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वजाहत अली संदेलवी की उर्दू हास्यकथा : छक्का साहब

क्रिकेट का नशा कैसे-कैसे गुल खिलाता है, यह कोई भुक्तभोगी ही बता सकता है।

वजाहत अली संदेलवी की उर्दू हास्यकथा : छक्का साहब

वजाहत अली संदेलवी

अभी कुछ समय पहले ही क्रिकेट वर्ल्ड कप संपन्न हुआ। इन दिनों आईपीएल का नशा हर क्रिकेटप्रेमी पर चढ़ा हुआ है। यानी, पिछले काफी समय से वातावरण में क्रिकेट की खुमारी तारी है। क्रिकेट का नशा कैसे-कैसे गुल खिलाता है, यह कोई भुक्तभोगी ही बता सकता है। आप भी रूबरू होइए ऐसे ही एक क्रिकेटप्रेमी की दिलचस्प दास्तां से।

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हमारे कस्बे में क्या, खुद हमारे मुहल्ले में एक क्रिकेट-विशेषज्ञ रहते थे, जिन्हें अपनी न जाने किस गुस्ताखी के कारण मुहल्ले के कुछ लड़कों ने छक्का साहब कहना शुरू कर दिया था, और फिर उनकी यह उपाधि इस कदर लोकप्रिय हुई कि उसके मुकाबले में उनका असली नाम कुछ इस तरह गुम हो कर रह गया, जैसे किसी महान छक्के के बाद गेंद। छक्क साहब को क्रिकेट के बारे में इस कदर जानकारी थी और वे उसकी हर फांस का ऐसा बांस और हर राई का ऐसा पहाड़ बना कर खड़ा कर देते कि बहुत से सुनने वालों को यही संदेश होने लगता कि शायद यह खेल खुद उन्होंने ही आविष्कार किया था। क्रिकेट के बड़े से बड़े खिलाड़ी और कप्तान पर आपत्ति कर बैठना और उसे झूठों का सरदार साबित कर देना, वह अपना जन्मसिद्ध अधिकार समझते।

नत्थू, बुद्धू, खौरू का तो जिक्र ही क्या बड़े-बड़े विश्वविख्याती प्राप्त खिलाड़ियों की कमजोरियों और दुखती रगें उनके दिमाग में ऐसी सुरक्षित थीं, जैसे किसी थाने में बदमाशों की हिस्टरी-शीट। और फिर हर वर्णनीय खिलाड़ी की खूबियां और प्रशिक्षण के वह ऐसे प्रामाणिक नुस्खे बताते कि यदि वह खुद उन्हें सुन पाता, तो निश्चय ही क्रिकेट से तौबा कर के सदा के लिए मैदान से भाग निकलता।दुर्भाग्य से यदि कभी छक्का साहब के साथ किसी मैच की कमेंट्री सुनने का संयोग हो जाता, तो क्रिकेट के रहस्य गेंदों के नदी और नाले क्या, दरिया और समुद्र बह निकलते।

वह एक-एक गेंद पर इस योग्यता से बेसाख्ता समीक्षा करते जाते कि दोनों टीमों के खिलाड़ी पर बेअख्तियार गुस्सा आने लगता कि उनको खेल-वेल तो आता नहीं, मुफ्त में बेवकूफ बना कर समय बर्बाद कर रहा है। बडेÞ आत्मविश्वास से फरमाते, ‘इस अवसर पर उस बॉलर को नहीं, उस बॉलर को गेंद फेंकनी चाहिए थी। यह वक्त था कि बाउंसर चलाना चाहिए था। बैट्समैन को यह गेंद यों नही, यों खेलना चाहिए थी। हाय, हाय स्क्वायर लेग शॉट मारने का चांस मिस कर दिया। स्लिप खाली पड़ी थी, गेंद को जरा-सा बस इशारा कर देता, तो कम से कम दो रन तो कहीं नहीं गए थे। फील्डिंग की तरकीब बिल्कुल ही बेतुकी है। फलां कप्तान अकल से काम नहीं लेता है। फलां जगह फलां खिलाड़ी को जरूर मौजूद रहना चाहिए था। फलां बॉलर कप्तान का सगा मालूम होता है। इसी नामाकूल से बार-बार गेंद फेंकवाई जा रही है।’

और फिर जब वही नामाकूल बॉलर कोई विकेट ले लेता, तो क्रोध की धारा बैट्स-मैन की ओर मुड़ जाती, ‘इस कमबख्त को तो क्रिकेट के बजाय गुल्ली-डंडा खेलना चाहिए। मुफ्त में बाप-दादा की नाक कटवा रहा है।’ और फिर आम आलोचनाओं और नुक्ताचीनी की तो कोई हद और पराकाष्ठा ही न थी। फलां खिलाड़ी बड़ा बैट्स-मैन बन कर आया है, लेकिन गुगली से उसकी नानी मरती है। फलां बॉलर गेंद क्या फेंकता है, जैसे फावड़ा चलाता है। फलां खिलाड़ी में यह ऐब है और फलां खिलाड़ी में वह नुक्स। उनके साथ सुनने में यही मालूम होता था कि किसी क्रिकेट-मैच की कमेंट्री नहीं, बल्कि खेलने वालों की पोस्टमार्टम रिपोर्ट सुन रहे हैं और अगर छक्का साहब का बस चलता, तो वह इन खिलाड़ियों को क्रिकेट खेलने की इजाजत देने के बजाय, उनका मुंह काला कर और गधे पर सवार कर के नगर बहिष्कृत किए बिना सांस न लेते। अगर दुर्भाग्यवश छक्का साहब के साथ कोई मैच देखने का संयोग हो जाता, तो बस कयामत ही आ जाती।

