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डॉ. मोनिका शर्मा का लेख : अपराधियों पर त्वरित एक्शन जरूरी

केंद्रीय गृह मंत्रालय ने महिलाओं के साथ होने वाले अपराधों को लेकर पुलिस द्वारा की जाने वाली अनिवार्य कार्रवाई के बारे में विस्तृत दिशा-निर्देश जारी किए हैं। सरकार की ओर से जारी की गई एडवाइजरी अच्छी पहल है, लेकिन कुंठा, कुत्सित मानसिकता और क्रूरता लिए ऐसे मामले पूरे सामाजिक-पारिवारिक माहौल पर तो सवाल उठाते ही हैं सबसे अधिक पुलिस कार्रवाई से जुड़ी लचरता को दिखाते हैं। महिलाओं की सुरक्षा और सम्मान के मोर्चे पर बिखरते भरोसे को बचाना है तो ऐसे मामलों में गहन जांच, त्वरित कार्रवाई और संवेदनशील व्यवहार जरूरी है।

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प्रतीकात्मक तस्वीर

डॉ. मोनिका शर्मा

हाल ही में केंद्रीय गृह मंत्रालय ने महिलाओं के साथ होने वाले अपराधों के विषय में पुलिस द्वारा की जाने वाली अनिवार्य कार्रवाई के बारे में विस्तृत दिशा-निर्देश जारी किए हैं| राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के लिए जारी की गई यह एडवाइजरी ऐसे अपराधों के मामले में शिकायत दर्ज करने से लेकर त्वरित कार्रवाई करने तक, कई बिंदु लिए हैं। गृह मंत्रालय की 2019 की एडवाइजरी से लिए इन बिंदुओं में मुख्य रूप से महिलाओं के विरुद्ध होने वाले अपराधों में समय पर और सक्रिय रूप से कार्रवाई की बात शामिल है| एडवाइजरी में महिलाओं के ख़िलाफ होने वाले अपराधों के मामलों में अनिवार्य रूप से एफआईआर दर्ज करने और कार्रवाई नहीं करने वाले अधिकारियों के विरुद्ध सख्त कार्रवाई करने के निर्देश दिए गए हैं। इन दिशा-निर्देशों में दुष्कर्म के वाकयों में जांच के एसओपी (स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर) और यौन अपराध के साक्ष्यों को इकट्ठा करने की किट के संबंध में पहले से जारी की गई गाइडलाइंस का भी जिक्र किया गया है। गौरतलब है कि हालिया बरसों में दुष्कर्म के मामले ही नहीं बढ़े, बल्कि हद दर्जे की बर्बरता भी देखने को मिल रही है। कुल मिलाकर यह एडवाइजरी कानूनी कार्रवाई की तत्परता, गंभीरता, लैंगिक संवेदनशीलता और सूक्ष्म एवं स्पष्ट जांच की बात लिए है|

दरअसल, महिलाओं के खिलाफ होने वाले अपराधों को लेकर कार्रवाई में होने वाली लापरवाही वाकई चिंतनीय है। दुर्भाग्यपूर्ण है कि ऐसे आपराधिक मामलों में सबसे ज्यादा असंवेदनशीलता, उदासीनता और लचरता पहले कदम पर ही दिख जाती है। यहां तक एफ़आईआर दर्ज करने में भी आनाकानी की जाती है। नतीजतन, दुष्कर्म जैसे बर्बर मामलों की न केवल जांच प्रभावित होती है बल्कि यह दोषियों के बच निकलने की सबसे बड़ी वजह भी है। बरसों-बरस ऐसे मामले चलते रहने की वजह भी यह ढुल-मुल रवैया ही है। हर बार ऐसी जघन्य वारदातों पर सड़क से लेकर सोशल मीडिया तक आवाज उठाई जाती है। आम लोग विरोध दर्ज करवाते हैं, लेकिन बदलाव के नाम पर कुछ नहीं बदलता। सारी संवेदनाएं और जन-प्रतिरोध की आवाजें लंबित मामलों की फ़ेहरिस्त बढ़ाते हुए सुस्त जांच प्रक्रिया की भेंट चढ़ जाती हैं। जाने कितनी सिसकियां हमारी लचर व्यवस्था के बोझ तले दबकर रह जाती हैं। यह किसी से छुपा नहीं कि दुष्कर्म के मामलों में भी रिपोर्टिंग हो या जांच प्रक्रिया संवेदना और समझ नाबालिगों के मामले में भी नहीं दिखाई जाती। ऐसे मामलों की कार्रवाई से जुड़ा यह ढिलाई वाला गैर-जिम्मेदार व्यवहार कुत्सित मानसिकता के लोगों की हिम्मत बढ़ाता है, जबकि सीआरपीसी का सेक्शन 173 दुष्कर्म के अपराधों की जांच दो महीनों में पूरी करने की बात करता है।

