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पहले सप्ताह का हंगामे में बीतना दुर्भाग्यपूर्ण

मानसून सत्र के पहले सप्ताह में संसद के दोनों सदनों की कार्यवाही नहीं हो सकी। विपक्ष ने तीन नये केंद्रीय कृषि कानूनों, पेगासस जासूसी मामला, महंगाई, जनसंख्या, चीन सीमा विवाद आदि मुद्दों को लेकर सदन को नहीं चलने दिया। पूरे सप्ताह के दौरान सिर्फ मंगलवार को उच्च सदन में उस समय चार घंटे सामान्य ढंग से कामकाज हो पाया जब कोविड-19 के कारण देश में उपजे हालात को लेकर, सभी दलों के बीच आपस में बनी सहमति के आधार पर चर्चा की गयी।

पहले सप्ताह का हंगामे में बीतना दुर्भाग्यपूर्ण
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संसद भवन (प्रतीकात्मक तस्वीर)

Haribhoomi Editorial : संसद के मानसून सत्र का पहला सप्ताह हंगामे में बीत गया। संसद सत्र के लिए यह दुर्भाग्यपूर्ण है। देश हित में है कि संसद चले, जरूरी मुद्दों पर स्वस्थ बहस हो, लंबित बिल पास हो, नए विधेयक भी पेश हों, उन पर चर्चा हो, फिर वह कानून के अंजाम तक पहुंचे। लेकिन इस बार सत्र के पहले दिन से ही ऐसा नहीं हो पा रहा है। मानसून सत्र के पहले दिन शुरू होने के आठ मिनट बाद ही विपक्ष ने हंगामा शुरू कर दिया। 19 जुलाई को जब संसद का यह सत्र शुरू हुआ तो लगा जैसे विपक्ष के हंगामा के लिए ही यह आहुत हुआ है।

मानसून सत्र के पहले सप्ताह में संसद के दोनों सदनों की कार्यवाही नहीं हो सकी। विपक्ष ने तीन नये केंद्रीय कृषि कानूनों, पेगासस जासूसी मामला, महंगाई, जनसंख्या, चीन सीमा विवाद आदि मुद्दों को लेकर सदन को नहीं चलने दिया। पूरे सप्ताह के दौरान सिर्फ मंगलवार को उच्च सदन में उस समय चार घंटे सामान्य ढंग से कामकाज हो पाया जब कोविड-19 के कारण देश में उपजे हालात को लेकर, सभी दलों के बीच आपस में बनी सहमति के आधार पर चर्चा की गयी। इस सप्ताह के आखिरी दिन शुक्रवार को विपक्ष के हंगामे के कारण लोकसभा एक बार के स्थगन और राज्यसभा तीन बार के स्थगन के बाद पूरे दिन के लिए स्थगित कर दी गई। दोनों सदनों में प्रश्नकाल और शून्यकाल नहीं हो सका तथा सभी गैर-सरकारी कामकाज भी हंगामे की भेंट चढ़ गया। शुक्रवार को ही तृणमूल कांग्रेस के एक राज्यसभा सदस्य शांतनु सेन को शेष सत्र के लिए सदन से निलंबित कर दिया गया।

सेन ने बृहस्पतिवार को केंद्रीय मंत्री अश्विनी वैष्णव के हाथों से ''पैगासस विवाद'' पर दिए जा रहे उनके बयान की प्रति छीन ली थी और उसके टुकड़े कर हवा में उछाल दिए थे। राज्यसभा के सभापति एम वेंकैया नायडू ने उच्च सदन में लगातार हो रहे हंगामे और व्यवधान पर क्षोभ प्रकट किया है। उन्होंने सूचना प्रौद्योगिकी और संचार मंत्री अश्विनी वैष्णव के हाथों से सेन द्वारा बयान की प्रति छीन उसके टुकड़े हवा में लहराने की घटना को 'संसदीय लोकतंत्र पर हमला' करार दिया। दरअसल, कोविड महामारी की विभीषिका के बीच यह सत्र आयोजित हुआ है, इसमें जनता से जुड़े कई अहम मुद्दों पर चर्चा की जानी है। ऐसे में विपक्षी सांसदों के अशोभनीय आचरणों से व्यवधान पड़ना अच्छी बात नहीं है। विपक्ष को अपना रवैया सुधारना चाहिए, विपक्षी सांसदों को अपने असंसदीय आचरण को संसदीय बनाना चाहिए। सभी सांसदों को विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र के मंदिर संसद की गरिमा का सम्मान करना चाहिए। बयान फाड़ने जैसी घटनाओं से संसद व संविधान का सम्मान प्रभावित होता है। यह पहली बार नहीं है, पहले के सत्रों में भी विपक्षी नेता अपने असंसदीय व्यवहार से व्यवधान उत्पन्न कर संसद के कामकाज को बाधित करते रहे हैं।

देश के लिए कानून बनाने की जगह अगर संविधान की मर्यादा का उल्लंघन हो तो यह उन सांसदों द्वारा अपने मतदाताओं का अपमान है। संसद हमेशा राजनीतिक दलों से बहुत बड़ी है क्योंकि उसके पास संवैधानिक अधिकार हैं। संसद को अपने दलों की राजनीति का अड्डा नहीं बनाना चाहिए। जब देश आजादी के 75वें साल में प्रवेश कर रहा है तो ऐसे समय में सदन की कार्यवाही में व्यवधान अच्छा संदेश नहीं देता। सांसद ही संसदीय लोकतंत्र के संरक्षक हैं, उन्हें अपने संसदीय क्षेत्र, राज्य के मुद्दे सदन में उठाने चाहिए, सरकार जो बिल पेश करे उस पर तथ्यपरक चर्चा करनी चाहिए, अपना सुझाव देना चाहिए, न कि संसद की कार्यवाही को ठप करना चाहिए। सदन में व्यवधान न्याय का कोई तरीका नहीं है। हम उम्मीद कर सकते हैं कि सोमवार से शुरू अगले सप्ताह में संसद में कुछ कामकाज होंगे।

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