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उन्नाव-कठुआ मामला: पॉक्‍सो एक्‍ट में बदलाव के बाद, फ़ास्ट ट्रैक कोर्ट के जरिये जल्द निपटारा जरूरी

बच्चों के साथ यौन अपराधों के मामलों का देशभर की अदालतों में लंबित होना चिंतनीय है। उस वक्‍त जब सरकार ने 12 साल तक की बच्‍ची से रेप पर फांसी की सजा का प्रावधान किया है, उसमें अपराधियों को सजा तब मिलेगी जब अदालतों में सुनवाई तेजी से हो। इसलिए पॉक्सो से संबंधित केसों के लंबित होने पर सुप्रीम कोर्ट का चिंता जाहिर करना दर्शाता है कि शीर्ष अदालत बच्चों की सुरक्षा और उन्हें न्याय दिलाने को गंभीर है।

उन्नाव-कठुआ मामला: पॉक्‍सो एक्‍ट में बदलाव के बाद, फ़ास्ट ट्रैक कोर्ट के जरिये जल्द निपटारा जरूरी
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बच्चों के साथ यौन अपराधों के मामलों का देशभर की अदालतों में लंबित होना चिंतनीय है। उस वक्‍त जब सरकार ने 12 साल तक की बच्‍ची से रेप पर फांसी की सजा का प्रावधान किया है, उसमें अपराधियों को सजा तब मिलेगी जब अदालतों में सुनवाई तेजी से हो। इसलिए पॉक्सो से संबंधित केसों के लंबित होने पर सुप्रीम कोर्ट का चिंता जाहिर करना दर्शाता है कि शीर्ष अदालत बच्चों की सुरक्षा और उन्हें न्याय दिलाने को गंभीर है।

उच्‍चतम न्‍यायालय ने अपने अहम आदेश में सभी राज्यों के हाईकोर्ट को कहा है कि पॉक्सो के तहत सभी मामलों का फ़ास्ट ट्रैक कोर्ट के जरिये निपटारा किया जाए। साथ ही निचली अदालत में पॉक्सो एक्ट संबंधी मामलों के लिए स्पेशल कोर्ट बने। सर्वोच्‍च न्‍यायालय ने कहा है कि निचली अदालत में जज पॉक्सो एक्ट संबंधी मामलों को लेकर फ़ास्ट ट्रैक सुनवाई करेंगे।

साथ ही सभी राज्यों के हाईकोर्ट तीन जजों की एक कमेटी भी बनाएंगे, जो निचली अदालत में चल रहे फास्ट ट्रैक कोर्ट को मॉनिटर करेगी। उच्‍चतम न्‍यायालय ने यह भी कहा है कि सभी राज्यों के डीजीपी एक टीम बनाएंगे, जो पॉक्सो एक्ट संबंधी मामलों की जांच करेगी और सुनिश्चित करेगी कि गवाह सुनवाई के दौरान अदालत में पेश हो।

चूंकि सर्वोच्‍च न्‍यायालय को पता है कि प्रिवेंशन ऑफ चाइल्‍ड सेक्‍सुअल ऑफेन्‍स यानी पॉक्‍सो एक्‍ट के अधिकांश मामले निचली अदालतों में लंबित रहते हैं और पुलिस केस की जांच में ढिलाई बरतती है, जिससे पीडि़त को समय पर न्‍याय नहीं मिल पाता है। जल्‍दी न्‍याय नहीं मिलने के चलते अपराधियों में कानून का खौफ नहीं बन पाता है।

हाईकोर्ट की रिपोर्ट के मुताबिक देश में इस वक्‍त पॉक्‍सो एक्‍ट के तहत 25 राज्‍यों में एक लाख 12 हजार 628 केस लंबित हैं। इनमें करीब 59 फीसदी केस सबूत पेश करने के चरण में है। उत्‍तर प्रदेश, मध्‍य प्रदेश, महाराष्‍ट्र और दिल्‍ली में सबसे अधिक लंबित केस हैं। सुप्रीम कोर्ट ने ही हाईकोर्टों से पॉक्‍सो एक्‍ट के तहत लंबित मामलों की सूची मांगी थी।

इस वक्‍त सुप्रीम कोर्ट बच्‍चों के साथ यौन अपराधों पर सुनवाई कर रहा है। इस दौरान केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को आश्‍वस्‍त किया है कि नए कानून के मुताबिक बच्‍चों के यौन अपराध के मामलों में दो महीने में जांच पूरी होगी और दो महीने में ट्रायल पूरा किया जाएगा। ट्रायल कोर्ट के फैसले के खिलाफ 6 महीने के भीतर अपील की जा सकेगी।

सरकार ने हाल ही में अधिसूचना जारी कर 12 साल तक की बच्‍ची से रेप मामले में दोषी को फांसी की सजा का प्रावधान किया है। इससे साफ है कि बच्‍चों के प्रति यौन अपराध के खिलाफ केंद्र सरकार गंभीर है। हालांकि सच्‍चाई यह है कि इन अपराधों की जांच राज्‍य पुलिस के हाथ में होती है और उसका काम करने का तरीका लचर है। पुलिस पर राज्‍य की सरकार की छाया का असर रहने के चलते भी कई बार बाल यौन अपराधों में जांच प्रभावित होती है।

पॉक्‍सो एक्‍ट के मामले पर सुप्रीम कोर्ट के नए निर्देश से निश्चित रूप से पुलिस जांच और अदालतों में सुनवाई में तेजी आएगी। दिल्‍ली, उन्‍नाव, शिमला, कठुआ जैसे मामलों ने देश के सामान्‍य मानस को झकझोर दिया है। लोग चाहते हैं कि ऐसे घृणित अपराधियों के खिलाफ त्‍वरित कार्रवाई हो।

उच्‍च्‍तम न्‍यायालय के इस निर्देश के बाद उम्‍मीद की जानी चाहिए कि पॉक्‍सो एक्‍ट के तहत लंबित मामलों का निपटारा जल्‍द होगा और यौन अपराध के मासूम पीडितों को इंसाफ मिलेगा। बच्‍चों के यौन अपराधियों को जल्‍द से जल्‍द सजा मिलने में ही पॉक्‍सो एक्‍ट की सार्थकता भी है।

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