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भारत के रत्न हैं अटल जी, भारत रत्न से सम्मानित

अटल बिहारी वाजपेयी को भारत रत्न से सम्मानित कर इस देश की जनता भी सम्मानित हुई है।

भारत के रत्न हैं अटल जी, भारत रत्न से सम्मानित
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अटल बिहारी वाजपेयी को भारत रत्न से सम्मानित कर इस देश की जनता भी सम्मानित हुई है। अटल जी किसी पार्टी से बढ़कर स्वयं में एक संस्था रहे हैं और एक ऐसी संस्था जैसी कि भारत की आम जनता है। सरल और सहज सुभाव वाले अटल बिहारी कई मायनों में अटल ही रहे। वे जीवन भर एक ऐसी पार्टी के निष्ठावान कार्यकर्ता रहे जिसके बारे में कहा जाता है कि वह कट्टर दक्षिणपंथी और हिंदूवादी है मगर अटल जी हर दल के नेता के लिए मान्य रहे। चाहे वे जवाहरलाल नेहरू रहे हों या इंदिरा गांधी अथवा मोरारजी या चौधरी चरण सिंह अथवा चंद्र शेखर। माकपा के सोमनाथ चटर्जी को लोकसभा चलाते समय जब आम सहमति बनानी होती तो वे अटल जी से अनुरोध करते थे। अटल जी जब प्रधानमंत्री थे तब पश्चिम बंगाल के माकपाई सीएम कामरेड ज्योति बसु और उनके परवर्ती बुद्घदेब भट्टाचार्य अटल जी के मित्र रहे और वे स्वयं कहा करते थे कि कभी भी उनका प्रधानमंत्री से टकराव नहीं हुआ। अटल जी ने अपने प्रधानमंत्री रहते समय कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी से ताल्लुकात मधुर रखे और कांग्रेस ने कभी नहीं कहा कि अटल जी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार कांग्रेस की अनदेखी करती है। तो ऐसा रहा अटल जी का व्यक्तित्व कि पार्टी लाइन से हटकर नेता उन्हें पसंद करते और हर आदमी उनके पास जाकर फरियाद कर सकता था। देश के तीन बार प्रधानमंत्री रहे अटल बिहारी वाजपेयी इस देश की नब्ज को बखूबी समझते थे और इसीलिए वे भले भाजपा के नेता रहे हों, अध्यक्ष रहे हों, प्रधानमंत्री रहे हों न तो वे जनता से दूर हुए न किसी पार्टी के प्रति दुराव रखा। जाहिर है एक ऐसे प्रधानमंत्री को यदि देश अपना गौरव समझे तो उसमें गलत कुछ भी नहीं।
देश के इस लोकप्रिय नेता को भारत रत्न सम्मान देने के लिए राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी उनके आवास पर गए। अटल जी अब चल-फिर नहीं सकते और लोगों को पहचानने में भी उन्हें दिक्कत होती है। 26 मार्च 2015 का दिन एक गवाह बन गया जब परंपरा से हटकर खुद महामहिम भारत रत्न से पुरस्कृत व्यक्ति के घर जाकर सम्मान दिया। मगर कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी का इस अवसर पर गायब रहना सौहार्द के विपरीत है। जो व्यक्ति पीएम रहते हुए भी सारे प्रोटोकाल तोड़कर सोनिया गांधी की परेशानी में उनके घर जाया करता था, उस व्यक्ति के सम्मान समारोह में न जाना एक तरह से राजनीतिक सदभाव परंपरा का उल्लंघन है। एक गैर कांग्रेसी सरकार के प्रमुख रहने के बावजूद वे अक्सर सोनिया गांधी से मुलाकात करते थे और चाहते थे कि सरकार कभी भी इतनी अहंकारी न दिखे कि विपक्ष उसके समक्ष बौना हो जाए। मगर कांग्रेस का आज का आचरण उस सौहार्द को तोड़ने वाला है। यह एक ऐसी शत्रुता की शुरुआत है जहां विपक्षी राजनेता अपनी सरकार के चले जाने से इतना बौना हो जाए कि वह उन परंपराओं की भी अनदेखी करने लगे जो किसी राष्ट्र की गरिमा के प्रतीक हैं। कांग्रेसी नेता का यह कदम उचित नहीं कहा जा सकता।
अटल जी की राजनीतिक पारी का अंत हो चुका है। वे अब देश के गौरव के प्रतीक बन चुके हैं। उनकी विदेश नीति और पाकिस्तान के प्रति रिश्ते सुधारने के उनके प्रयास आज तक याद किए जाते हैं। वे पहले ऐसे प्रधानमंत्री थे जिन्होंने कभी रूस या अमेरिका की शतरें को नहीं माना न उनके दबाव में झुके। यही कारण है कि आज जब उन्हें भारत रत्न दिया गया तो बिहार के सीएम नीतीश कुमार और एनसी के नेता उमर अब्दुल्ला आदि सभी लोगों ने खुशी जताई। वाजपेयी जी की धर्म निरपेक्षता और भारतीय मूल्यों के प्रति उनकी निष्ठा पर कभी सवाल नहीं उठे।
वे आरएसएस के सक्रिय कार्यकर्ता थे, भाजपा के सर्मपित सिपाही थे पर जब भी कोई गड़बड़ करता प्रतीत होता तो वे अपनी नाराजगी जाहिर करने से नहीं चूकते थे। भले वह व्यक्ति उनकी ही पार्टी का कितना ही बड़ा नेता क्यों न हो। बाजपेयी की यही साफगोई उनका कद बड़ा बनाती थीं। बाजपेयी एक संस्था हैं और वह संस्था जो हर पार्टी और हर संगठन से उन्हें ऊपर उठाती है। उन्हें भारत र} देकर सरकार ने किसी पार्टी के नेता को नहीं बल्कि एकऐसे व्यक्ति को सम्मानित किया है जो वाकई र} है। अटलबिहारी बाजपेयी को भारत र} मिलना देश के लिए भी एक गौरव है।
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