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विकेश कुमार बडोला का लेख : उपयोगिता के संकट से घिरा संयुक्त राष्ट्र

संरा को कोरोना के बहाने घेरकर मोदी (Modi) ने दुनिया की दृष्टि में पूर्णरूपेण संदिग्ध संस्था बना दिया है। मोदी के अनुसार महामारी में इस संस्था ने वैश्विक स्तर की संस्था होने के दायित्व का भलीभांति निर्वहन नहीं किया है। इससे अधिक योगदान तो वैश्विक महामारी के संकट में अकेले भारत (India) देश का रहा, जिसने इस कठिन समय में 150 से अधिक राष्ट्रों को आवश्यक औषधियों की आपूर्ति की।

विकेश कुमार बडोला का लेख : उपयोगिता के संकट से घिरा संयुक्त राष्ट्र
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संयुक्त राष्ट्र महासभा के 75वें सत्र को संबोधित करते हुए भारतीय प्रधानमंत्री ने इस संस्था के स्वरूप, प्रक्रियाओं और व्यवस्थाओं में व्यापक परिवर्तन किए जाने की मांग की। अपने संबोधन में मोदी ने कहा कि दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र और पांचवीं श्रेणी की अर्थव्यवस्था होने के नाते भी यदि भारत महासभा की निर्णायक प्रक्रियाओं में प्रमुख भूमिका में नहीं है तो फिर इस संस्था का लाभ ही क्या।

उन्होंने शनिवार को वीडियो सम्बोधन के माध्यम से संरा पर प्रश्न उठाया कि 130 करोड़ लोगों के देश भारत को संयुक्त राष्ट्र की निर्णय (Decision) लेने की व्यवस्था का अंग कब बनाया जाएगा। उन्होंने भारत को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद का स्थायी सदस्य बनाए जाने पर बल देते हुए कहा कि भारतीय गण दीर्घावधि से प्रतीक्षारत हैं कि संस्था की सुधार प्रक्रिया शीघ्र पूरी हो।

संरा को कोरोना के बहाने घेरकर मोदी ने दुनिया की दृष्टि में पूर्णरूपेण संदिग्ध संस्था बना दिया है। मोदी के अनुसार महामारी में इस संस्था ने वैश्विक स्तर की संस्था होने के दायित्व का भलीभांति निर्वहन नहीं किया है। इससे अधिक योगदान तो वैश्विक महामारी के संकट में अकेले भारत (India) देश का रहा, जिसने इस कठिन समय में 150 से अधिक राष्ट्रों को आवश्यक औषधियों की आपूर्ति की।

अपने संबोधन में मोदी ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद का स्थायी सदस्य बनने हेतु अपेक्षित संपूर्ण भारतीय योग्यता का बखान किया और बताया कि कैसे भारत जैसा देश संस्था में अपूर्व निर्णयों के बूते सदस्य देशों की संतुलित प्रगति का आधार बन सकता है। परन्तु इस हेतु भारत को संस्था का प्रमुख अंग बनाए जाने की अति आवश्यकता है।

द्वितीय विश्व युद्ध की समाप्ति के बाद यूरोपीय देशों को गंभीरतापूर्वक महसूस हुआ कि दुनिया के समुचित संचालन और विकास के लिए एक वैश्विक एकीकृत व्यवस्था की जरूरत है। इसी के परिणामस्वरूप और अपनी आर्थिक स्थिति को सशक्त करने के उद्देश्य से ब्रिटेन के नेतृत्व में संयुक्त राष्ट्र महासभा का शुभारंभ किया गया था। हालांकि अपने आरंभिक दो-एक दशक तो संराम अपने मूल उद्देश्यों व कार्यों की प्राप्ति में अति सजग और नियमबद्ध रहा।

इस आधार पर अर्द्धविकसित, विकासशील और अति पिछड़े देशों में संयुक्त राष्ट्र महासभा की ओर से व्यापक जनकल्याणकारी अभियान चलाए गए जो एक व्यापक सीमा तक व्यावहारिक व परिणामोन्मुखी रहे। इससे महासभा के तत्कालीन सदस्य देशों और संस्था द्वारा जिन देशों में नागरिक को सहायता पहुंचायी जाती थीं, उन देशों को लगने लगा कि संस्था दुनिया के लिए प्रासंगिक और अनिवार्य हो चुकी है।

इस धारणा के प्रसार के बाद संयुक्त राष्ट्र महासभा के माध्यम से दुनिया के पूंजीपतियों और धूर्त देशों ने अपनी मंशा पूर्ति के अभियान आरंभ कर दिए। इसके बाद संस्था की समस्त कार्यनीतियां विशुद्ध वैश्विक कल्याण की मंशा का ढकोसला मात्र रह गईं और संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के आरंभिक स्थायी सदस्य देशों ब्रिटेन, अमेरिका, चीन, रूस और फ्रांस के संयुक्ताधिकारों व एकाधिकारों द्वारा परिचालित होने लगीं।

इसी का दुष्परिणाम रहा जो भारत, जापन, जर्मनी, आस्ट्रेलिया, इजरायल, दक्षिण कोरिया, ब्राजील, सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात आदि राष्ट्र, सुरक्षा परिष्द का स्थायी सदस्य बनने हेतु निर्धारित, राष्ट्र संयुक्त महासभा के मानदंडों को पूरा करने के बाद भी दशकों से इस परिषद के स्थायी सदस्य नहीं बन सके हैं।