यहां तक कि ऐसे मामलों को लेकर गृह मंत्रालय का ऑनलाइन पोर्टल भी है, जहां इनको ट्रैक किया जा सकता है। यौन हमले की पीड़िता का परीक्षण 24 घंटे के भीतर सहमति से किसी पंजीकृत चिकित्सक करवाए जाने का नियम है, लेकिन शिकायत दर्ज करने से लेकर साक्ष्य जुटाने तक इतनी लचरता बरती जाती है कि पीड़िता और उसका परिवार न्याय की आस में और अन्याय झेलते हैं। गौरतलब है कि केंद्र ने पहले भी राज्यों के लिए कई एडवाइजरी जारी की हैं ताकि पुलिस महिलाओं के खिलाफ अपराधों पर सख्त कार्रवाई करे। इनमें एफआईआर दर्ज करने, साक्ष्य इकट्ठा करने और सेक्शुअल असॉल्ट एविडेंस कलेक्शन (एसएईसी) किट, दो महीनों में जांच पूरी करने और यौन अपराधियों का राष्ट्रीय डेटाबेस बनाने जैसी बातें शामिल हैं। इसके बावजूद यह लचर रवैया लगभग हर घटना के बाद और हर राज्य में देखने को मिल जाता है। पुलिस कार्रवाई का उपेक्षापूर्ण रवैया तो दुखदायी है ही महिलाओं के लिए थानों में अपनी पीड़ा जाहिर करने का सही परिवेश तक नहीं है। अफसोस कि आज भी देश के अधिकांश थानों में महिला डेस्क तक नहीं है।

महिलाओं के प्रति होने वाले बर्बर मामलों में देश को झकझोर देने वाले निर्भया केस की अक्सर बात होती है। इस कांड में दोषियों को सजा दिलाने के लिए निर्भया के माता-पिता ने एक लंबी लड़ाई लड़ी और उन्हें फांसी के फंदे तक पहुंचाया। ध्यान रहे कि दिसंबर 2012 में हुई इस दिल दहलाने देने वाली घटना के सबसे अहम्ा पक्ष यही रहा कि जांच में कोताही नहीं हुई। दिल्ली पुलिस के कई अफसरों ने पूरी गहनता से इसकी जांच करते हुए खुद को एक हफ्ते तक के लिए छोटे से कमरे में सीमित कर लिया था। इस घटना की जांच के लिए पुलिस वालों की एक निर्भया एसआईटी नाम की टीम भी बनाई गई थी। निःसंदेह इस टीम ने जिस तत्परता से जांच करते हुए तथ्य जुटाकर चार्जशीट तैयार की, उसकी दोषियों को सजा दिलाने में अहम्ा भूमिका रही।

माना जाता है कि दिल्ली पुलिस के इतिहास में पहली बार ऐसा हुआ जब अफसरों ने ऐसे अभूतपूर्व दबाव में भी अपनी जिम्मेदारी को बेहतरीन ढंग से निभाई। यह एक नजीर है कि जिस केस की शुरुआत में कोई लीड न मिली हो, उसे चंद घंटों में सुलझा कर दोषियों को सजा दिलाने के लिए ऐतिहासिक चार्जशीट बनाने के लिए पूरी तत्परता और सजगता से काम किया गया। असल में देखा जाए तो किसी भी आपराधिक मामले की सही और सधी हुई जांच की पक्की बुनियाद ही सख्त कानूनों के जरिये उसे न्याय तक पहुंचाती है। महिलाओं के विरुद्ध होने वाली आपराधिक घटनाओं के मामलों में यह शुरुआती लचरता ही न्याय में सबसे बड़ी बाधा है। कठोर कानून भी इन पर लगाम नहीं लगा पा रहे हैं।

केंद्रीय गृह मंत्रालय द्वारा जारी दिशा-निर्देशों के मुताबिक सख्त कानूनी प्रावधानों और भरोसा बहाल करने के अन्य कदम उठाए जाने के बावजूद पुलिस अनिवार्य प्रक्रिया का पालन करने में असफल होती है तो इससे विशेष रूप से महिला सुरक्षा के संदर्भ में, देश की न्याय प्रणाली में उचित न्याय देने में बाधा उत्पन्न होगी। अफ़सोस है कि ऐसा ही हो भी रहा है। बेटियों और महिलाओं की सुरक्षा को लेकर हालात ऐसे बन गए हैं कि पुलिस प्रशासन और न्याय व्यवस्था से आमजन का भरोसा टूट रहा है। यही वजह है कि यौन शोषण के मामलों में आज भी कई परिवार शिकायत दर्ज करवाने के बजाय चुप्पी साध लेते हैं। इसके बावजूद यौन उत्पीड़न की घटनाओं के आंकड़े डराने वाले हैं। नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो की ओर से जारी किए गए ताजा आंकड़ों के अनुसार देश में 2019 में हर दिन बलात्कार के 88 मामले दर्ज किए हैं। कुंठा, कुत्सित मानसिकता और क्रूरता लिए ऐसे मामले पूरे सामाजिक-पारिवारिक माहौल पर तो सवाल उठाते ही हैं सबसे अधिक पुलिस कार्रवाई से जुड़ी लचरता को दिखाते हैं। महिलाओं की सुरक्षा और सम्मान के मोर्चे पर बिखरते भरोसे को बचाना है तो ऐसे मामलों में गहन जांच, त्वरित कार्रवाई और संवेदनशील व्यवहार जरूरी है। (ये लेखक के अपने विचार हैं )

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