Top
Hari bhoomi hindi news chhattisgarh

Trump Kim Meeting: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और उत्तर कोरियाई शासक किम जोंग की सीक्रेट मीटिंग के मायने

जोंग को ताकतवर नेता बनाकर प्रशांत क्षेत्र में छद्म युद्ध की जमीन तैयार कर ली है। अमेरिका को झुकाकर प्रशांत में अमेरिकी समर्थकों को अलग-थलग करने के मिशन पर वह आगे बढ़ रहा है और बहुत हद तक इसमें वह सफल भी रहा है।

Trump Kim Meeting: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और उत्तर कोरियाई शासक किम जोंग की सीक्रेट मीटिंग के मायने
X

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप उत्तर कोरियाई शासक किम जोंग एक दूसरे के खिलाफ लंबे समय तक अपनी-अपनी तलवारें म्यान से खींचते दिखते रहेे। दोनों ने परमाणु बम का बटन अपनी-अपनी टेबल के नीचे होने का दावा किया और एक दूसरे के लिए अमर्यादित शब्दों का इस्तेमाल करने में संकोच भी नहीं किया, लेकिन इन सबके बीच ही जब राष्ट्रपति ट्रंप का ट्वीट आया कि वे किम जोंग उन से मिलने की इच्छा रखते हैं, तो खेल की दिशा ही बदल गई।

दोनों देशों के बीच मिलने का रोडमैप बनना शुरू ही हुआ था कि किम बीजिंग पहुंच गए। इस बीच डोनाल्ड ट्रंप की तरफ से बातचीत के स्थगित किए जाने की भी खबर आई और उनके वकील की तरफ से यह बयान भी कि पुनः बातचीत के लिए कोरियाई शासक ने हाथ जोड़े। इससे इतना तो स्पष्ट है कि दोनों देश सहज रूप से बातचीत करने नहीं जा रहे हैं। दोनों की ही अपनी-अपनी जरूरतें हैं, जो उन्हें सिंगापुर में मिलने के लिए विवश अथवा प्रेरित कर रही हैं।

ऐसे में प्रश्न यह उठता है कि आखिर वह कौन सी वजह है जिसके चलते कुछ महीने पहले तक एक-दूसरे के खिलाफ जहर उगलने वाले ट्रंप और किम जोंग उन अब गले मिलने को तैयार हैं? क्या यह मुलाकात किम और ट्रंप की ‘चालाकी' का परिणाम है, जैसा कि कुछ विश्लेषक मान रहे हैं या फिर कोई तीसरा पक्ष है जो इसकी पटकथा लिख रहा है?

किम ने उत्तर कोरिया को परमाणु शक्ति सम्पन्न बनाया है और अमेरिका को यह संदेश देकर कि परमाणु बम का बटन उनकी उंगली के नीचे है, खुद को वैश्विक नेता के रूप में पेश कर दिया। इसके बाद भी ट्रंप ने उन्हें मुलाकात का प्रस्ताव दिया और बीजिंग ने वाशिंगटन से पहले ही उनकी मेजबानी की। इसका अर्थ यही निकलता है कि प्योंगयांग सामान्य हैसियत से ऊपर उठ चुका है।

यहां दो संभावनाएं नजर आती हैं। एक है, बीजिंग-प्योंगयांग धुरी की तरफ शक्ति संतुलन की शिफ्टिंग। दूसरी तरफ अमेरिका की जो अब तक नीति रही है, विशेषकर ट्रांस-पेसिफिक नीति, उसके द्वारा बीजिंग-प्याेंगयांग बाॅन्ड को कमजोर नहीं किया जा सकता। यह अमेरिका जान चुका है, इसलिए अब उन्होंने 180 डिग्री घूम जाने का निर्णय लिया,

लेकिन देखना यह है कि इस मुलाकात में किस देश को ज्यादा मिलता है और किसे ज्यादा भुगतान करना। किसी भी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले कुछ बिंदुओं पर विचार करने की जरूरत होगी। विशेष रूप से कारोबारी युद्ध और हिन्द-प्रशांत में अमेरिका और चीन (या चीन-रूस) की हलचलों को देखें तो स्पष्ट हो जाएगा कि दोनों ही देश शीतयुद्ध की स्थिति से गुजर रहे हैं।

दोनों साॅफ्ट पावर का इस्तेमाल एक दूसरे को पीछे धकेलने के लिए कर रहे हैं। ऐसे में प्रशांत क्षेत्र में रिसेट आॅफ पावर और रिबैलेंस की जरूरत है। उधर अमेरिकी खेमे के देशों को देखें तो वहां भी स्थितियां बदलती हुई दिख रही हैं। उत्तर और दक्षिण कोरिया के प्रमुखों की मुलाकात के पश्चात दक्षिण कोरिया कुछ हद तक पाॅजीटिव दिख रहा है।

वह चाहता है कि ट्रंप-किम मुलाकात हो। चाहता तो जापान भी है, लेकिन जापान यह गारंटी चाहता है कि उत्तर कोरिया के परमाणु हथियारों को मान्यता न दी जाए, क्योंकि उत्तर कोरियाई मिसाइलों की जद में जापान बड़ी आसानी से आ जाता है। यहां एक पक्ष यह भी है कि किम-ट्रंप मुलाकात की संभावनाओं की घोषणा होते हुए किम जोंग उन, शी जिनपिंग से मिलने बीजिंग क्यों पहुंच गए।

