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पढ़िए एक उर्दू कहानी ''पूरा आदमी''

पांच साल का लड़का एक क्षण में पचास साल का गंभीर आदमी बन गया।

पढ़िए एक उर्दू कहानी
पप्पू अकसर अपने पापा से उनके अफसर के बारे में बड़ी-बड़ी बातें सुनता रहता था। उसे लगता, वे कोई गुस्सैल और सख्त व्यक्ति हैं, जिनसे उसके पापा डरते हैं। लेकिन एक पार्टी में उनसे मुलाकात होने पर वह जिस सहजता और निर्भीकता से उनसे बात करने लगा, उसे देखकर पप्पू के पापा बेचैन हो गए।
वह पांच साल का लड़का एक क्षण में पचास साल का गंभीर आदमी बन गया, क्योंकि उस समय उसका वास्ता एक ऐसे पचास साल के अनुभवी और रौबदार आदमी से पड़ गया था, जो उसके बाप का बड़ा अफसर था और जिसकी बुद्धिमानी और बड़प्पन को चर्चा वह प्राय: अपने घर में सुन चुका था।
पापा कहते, ‘आज बड़े साहब का लोहा मान गए। उन्होंने...’
‘अरे मैडम, नाश्ता जल्दी तैयार करो। बड़े साहब ने कहा था, ठीक नौ बजे दफ्तर पहुंच जाना।’
‘अरे पप्पू! आज तुम मेरे साथ साइकिल पर स्कूल नहीं जाओगे। पहले ही देर हो गई है। बड़े साहब को पता चल गया कि देर से दफ्तर आया है, तो...’
और पप्पू उस दिन स्कूल के लिए पैदल जाते हुए अपने मन में बड़े साहब की कई तस्वीरें बनाता रहा। कभी सोचता, उनकी शक्ल बड़ी-बड़ी मूंछों वाले उस सिपाही से मिलती होगी, जिससे मुझे डर लगता है। कभी सोचता, उनकी शक्ल दैत्य जैसी होगी। तभी तो पापा उनसे डरते हैं।
और आज पप्पू का वास्ता उसी बड़े साहब से पड़ गया था। पापा के दफ्तर के किसी साथी की शादी हुई थी और उसके घर में दावत के अवसर पर, जहां वह अपने मां-बाप के साथ गया था, उनका वह अफसर भी आया हुआ था।
‘पप्पू! बड़े साहब से नमस्ते करो’ पापा ने कहा था।
और उसने नमस्ते करते हुए बड़े साहब को बड़े गौर से देखा था और उसे यह जानकर बड़ा विस्मय हुआ था कि न तो उस अफसर की शक्ल उस पुलिस के सिपाही से मिलती थी, और न ही किसी दैत्य से बल्कि उसे तो बड़ा साहब अपने बाप से मिलता-जुलता सा ही लगा था। हां, यह जरूर था कि बड़े साहब ने आंखों पर ऐनक लगाई हुई थी उस ऐनक के कारण वह व्यक्ति अपेक्षाकृत अधिक रौबदार लगता था। और कोई खास बात नहीं थी। उसे विस्मय था कि मेरा बाप इस व्यक्ति से इतना क्यों डरता है?
तभी उसने देखा कि उसके पापा थोड़ा-सा झुककर अफ्सर की कोई बात सुन रहे थे और साथ ही ‘यस सर, यस सर’ कहते जा रहे थे। पता नहीं क्यों, उसे अपने पापा का इस तरह झुकना पसंद नहीं आया। इसलिए उसने अपने पापा के कोट को खींचकर उनका ध्यान अपनी ओर दिलाते हुए कहा, ‘पापा! पापा! भूल न जाइएगा। जाते हुए मेरे लिए टाई खरीदनी है। मिस कहती थीं, जो लड़का टाई बांधकर नहीं आएगा, उसे क्लास में बैठने नहीं दिया जाएगा।’
‘अरे! इतनी सख्त हैं तुम्हारी मिस।’ बड़े साहब ने पप्पू का गाल थपथपाते हुए कहा।
