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संपादकीय लेख : समान नागरिक संहिता मौजूद वक्त की जरूरत

समान नागरिक संहिता (यूनिफॉर्म सिविल कोड) का संविधान में जिक्र होने के बावजूद देश में यह राजनीतिक मुद्दा अधिक रहा है। कांग्रेस जहां इसके खिलाफ रही है, वहीं भाजपा इसके पक्ष में रही है। भाजपा के एजेंडे में देश में समान नागरिक संहिता लागू करने का संकल्प रहा है। एक देश एक विधान की हिमायती भाजपा ने केंद्र में आने के बाद अनुच्छेद 370 के खात्मे समेत व्यवस्थागत बदलाव लाने वाले कई ऐसे दूरगामी फैसले किए हैं, जिनका आने वाले समय में असर दिखेगा। दिल्ली हाईकोर्ट ने बहुत ही सही समय पर कहा है कि देश में समान नागरिक संहिता हो और संविधान के अनुच्छेद 44 को लागू करने का यही उचित वक्त है।

संपादकीय लेख : समान नागरिक संहिता मौजूद वक्त की जरूरत
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संपादकीय लेख

Haribhoomi Editorial : समान नागरिक संहिता (यूनिफॉर्म सिविल कोड) का संविधान में जिक्र होने के बावजूद देश में यह राजनीतिक मुद्दा अधिक रहा है। कांग्रेस जहां इसके खिलाफ रही है, वहीं भाजपा इसके पक्ष में रही है। भाजपा के एजेंडे में देश में समान नागरिक संहिता लागू करने का संकल्प रहा है। एक देश एक विधान की हिमायती भाजपा ने केंद्र में आने के बाद अनुच्छेद 370 के खात्मे समेत व्यवस्थागत बदलाव लाने वाले कई ऐसे दूरगामी फैसले किए हैं, जिनका आने वाले समय में असर दिखेगा। दिल्ली हाईकोर्ट ने बहुत ही सही समय पर कहा है कि देश में समान नागरिक संहिता हो और संविधान के अनुच्छेद 44 को लागू करने का यही उचित वक्त है। अगर देश को हमें जातिगत, धर्मगत व जनजातिगत विभाजनों से बाहर निकालना है, नागरिकों को प्रगतिशील बनाना है, तो विवाह जैसी संस्था को संवैधानिक व राष्ट्रीय नियमों से रेगुलेट करने की आवश्यकता है। संवैधानिक रूप से सभी नागरिक के समान होने के बावजूद देश में अनेक स्तर पर सामाजिक विभाजन है। तलाक के एक मामले में फैसला देते हुए दिल्ली उच्च न्यायालय ने कहा, 'देश में यूनिफॉर्म सिविल कोड आवश्यक है।' न्यायमूर्ति प्रतिभा एम. सिंह ने अपने फैसले में कहा, 'आज का भारत धर्म, जाति, समुदाय से ऊपर उठ चुका है।

आधुनिक हिंदुस्तान में धर्म-जाति की बाधाएं भी खत्म हो रही हैं। इस बदलाव की वजह से शादी और तलाक में दिक्कत भी आ रही है। आज की युवा पीढ़ी इन दिक्कतों से जूझे यह सही नहीं है। इसी के चलते देश में समान नागरिक संहिता लागू होना चाहिए।' दिल्ली हाईकोर्ट ने एक जनजाति महिला और उसके हिंदू पति के बीच तलाक के मुकदमे की सुनवाई की है। इस केस में पति हिन्दू मैरिज एक्ट के हिसाब से तलाक चाहता था, जबकि पत्नी का कहना था कि वह जनजाति की है, ऐसे में उस पर हिन्दू मैरिज एक्ट लागू नहीं होता। हाईकोर्ट ने कहा कि भारतीय समाज में बदलाव की वजह से दूसरे धर्म और दूसरी जातियों में शादी करने और फिर तलाक होने में दिक्कतें आ रही हैं। अभी सुप्रीम कोर्ट, सभी हाई कोर्ट और करीब 19000 जिला व सहायक अदालतों में 4.4 करोड़ तलाक के केस पेंडिंग हैं। मार्च 2020 से मार्च 2021 तक एक साल में कोरोना महामारी के दौरान देश में 70 लाख तलाक के केस कोर्ट पहुंचे। दरअसल, संविधान के भाग 4 में राज्य के नीति निर्देशक सिद्धांतों का ब्योरा है। अनुच्छेद 36 से 51 के जरिए राज्य को कई मुद्दों पर सुझाव दिए गए हैं। इन्हीं में से अनुच्छेद 44 राज्य को सही समय पर सभी धर्मों के लिए समान नागरिक संहिता बनाने का निर्देश देता है। इस पर संविधान लागू होने के बाद से अभी तक की सभी सरकारें चुप रही हैं। देश में अभी हिंदू, मुसलमान, सिख, ईसाई, यहूदी, जैन, बौद्ध, जनजाति आदि के लिए विवाह के अलग-अलग नियम हैं।

हिंदू-मुस्लिम के पर्सनल लॉ अलग हैं। इसमें प्रॉपर्टी, शादी, तलाक और उत्तराधिकार जैसे मामले आते हैं। विवाह के स्पेशल मैरिज एक्ट भी है, पर इसके तहत शादियां कम होती हैं। 1985 में शाहबानो केस के बाद यूनिफॉर्म सिविल कोड सुर्खियों में आया था। सुप्रीम कोर्ट ने तलाक के बाद शाहबानो के पूर्व पति को गुजारा भत्ता देने का ऑर्डर दिया था। इसी मामले में शीर्ष कोर्ट ने कहा था कि पर्सनल लॉ में यूनिफॉर्म सिविल कोड लागू होना चाहिए। तत्कालीन राजीव गांधी सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले को पलटने के लिए संसद में बिल पास कराया था। अब केंद्र की पीएम मोदी सरकार को अदालतों की इच्छा का सम्मान करते हुए समान नागरिक संहिता लागू करना चाहिए।

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