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संपादकीय लेख : टीके और टीकाकरण की स्थिति स्पष्ट हो

शीर्ष अदालत ने सरकार से यह भी पूछा है कि ब्लैक फंगस के इलाज के लिए दवाओं की उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए क्या कदम उठाए गए हैं, इसकी भी जानकारी दें। सरकार को पहले ही बताना चाहिए था तीनों वैक्सीनों (कोविशील्ड, कोवैक्सीन, स्पूतनिक-वी) के खरीदने के लिए कब-कब ऑर्डर दिए गए, हर डेट पर वैक्सीनों की कितनी डोज का ऑर्डर दिया गया और उसकी आपूर्ति की आनुमानित डेट क्या है।

संपादकीय लेख : टीके और टीकाकरण की स्थिति स्पष्ट हो
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संपादकीय लेख

Haribhoomi Editorial : देश में टीकाकरण पर स्पष्टीकरण जरूरी है। चूंकि कोविड से मुक्ति के लिए 70 फीसदी से अधिक नागरिकों का टीकाकरण होना जरूरी है, इसलिए इसको लेकर राष्ट्रीय स्तर पर एक रूपरेखा होनी ही चाहिए। केंद्र सरकार खुद जोर-शोर से कोरोना के टीके लगाने का महाभियन चला रही है तो उसे अपने आप ही सुप्रीम कोर्ट को संतुष्ट करना चाहिए कि वह देश भर में 18 वर्ष से अधिक उम्र के लोगों के टीकाकरण के लिए क्या योजना चला रही है। सरकार को वैक्सीन की खरीद से जुड़ी पूरी जानकारी सार्वजनिक करनी चाहिए कि कि टीके की कब-कब और कितनी डीज खरीद हुई। वैक्सीनेशन के बारे में भी बताना चाहिए कि अभी तक कितनी आबादी को वैक्सीन लग गई है, बाकियों को कब लगेगी? उच्च्तम न्यायालय ने केंद्र सरकार को 2 हफ्ते का समय दिया है। 14 दिन के भीतर सरकार को हलफनामे के रूप में टीके व टीकाकरण पर अब तक की स्थिति का पूरा विवरण देना होगा।

शीर्ष अदालत ने सरकार से यह भी पूछा है कि ब्लैक फंगस के इलाज के लिए दवाओं की उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए क्या कदम उठाए गए हैं, इसकी भी जानकारी दें। सरकार को पहले ही बताना चाहिए था तीनों वैक्सीनों (कोविशील्ड, कोवैक्सीन, स्पूतनिक-वी) के खरीदने के लिए कब-कब ऑर्डर दिए गए, हर डेट पर वैक्सीनों की कितनी डोज का ऑर्डर दिया गया और उसकी आपूर्ति की आनुमानित डेट क्या है। देश अभी कोविड की दूसरी लहर से जूझ रहा है। पहले की अपेक्षा दूसरी लहर अधिक घातक है। इस लहर के दौरान संक्रमितों की संख्या भी रिकार्ड स्तर तक पहुंचा और मौत भी तेजी से हुई। इस लहर में युवा समेत 50 तक की उम्र वाले अधिक प्रभावित हुए। इसलिए टीकाकरण को रफ्तार देना जरूरी है। शुरू में टीकाकरण में तेजी आई थी पर एक माह के अंदर ही उसकी गति सुस्त हो गई थी। उसके बाद ही दूसरी लहर आई और इस दौरान टीके की उपलब्धता में कमी महसूस की गई।

बात मीडिया में आने के बाद रूसी वैक्सीन स्पूतनिक-वी को आपात मंजूरी दी गई। कई और वैक्सीन सरकार से मंजूरी के लिए कतार में हैं। कोरोना के डेल्टा वैरिएंट के एक स्ट्रेन को विश्व स्वास्थ्य संगठन ने खतरनाक माना है। डेल्ट भारत में पाए जाने वाले वैरिएंट को नाम दिया गया है। इसलिए वैक्सीनेशन ही भारत को कोराना से मुक्ति की ओर ले जा सकता है। 45 साल से अधिक आयु वाले लोगों को मुफ्त टीका लगाना और उससे कम वालों के लिए शुल्क के साथ वैक्सीन देना अपने ही नागरिकों के साथ भेदभाव जैसा है। इसे शीर्ष अदालत ने पहली नजर में ही चिढ़ाने वाला और मनमाना है। अदालत की बात मानकर केंद्र सरकार को वह रोडमैप पेश करना चाहिए कि आखिर कैसे दिसंबर के अंत तक देश में सभी वयस्क लोगों को टीका लग जाएगा। विपक्ष की आलोचना के जवाब में भी सरकार कई बार यह बात दोहरा चुकी है कि इस साल के अंत तक सभी लोगों का टीकाकरण हो जाएगा।

अदालत में सरकार की दलील कि नीतियां लागू करने से कोर्ट को दूर रहना चाहिए तो, इस पर शीर्ष अदालत की टिप्पणी तर्कपूर्ण ही है कि कोराना महामारी जैसे वक्त में अदालत मूकदर्शक नहीं रह सकती, जब नागरिकों के संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन हो रहा हो। दरअसल संविधान यह नहीं कहता है कि नागरिकों के हक के उल्लंघन पर अदालतें चुप रहें। इस बार के आम बजट में सरकार ने वैक्सीन के लिए 35,000 करोड़ रुपये की राशि आवंटित की है, ऐसे में सवाल लाजिमी है कि यह रकम अब तक कैसे खर्च हुई है? 18 से 44 साल वाले लोगों के लिए उसका क्या इस्तेमाल किया जा रहा है? सुप्रीम कोर्ट ने सरकार से कोविड से निपटने को लेकर भी राष्ट्रीय प्लान मांगा था। वैक्सीनेशन को लेकर सरकार के स्तर पर कोई भ्रम नहीं रहना चाहिए। वैक्सीनेशन में पारदर्शिता से अभियान को तेजी से पूरा करने में मदद मिलेगी।

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