पप्पू को लगा, बड़े साहब का हाथ उसके बाप के हाथ की तरह ही नर्म है। इसलिए उसने सोचा, इतने गर्म हाथ वाले आदमी से डरने की कोई जरूरत नहीं। इसलिए उसने निडर होकर कहा, ‘फिर भी वह आपकी तरह सख्त नहीं हैं कि पापा को इतनी छुट्टी भी नहीं देते कि हमारे लिए बाजार से टाई खरीद सकें।’
‘पप्पू!’ बाप ने बेटे की ओर घूरकर देखा।
लेकिन अब पप्पू बाप की ओर नहीं, बल्कि सीधा बड़े साहब की आंखों में देख रहा था और कह रहा था, ‘हफ्ते भर से पापा को रोज याद दिलाता हूं, लेकिन पापा रोज ही रात को आकर कहते हैं, बड़े साहब ने छोड़ा ही नहीं, क्या करता। काम ज्यादा था।’ और इस तरह रोज-रोज कल पर टाल देते हैं।’
पार्टी में पप्पू बड़े साहब से काफी घुल-मिल गया। उसने बड़Þे साहब की प्लेट से लेकर गाजर का हलुवा भी खाया, और फिर नमकीन काजू भी। बल्कि बहुत-सा काजू उसने अफसर की नजरों से चुरा कर अपनी पैंट की जेबों में भी भर लिया था और ऐसा करते हुए जहां उसे इस बात की खुशी थी कि बाद में काजू खूब खाने को मिलेगा, वहीं उसे अपनी इस सफलता पर भी गर्व था कि उसने बड़े साहब को यह पता नहीं चलने दिया था कि उसने काजू से अपनी जेबें भर ली हैं।
मतलब यह कि पार्टी खत्म होते-होते पप्पू बड़े साहब से काफी निस्संकोच हो गया था और जब वह उनकी अंगुली थामे पार्टी में इधर-उधर घूम रहा था, तो उसका बाप इस कारण बहुत खुश था कि पप्पू ने बड़े साहब से अच्छी दोस्ती पैदा कर ली है।
पार्टी खत्म होने पर बड़े साहब ने पप्पू और उसके मां-बाप को यह कहकर अपनी बाड़ी में बैठा लिया कि वे घर जाने से पहले उन्हें उनके घर छोड़ देंगे। आगे ड्राइवर के पास बैठे पप्पू के पापा और पीछे बड़े साहब के साथ बैठा पप्पू। फिर उसकी बड़ी बहन निम्मी और कोने वाली सीट पर उसकी मां।
‘पहले बाजार चलेंगे टाई खरीदने।’ पप्पू ने गाड़ी के चलते ही कहा।
‘लेकिन अब तो बाजार बंद हो गया है। रात के नौ बज रहे हैं।’ उसके पापा ने बहाना पेश किया। वे नहीं चाहते थे कि साहब की बाड़ी ऐसे ही बेकार में उनके लिए दौड़ती रहे।
साहब चुप रहे थे।
पप्पू ने थोड़ा सोचने के बाद बड़े साहब से पूछा, ‘अंकल, पापा को कल दफ्तर में कोई खास काम तो नहीं है?’
‘पप्पू!’ पापा ने पीछे घूम कर बेटे की ओर देखा।
लेकिन साहब उस समय बच्चे से खेलने के मूड में थे। उन्होंने उसे छेड़ने के लिए कहा, ‘कल तो तुम्हारे पापा को दफ्तर में इतना काम है, इतना काम है कि दफ्तर में ही रात के दस बज जाएंगे।’
‘तब तो अंकल, मैं उन्हें घर से नहीं जाने दूंगा। कल तो मुझे टाई खरीदनी है जरूर।’
‘और मैं ऐसा हुक्म करूंगा, ऐसा हुक्म करूंगा कि तुम्हारे पापा को सिर के बल चलकर दफ्तर जाना होगा।’
पप्पू कुछ सोच में पड़ गया।
‘सिर के बल तो कोई चल ही नहीं सकता!’ पप्पू ने तर्क पेश किया।
‘लेकिन मेरे हुक्म से सारा दफ्तर सिर के बल चलने लगता है, और मैं तुम्हारे पापा को घर से बुलवा भी सकता हूं।’
‘तक तो भाईजान, मैं किसी को अपने घर में घुसने न दूंगा। हां, मैं अभी से बताए देता हूं।’
‘मैं दफ्तर से गाड़ी भेज दूंगा तुम्हारे पापा को लेने के लिए, तो तुम क्या करोगे?’