बिना मिले ही ट्रंप से मुलाकात कर लेते तो चीन को चुनौती की तरह चुभ सकती थी। चीन यह नहीं चाहता कि उसका कोई सिपहसालार बिना उसकी अनुमति के अमेरिका से मिले, इसलिए शी जिनपिंग ने किम जोंग उन को बीजिंग आमंत्रित किया। इससे यह भी जाहिर हो गया कि चीन प्योंगयांग-वाशिंगटन के बीच होने वाली वार्ता की पटकथा को मुख्य हिस्सा तो बीजिंग द्वारा लिखा गया है।

एक महत्वपूर्ण बात यह है कि बराक ओबामा के शासनकाल से प्रशांत क्षेत्र को लेकर अमेरिका की एक नीति बन रही थी, जो मनीला में क्वैड (रणनीति चतुर्भुज) के निर्माण के साथ पूरी होती दिखी जिसका उद्देश्य चीन को घेरने का कहीं अधिक है, लेकिन यह तभी संभव है जब क्वैड के शेष तीनों देश यानी भारत, जापान और आॅस्ट्रेलिया अमेरिका पर भरोसा करें

साथ ही दक्षिण कोरिया सहित पूर्वी एशिया के देश यह विश्वास करें कि अमेरिका उनकी सम्प्रभुता के खिलाफ उत्पन्न होने वाले खतरों से सुरक्षित करने के लिए रक्षात्मक दीवार का काम करेगा, लेकिन अब जब ट्रंप किम जोंग उन के निकट जाते दिख रहे हैं तब इन देशों का विश्वास डगमगा रहा है। ऐसी स्थिति में यह संभव है कि चीन के खिलाफ हिंद-प्रशांत क्षेत्र में बना रणनीति फ्रंट बिखर जाए और चीन निर्बाध रूप से अपने मिशन को पूरा कर सके।

दरअसल चीन एक तीर से कई निशाने साधने की कोशिश कर रहा है। पहला यह कि उसने किम जोंग को ताकतवर नेता बनाकर प्रशांत क्षेत्र में छद्म युद्ध की जमीन तैयार कर ली है। दूसरे, अमेरिका को झुकाकर प्रशांत में अमेरिकी समर्थकों को अलग-थलग करने के मिशन पर वह आगे बढ़ रहा है और बहुत हद तक इसमें वह सफल भी रहा है।

तीसरे, किम से यह घोषणा करवाकर कि अब वे परमाणु परीक्षण नहीं करेंगे कोरियाई इंटरकॉन्टिनेंटल बैलिस्टिक मिसाइलों सहित परमाणु हथियारों को वैधानिकता की श्रेणी में लाने का काम कर दिया। इससे ट्रंप के सामने एक चुनौती भी उत्पन्न हो गई है, अर्थात यदि डोनाल्ड ट्रंप कोरियाई परमाणु हथियारों और मिसाइलों को वैधानिकता प्रदान करते हैं और प्रशांत क्षेत्र के उनके सहयोगी बिदक जाएंगे

और डोनाल्ड ट्रंप ऐसा मानने से इनकार करते हैं तो बैठक बेनतीजा रहेगी। उत्तर कोरिया की जो आर्थिक स्थिति है, उसके चलते यह जरूरी है कि प्रतिबंध हटें। यदि किम जोंग और डोनाल्ड ट्रंप अच्छे नतीजे पर पहुंचते हैं तो निरंतर कड़े प्रतिबंधों के दौर से गुजर रही उत्तर कोरियाई अर्थव्यवस्था को जर्जर हालत से उबरने का अवसर मिल जाएगा और कोरियाई हथियारों को वैधानिकता भी प्राप्त हो जाएगी।

अगर ऐसा हुआ तब तो यह माना जाएगा कि गेम बीजिंग-प्योंगयांग द्वारा प्लान किया गया था। यदि दुनिया को यह संदेश चला गया, तो अमेरिका की साख घटेगी और संभव है कि उसके परंपरागत मित्र उससे दूरी बना लें। बहरहाल राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप और उत्तर कोरियाई शासक किम जोंग उन मुलाकात के लिए तय जगह सिंगापुर पहुंच चुके हैं।

यदि सब कुछ ठीक रहा कि तो कल वाशिंगटन और प्यांेगयांग एक दूसरे के करीब आएंगे। अमेिरका ने इस मुलाकात से पहले शर्त रखी थी कि उत्तर कोरिया को अपना परमाणु कार्यक्रम बंद कर होगा, लेकिन इसके बदले में उत्तर कोरिया क्या चाहता है यह अभी तक साफ नहीं हो पाया था।

हालांकि किम जोंग उन की तरफ से कहा गया है कि वे ट्रंप के साथ ‘पूर्णतः शांति स्थापित करने वाले तरीके' पर बात करेंगे। अब देखना यह है कि इस पूर्णतः शांति का दायरा क्या होता है, क्योंकि कोरिया सद्दाम हुसैन और गद्दाफी की दुर्दशा देखने के बाद शस्त्रहीन होना तो नहीं चाहेगा।

और पढ़े: Haryana News | Chhattisgarh News | MP News | Aaj Ka Rashifal | Jokes | Haryana Video News | Haryana News App

Next Story
Top