उनकी कड़ी और बाल की खाल निकालने वाली, नुक्ताचीनी से खिलाड़ी तो खिलाड़ी, अंपायर ही नहीं बल्कि सेलेक्शन कमेटी के सदस्यों को काले पानी भेज देने को जी चाहने लगता। क्रिकेट के खेल से तबीयत ऐसी बदमजा हो जाती कि प्रतिज्ञा कर लेते कि अब काफी अरसे तक यह मनहूस खेल न देखेंगे और न इसके बारे में कुछ सुनने के लिए तैयार होंगे, और खुद छक्का साहब को देख कर जो मुंह बना-बना कर और हाथ चला-चला कर बेथका न बोलते ही चले जाते है, कुछ ऐसी अवस्था छा जाती, जैसे कोई अति भयानक सपना देख रहे हों, जिसमें बहुत-सी मोटर साइकिलें एकसाथ फटफट करती हुई हमारे जनाजे के गिर्द घूम रही हों।एक दिन स्थानीय स्कूल के लड़कों में एक यों ही-सा मैच हो रहा था। संयोग से घूमते-फिरते छक्का साहब भी पहुंच गए और स्वभावनुसार लगे क्रिकेट के बारे में अपनी डींगे हांकने और लड़कों को नसीहत और फजीहत करने, ‘यह गेंद यों नही, यों फेंकना चाहिए था। और इस पर ऐसा नहीं, ऐसे हिट लगाना चाहिए था।

’एक लड़का आउट हुआ, तो छक्का साहब ने बड़े स्नेह से उसे अपने पास बुलाया और कहा, ‘भइया, तुम्हारे आउट होने का तो मुझे हरगिज कोई अफसोस नहीं, क्योंकि तुम खेल ही रहे थे, बिल्कुल अनाप-शनाप। अलबत्ता यह बात जरूर मालूम है कि जिस गेंद पर तुम आउट हुए हो, मैच हार में सिर्फ, वही एक ऐसी गेंद थी, जिस पर बड़ी आसानी से हुक करके एक धुंआधार छक्का लगाया जा सकता था।’ लड़का तो फिर लड़का। आउट होने से यों ही झुंझलाया हुआ था, बुरा मान कर बोल उठा, ‘अरे महाशय, जरा खुद मैदान में आइए, तो आटे-दाल के भाव मालूम हो। दरिया के बाहर तो सभी तैराक होते हैं।’छक्का साहब पर न जाने उस समय क्या दुर्भाग्य सवार था कि बिफर गए और न देखा आव, न देखा ताव, कोट उतार कर फौरन तैयार हो गए, और लड़के ने प्रतिपक्ष टीम के कप्तान से इजाजत ले कर मजमे के जोश भरे नारों और तालियों के दरम्यान भिजवा ही दिया उनको विकेट पर।

पहली गेंद आई, तो उसको रोकने की कोशिश में उसके साथ छक्का साहब अपनी बैट लिए विकेट पर मुंह भिड़ा कर गिर पड़े। अंपायर ने कहा, ‘आउट’ और अपनी गर्द झाड़ते हुए छक्का साहब लेटे ही लेटे चीखे, ‘नॉट आउट।’ दर्शकों का हंसी के मारे बुरा हाल था। और सब ने छक्का साहब की हां में हां मिलाई, ‘नॉट आउट।’ अंपायर ने भी पेट पकड़ कर कहकहा लगाते हुए अपना फैसला बदल दिया। दूसरी गेंद आई, तो छक्का साहब कलाबाजी खा कर विकेट के सामने उकडू बैठ गए और गेंद पूरी ताकत से उनकी कनपटी पर लगती हुई विकेट-कीपर के हाथ में जा रुकी। कई लोग कई आवाजें लगा रहे थे, लेकिन अंपायर ने हंसते हुए अपना फैसला फिर बदल दिया। एक बार फिर नॉट आउट। तीसरी गेंद आई, तो छक्का साहब ने आंख बंद कर के घुमा ही दिया बैट।

बीच का विकेट उखड़ कर दो गज दूर जा गिरा, लेकिन छक्का साहब का बैट उनके हाथ से छूट कर हवा में उड़ रहा था और कई खिलाड़ी उसको कैच करने के लिए हाथ फैलाए दौड़ रहे थे। अंपायर फिर बोला, ‘नॉट आउट।’ और सारा जन-समूह हंसते-हंसते और तालियां बजाते-बजाते पागल हुआ जा रहा था।चौथी गेंद वाकई बड़ी खतरनाक थी। छक्का साहब की खोपड़ी महज संयोग से बच गई, लेकिन बेचारे के तीनों विकेट जाते रहे। अंपायर फिर चीखा, ‘अब भी नॉट आउट।’ लेकिन छक्का साहब खुद फील्ड से भागते हुए गरजे, ‘अबे, साफ आउट हो चुका हूं। क्या मेरी खोपड़ी फुड़वाएगा।’

जनसमूह ने छक्का साहब का ऐसा शानदार स्वागत किया कि जैसे वह वाकई दो सौ ग्यारह रन नॉट-आउट बना कर लौटे हों। इस दुर्घटना के बाद से छक्का साहब का नाम लड़कों ने सिफर चाचा कर दिया था। अब उन्हें क्रिकेट में बिल्कुल कोई दिलचस्पी बाकी नहीं रही थी। एक घर के भेदिए ने सूचना दी है कि वे आजकल आलोचक बन कर कवियों और लेखकों की पगड़ियां उछालने की कोशिश कर रहे हैं। यह मैदान क्रिकेट के मैदान से कहीं अधिक विशाल है।

अनुवाद : सुरजीत

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