‘मैं कुत्ता छोड़ दुंगा। मेरा कुत्ता बड़ा बहादुर है, वह किसी को मेरे घर में घुसने नहीं देता।’
‘मैं भी ड्राइवर के साथ अपना कुत्ता भेज दूंगा। मेरा कुत्ता और भी बहादुर है। वह तुम्हारे कुत्ते को दबोचकर रख देगा।’
‘भाईजान! आपका कुत्ता इतना बहादुर है तो मेरे पास और भी कई तरकीबें हैं।’
‘मैं जब हुक्म भेजूंगा तो तुम्हारे पापा को आना ही पड़ेगा।’
‘नहीं आना पड़ेगा मिस्टर। नहीं आना पड़ेगा।’
पप्पू को संबोधन में अंकल से भाईजान और फिर भाईजान से मिस्टर पर आते देखकर पप्पू के पापा का दिल धक-धक करने लगा। उन्होंने पहले घूरकर पप्पू की तरफ देखा फिर क्षमा-याचना भरी नजरों से बड़े साहब की ओर, जैसे पप्पू की गुस्ताखी के लिए वे खुद उनसे माफी मांग रहे हो।
लेकिन वे दोनों उसकी ओर नहीं देख रहे थे। बीवी ने पति की परेशानी को भांप कर बड़े साहब का ध्यान दूसरी तरफ दिलाने का प्रयत्न करते हुए कहा, ‘साहब, यह पप्पू बातें बनाने में इतना तेज है कि कुछ पूछिए नहीं।’
फिर वह बताने लगीं कि किस तरह पप्पू अपने घर के दूसरे हिस्से में रहने वाले अंकल से मुकाबला करता है।
वे कहते हंै, ‘पप्पू! हमारे यहां मीठे चावल बने हैं।’
यह कहता है, ‘अंकल हमारे यहां पुलाव बना है।’
वे कहते हैं, ‘हमारे घर में गाय है।’
यह कहता है, ‘हमारे घर में भी गाय है।’
वे कहते हैं, ‘पप्पू! हम बीवी लाए हैं।’
यह कहता है, ‘हम भी आज बीवी लाए है।’
वे कहते है, ‘हमारी बीवी खूंटे से बंधी है।’
यह कहता है, ‘मेरी बीवी भी खूंटे से बंधी है।’
इस बात पर बड़े साहब जोर से हंस पड़े। उन्होंने पूछा, ‘क्यों भई पप्पू! तुम्हारी बीवी खूंटे से बंधी है।’
पर पप्पू उस समय बीवी की बात करने के मूड में नहीं था। उसने पुरानी बात को ही जारी रखा, ‘मिस्टर! मैं बताए देता हूं, कल पापा को दफ्तर आने से रोक लूंगा।’
‘वह तो ठीक है, लेकिन तुम अपने पापा को कैसे रोकोगे?’ बड़े साहब पूछ रहे थे।
‘मिस्टर! मैं अपनी चालाकी आपको क्यों बताऊं, पहले आप बताइए, आप कैसे मेरे पापा को सिर के बल चलने पर मजबूर कर सकते हंै?’
‘मैं कर सकता हूं।’
‘लेकिन कैसे?’
‘मैं भी अपनी तरकीब क्यों बताऊं।’
इस तरह बहस होते-होते उनका घर आ गया। इस बातचीत के दौरान पप्पू के पापा का दम खुश्क हो रहा था। उन्होंने तो आज तक बड़े साहब के सामने जुबान नहीं खोली थी। उनके हर हुक्म का, चाहे वह सही हो या गलत, सिर-आंखों पर माना ही। और एक उनका लड़का है कि बेकार की बहस किए जा रहा था। अगर उनके अफसर ने पप्पू की बातों का बुरा मान लिया तो... वे इन्हीं सोचों में डूबे हुए थे कि एक झटके के साथ गाड़ी उनके घर के सामने रुक गई।
पिछली सीट पर बैठे हुए पहले बड़े साहब उतरे। उनके बाद पप्पू, उसकी बहन और बाद में पप्पू की मम्मी। अगली सीट से उतरकर पप्पू के पिता भी उनके साथ आ मिले।
बड़े साहब पप्पू से कह रहे थे, ‘तो पप्पू, मैं तुम्हारे पापा को इसी समय साथ लिए जाता हूं।’
‘आप मेरे पापा को नहीं ले जा सकते। कल मुझे टाई खरीदनी है।’ यह कहते हुए पप्पू घर की ओर लपक लिया।
पप्पू घर के अंदर जा रहा था और उसके कानों में साहब के शब्द गूंज रहे थे, ‘मैं ले जा सकता हूं।’
‘हूं! कैसे ले जा सकते हैं।’ पप्पू ने गुस्से में जोर से पांव पटके।
बाहर पप्पू के पापा और मम्मी बड़े साहब से माफी मांगने लगे, ‘पप्पू बड़ा बातूनी है। बड़ा शैतान है, उसकी बातों का बुरा न मानें।’ और बड़े साहब पप्पू के पापा से हाथ मिलाते हुए बड़े इत्मीनान से कह रहे थे, ‘बच्चे तो शैतान होते ही हैं। भला इनकी बात का बुरा क्या मानना।’
लेकिन पप्पू के पापा को जैसे यकीन ही नहीं आ रहा था। वे बार-बार कह रहे थे, ‘पप्पू की बातों का बुरा मत मानिएगा।’
इतने में बड़े साहब चौंके। उनकी पैंट पप्पू के कुत्ते के मुंह में फंसी फटी जा रही थी।
और पप्पू ताली बजा-बजा कर कह रहा था, ‘देखी आपने मेरे कुत्ते की बहादुरी। मिस्टर! मेरे पापा को तुम न आज ले जा सकते हो,न कल बुलवा सकते हो। ये मेरा कुत्ता बड़ा बहादुर है।’
उस रात पप्पू के पापा बहुत दुखी थे। उन्हें नींद नहीं आ रही थी। वे सोच रहे थे कि पता नहीं, बड़े साहब अब मेरे साथ कैसा सुलूक करेंगे। लेकिन पप्पू बेफिक्री से मीठी नींद सो रहा था। क्योंकि आज उसने उस बड़े साहब को नीचा दिखने में सफलता प्राप्त की थी, उस बड़े साहब को, जिससे उसके पापा भी डरते थे।
अनुवाद : सुरजीत

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