भारतीय जवान शहीद हुए थे और लगभग 9851 सैनिक घायल हो गये थे। बड़ी संख्या में भारतीय सैनिकों ने अपना सर्वस्व बलिदान करके बांग्लादेश को आजाद करवाया था। इसके अलावा 1971 के उस दौर में लगभग एक करोड़ बांग्लादेशियों को भारत ने शरण दी थी।

इस युद्ध में जनरल सैम मानेक शाॅ और लेफ्टिनेंट जनरल जगजीत सिंह अरोड़ा के नेतृत्व में रणनीतिक कदमों ने मात्र 13 दिनों की लड़ाई में पाकिस्तानी सैनिकों को हथियार डालने पर मजबूर कर दिया था। इस लड़ाई में मेजर होशियार सिंह ने भी अपने जज्बे से पाक सेना को पराजित करने में अहम्ा भूमिका निभाई थी। उन्होंने अपने अतुलनीय शौर्य का प्रदर्शन करते हुए जरवाल का मोर्चा फतह किया था। लेफ्टिनेंट अरुण खेत्रपाल की वीरता भी कम नहीं थी और वे परमवीर चक्र पाने वाले भारतीय जांबाजों में से एक थे। उन्हें यह सम्मान मरणोपरान्त प्राप्त हुआ था। तत्कालीन बिहार (अब झारखंड) निवासी लांस नायक अल्बर्ट एक्का ने अदम्य साहस का परिचय देते हुए अपनी बटालियन के सैनिकों की रक्षा की थी। इस दौरान वे गंभीर रूप से घायल हो गए थे। बाद में इलाज के दौरान अस्पताल में उनका निधन हो गया था। उनकी बहादुरी पर सरकार ने उन्हें मरणोपरान्त परमवीर चक्र से सम्मानित किया था।

इस लड़ाई में चार सगे भाई विभिन्न मोर्चों पर लड़ते हुए पाकिस्तानी सैनिकों के छक्के छुड़ाने में आगे रहे थे। ये भाई हरियाणा प्रांत के रेवाड़ी जिले के गांव जाटूसाना के थे। इनमें सबसे बड़े भाई नायब सूबेदार रामचन्द्र यादव उस समय भारतीय सेना की 78 मीडियम रेजीमेंट में थे। यह रेजीमेंट राजस्थान के अलवर से सिलीगुड़ी होते हुए बांग्लादेश की सीमा पर पहुंचकर अपना यौद्धिक योगदान देने में सफल रही थी। इनके दूसरे भाई सूबेदार सोहन लाल ने इसी रेजीमेंट में एजुकेशन जेसीओ के पद पर रहते हुए अपना योगदान दिया था। कर्नल शंभू दयाल नामक तीसरे भाई उस समय कालूचक में 47 एयर डिफेंस रेजीमेंट में कैप्टन के पद तैनात थे और उन्होंने पाकिस्तानी जहाजों की हालत खराब कर दी थी। भारतीय सेना की ईएमई कोर में आरमोरर के पद पर तैनात इनके चौथे भाई सूबेदार मेजर श्योताज सिंह ने मुक्ति वाहिनी के जांबाजों के हथियारों की मरम्मत करके उन्हें विशेष सहयोग प्रदान किया था।

इस युद्ध के प्रमुख कारणों पर भी एक नजर डालना इसलिए आवश्यक हो जाता है कि उस समय पूर्वी पाकिस्तान की जो हालत कर दी गई थी कुछ उसी तरह की स्थितियां पाकिस्तान के कुछ हिस्सों में आज भी विद्यमान हैं। उस समय पूर्वी पाकिस्तान की आबादी सात करोड़ तथा पश्िचमी पाकिस्तान की आबादी लगभग छह करोड़ थी। जनसंख्या की अधिकता के बावजूद पूर्वी पाकिस्तान की जनता का शोषण किया जा रहा था। पाकिस्तान के बनने के बाद से ही वहां की केन्द्रीय सेवाओं, तीनों सेनाओं, उद्योग धन्धों के विकास के मामलों एवं अन्य विशेष क्षेत्रों में पश्िचमी पाकिस्तान के लोगों को तकरीबन 60 से 90 प्रतिशत की भागीदारी हासिल हो रही थी, जबकि पूर्वी पाकिस्तान के लोगों को 10 से 40 प्रतिशत के बीच ही संतोष करना पड़ रहा था। इस कारण दोनों के बीच तनाव बढ़ना स्वाभाविक था। पाकिस्तान में वर्ष 1970 का आम चुनाव पूर्वी पाकिस्तान के लिए काफी अहम्ा साबित हुआ। शोषण का ही परिणाम था कि इस चुनाव में वहां की राष्ट्रीय विधानसभा की 300 में 160 सीटों पर पूर्वी पाकिस्तान के शेख मुजीबुर्रहमान की पार्टी आवामी लीग ने जबरदस्त जीत हासिल की।

