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विश्व शांति के लिए खतरा दो राहे पर खड़ा यूक्रेन

यूक्रेन को लेकर रूस और अमेरिका का मतभेद विश्व शांति के लिए खतरा बन सकता है।

विश्व शांति के लिए खतरा दो राहे पर खड़ा यूक्रेन
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नई दिल्‍ली. यूक्रेन शीतयुद्ध की एक प्रयोगशाला बनने के कगार पर पहुंच गया लगता है। राजनीतिक उथल-पुथल के बाद अंतरराष्ट्रीय समझौतों का हवाला देकर और रूसी भाषी लोगों की सुरक्षा के नाम पर रूस ने वहां सेना भेज दी है। वहीं अमेरिका ने अंतरराष्ट्रीय कानूनों का उल्लंघन करार देने के साथ ही मास्को को इसका खामियाजा भुगतने की चेतावनी भी दी है। यह मतभेद विश्व शांति के लिए खतरा बन सकता है। दोनों देश वर्चस्व को लेकर इससे पहले ही सीरिया के मुद्दे पर आमने सामने आए थे।

यूक्रेन में हिंसा और अराजकता का दौर नवंबर 2013 में शुरू हुआ जब राष्ट्रपति विक्टर यानुकोविच ने यूरोपीय संघ से व्यापक संबंधों के प्रस्ताव को ठुकराते हुए रूस से रिश्ते प्रगाढ़ करने को प्राथमिकता दी। उन्होंने यूक्रेन को आर्थिक मंदी से उबारने के लिए रूस के बेल आउट पैकेज को मंजूरी दी थी। यानुकोविच का झुकाव रूस की ओर है। हालांकि विपक्ष ने इसका विरोध किया पर उसे बलपूर्वक दबा दिया गया। हालांकि यानुकोविच को लोगों के विरोध के बाद जाना पड़ा।

यूक्रेन में रूस के कई सामरिक और आर्थिक हित हैं, जिसके कारण रूस नहीं चाहता कि यूक्रेन यूरोप और अमेरिका के करीब जाए। अमेरिका और रूस के आमने-सामने होने की यही वजह है। यूक्रेन के नागरिकों का एक हिस्सा मांग कर रहा है कि देश का यूरोपीय यूनियन के साथ मजबूत रिश्ता बने। यूरोपीय यूनियन के साथ करार से यूक्रेन के लोग पूरे यूरोप में बिना वीजा यात्रा कर सकते हैं, व्यापार कर सकते हैं और यूरोपीय कंपनियों से निवेश आकर्षित कर सकते हैं।

उन्हें लगता है कि यूरोप से जुड़ने से देश की अर्थव्यवस्था मजबूत होगी। दरअसल हंगरी, पोलैंड, रोमानिया और स्लोवाकिया जैसे उसके पड़ोसी देशों ने यूरोपीय संघ के साथ ऐसे समझौते कर रखे हैं। यूक्रेन की आबादी करीब साढ़े चार करोड़ है। भौगोलिक रूप से यह रूस और यूरोपीय संघ के बीच में स्थित है। 1991 तक यह पूर्व सोवियत संघ का हिस्सा था। स्वतंत्र होने के बाद यूक्रेन कभी भी राजनीतिक रूप से स्थिर नहीं रहा है।

वहां नेताओं के खिलाफ जनक्रांतियां होती रहीं। 2004 में ही यानुकोविच के खिलाफ लोग सड़कों पर आ गए थे, जिसे ऑरेंज क्रांति के नाम से जाना गया है। यूक्रेन की करीब 77 फीसदी आबादी यूक्रेनियाई और लगभग 20 फीसदी आबादी रूसी भाषा बोलती है। देश का उत्तर-पश्चिम क्षेत्र यूरोप का सर्मथक माना जाता है। यहां रोमन कैथोलिक की बड़ी संख्या में हैं। जबकि रूस से सटे हुए दक्षिण-पूर्वी भाग के अधिकांश आबादी रूस सर्मथक है।

देखा जाए तो इस वजह से भी यूक्रेन का संकट उलझ गया है। मौजूदा अंतरिम राष्ट्रपति के लिए यह बड़ी चुनौती है कि वह किस तरह बीच का रास्ता निकालते हैं और एक सर्वमान्य हल पर पहुंचते हैं। जाहिर है, यूक्रेन आज एक दोराहे पर खड़ा है। हालांकि अमेरिका रूस का विरोध कर रहा है, परंतु उसे खुद अपने गिरेबान में झांकने चाहिए, जिसने पिछले डेढ़ दशक में कई देशों जैसे इराक, अफगानिस्तान, ईरान व इजरायल आदि देशों में सैन्य कार्रवाइयां की है। यूक्रेन में किसी भी तरह की कार्रवाई संयुक्त राष्ट्र संघ को करनी चाहिए न की अमेरिका या रूस को।

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