इतना ही नहीं विगत 75 वर्षों से अंतर्राष्ट्रीय व्यापार, हथियार, मीडिया, समाज, अर्थव्यवस्था, मुद्रा और समाज से संबंधित नीतियां भी केवल पांच देशों ब्रिटेन, अमेरिका, चीन, रूस और फ्रांस के राष्ट्रीय हितों के अनुरूप ही निर्धारित की गईं। ऐसी नीतियों का लाभ उक्त पांच देशों को ही हुआ। धीरे-धीरे संयुक्त राष्ट्र महासभा में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिरूरद के उक्त पांच स्थायी सदस्य देश भी विविध विषयों की अंतरराष्ट्रीय नीतियों को पांच के समूह में भी अलग-अलग निर्धारित करने लगे, जिससे संयुक्त राष्ट्र महासभा की सुरक्षा परिषद की मौलिक नीतियां निष्प्रभावी हो गयीं।

संयुक्त राष्ट्र महासभा की अनुपयोगिता को चुनौतियां भी विश्व के शासकों द्वारा तब दी जाने लगीं, जब अमेरिका से लेकर ब्रिटेन और भारत तक कांग्रेसजन्य शासन का अंत हुआ। अन्यथा छह-सात वर्ष पूर्व तक संयुक्त राष्ट्र महासभा की दोहरी नीतियों से सर्वाधिक पीड़ित भारत जैसे देश के शासक भी इस सभा की वार्षिक बैठक में केवल अपनी समस्याओं का रोना रोकर आ आते थे।

कभी भारत की ओर से तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिजारी वाजपेयी ने संयुक्त राष्ट्र महासभा को इसकी विसंगतियों के लिए सचेत किया था और अब विगत छह वर्षों से मोदी वार्षिक बैठक में महासभा की वैश्विक कमियों को उधेड़ रहे हैं। मोदी ने हर बैठक में महासभा को अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद, मनी लांड्रिंग, मादक पदार्थां के कारोबार और चीन जैसे देश की मानसिकता के बारे में अवगत कराया है, परंतु संयुक्त राष्ट्र महासभा की ओर से इनके प्रभावी निराकरण के लिए कोई भी अविस्मरणीय कार्य नहीं किया गया।

जब तक ऐसे महत्वपूर्ण स्थानों पर वैचारिक मतभेद के साथ सदस्य बैठे होंगे, तब तक वैश्विक समस्याओं का स्थायी और सर्वश्रेष्ठ समाधान नहीं निकल सकता। होता क्या है कि किसी बैठक में एक देश के लिए जो विषय, जैसे कि आतंकवाद, एक समस्या होता है, वही विषय दूसरे देश अथवा देशों के लिए कोई समस्या ही नहीं होता। इस कारण आतंकवाद की समस्या बनी हुई है। आतंकवाद भारत के लिए अति गंभीर समस्या है और जब तक संयुक्त राष्ट्र महासभा अपने स्तर पर इस समस्या का पूर्ण व स्थायी समाधान नहीं कर लेती तब तक भारत के लिए महासभा के होने या न होने का कोई औचित्य नहीं।

भारत ही नहीं अमेरिका और ब्रिटेन जैसे देशों के लिए भी संयुक्त राष्ट्र महासभा अप्रासंगिक हो गई है। महासभा इन देशों से अपने वैश्विक परिचालन के लिए पर्याप्त धन प्राप्त करने की अपेक्षा तो करती है, परंतु इन देशों के नव दक्षिणपंथी शासकों के अनुसार वैश्विक मानवाविधकार नीतियों में समय, काल, देश व परिस्थिति के आधार पर व्यावहारिक परिवर्तन नहीं कर रही।

अमेरिका के लोकतंत्र की आड़ में वहां पर मानवाधिकार के रूप में अराजक लोगों का जमावड़ा हो रहा है। वे अमेरिकी लोकतांत्रिक मूल्यों के लिए विध्वंशजन्य चुनौतियां बन रहे हैं। वर्तमान राष्ट्रपति ट्रंप के स्तर पर इन चुनौतियों के निराकरण के लिए कठोर कार्रवाइयां हुईं तो अमेरिका स्थित और संयुराष्ट्र महासभा में बैठे वामपंथियों ने इनका विरोध आरंभ कर दिया, परन्तु महासभा ने वामपंथी सदस्यों के विरोध को अनुचित घोषित कर अमेरिकी काररवाइयों के समर्थन में न कुछ किया और न बोला।

यही भेदभाव संयुक्त राष्ट्र महासभा भारत और ब्रिटेन के वर्तमान शासकों और उनकी राष्ट्रीय सुरक्षा नीतियों के विरुद्ध करता रहा है। इन दशाओं के चलते संयुक्त राष्ट्र महासभा में आमूलचूल परिवर्तन किए जाने की आवश्यकता है। अन्यथा तो यह महासभा एक प्रतीक बन कर रह जाएगी और कोई भी देश इसका यथोचित मान नहीं करेगा।

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