शेख मुजीबुर्रहमान की यह जीत पाकिस्तान के सैन्य शासन को गंवारा नहीं हुई। वे नहीं चाहते थे कि मुजीबुर्रहमान रहमान उन पर शासन करें। इस कारण मार्च 1971 में पाकिस्तानी सेना ने वहां जुल्म ढाने शुरू कर दिए। इसी बीच वहां पर आजादी हासिल करने हेतु कर्नल उस्मानी के नेतृत्व में मुक्ति वाहिनी सेना का गठन हुआ। इस क्रान्ति को दबाने के लिए लेफ्टिनेंट टिक्का खां ने उन पर 25 मार्च की रात्रि में भयंकर आक्रमण कर जनसंहार किया और शेख मुजीबुर्रहमान को गिरफ्तार कर लिया गया। यह जनसंहार लगभग 30 मार्च तक जारी रहा जिससे स्थिति और बिगड़ गई। इसके बाद 31 मार्च को भारतीय संसद ने सरकार से यह मांग की कि पूर्वी पाकिस्तान के नागरिकों के मानवीय मूल्यों की रक्षा की जाए। 29 जुलाई 1971 को भारतीय संसद में सार्वजनिक रूप से मुक्ति वाहिनी को मदद करने की घोषणा की गई और भारतीय सेना ने अपनी तैयारियां शुरू कर दी थी।

इस अवधि में पाक व चीन द्वारा कई बार भारत को धमकी भरी चेतावनी दी गईं। फलस्वरूप 15 अगस्त को लाल किले की प्राचीर से भारतीय प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने कहा कि हम लड़ाई नहीं चाहते, हम धमकियां भी नहीं देते, परंतु भारत प्रत्येक संकट का सामना करने को तैयार है। इसके बाद दोनों देशों की सैन्य तैयारियां जारी रहीं और 3 दिसंबर 1971 को सायं पौने छह बजे पाकिस्तान ने उत्तर भारत के प्रमुख हवाई अड्डों पर अचानक हमला करके युद्ध की शुरुआत कर दी। प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी उस समय पश्िचम बंगाल में थीं। वे वहां से वापस लौटीं और रात्रि 12 बजे के लगभग पाकिस्तान को मुहंतोड़ जवाब देने का निर्णय लिया गया। भारत की तीनों सेनाओं ने पाकिस्तान को हर क्षेत्र में पराजित किया। अन्ततः 16 दिसबर को ढाका के रेसकोर्स मैदान में पाकिस्तानी लेफ्टिनेंट जनरल नियाजी ने अपने अलंकरण उतारकर आत्मसमर्पण कर दिया। जनरल नियाजी के आत्मसमर्पण के बाद पश्िचमी सीमा पर भी युद्ध विराम की घोषणा कर दी गई।

इस युद्ध में जिन कारणों से भारत को विजय प्राप्त हुई वे आज भी किसी लड़ाई के लिए अनुकरणीय है। उस समय तीनों सेनाओं का आपसी सहयोग, भारतीय सेनाओं का उच्च मनोबल, आक्रमणात्मक कार्यवाही, अपने लक्ष्य पर स्थिर रहना, शत्रु को अपनी सामरिक चालों से चकित करना एवं गतिशीलता जैसे यौद्धिक सिदान्तों का विजय दिलाने में महत्वपूर्ण योगदान रहा। इसके अलावा जनरल मानेक शाॅ का श्रेष्ठ एवं कुशल सैन्य नेतृत्व व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी का बेहतर राजनीतिक नेतृत्व ने भारत को अभूतपूर्व विजय दिलाई।

(ये लेखक के अपने विचार हैं।

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