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तीन तलाक: कांग्रेस का चेहरा फिर हुआ बेनाकाब

आखिरकार कांग्रेस, तृणमूल कांग्रेस और दूसरे विरोधी दलों का मुस्लिम महिलाओं को तीन तलाक से मुक्ति दिलाने के नाटक का राज्यसभा में पर्दाफाश हो गया।

तीन तलाक: कांग्रेस का चेहरा फिर हुआ बेनाकाब

आखिरकार कांग्रेस, तृणमूल कांग्रेस और दूसरे विरोधी दलों का मुस्लिम महिलाओं को तीन तलाक से मुक्ति दिलाने के नाटक का राज्यसभा में पर्दाफाश हो गया। यह भी साफ हो गया कि 1400 साल से मुस्लिम महिलाओं को जहन्नुम में धकेलने वाली कुप्रथा को कांग्रेस खत्म करने के पक्ष में नहीं है।

लोकसभा में कांग्रेस ने तीन तलाक कानून का समर्थन किया और तृणमूल कांग्रेस ने चर्चा में हिस्सा लेने के लिए नोटिस तक नहीं दिया था, अब यही दल राज्यसभा में कानून न बने, इसके लिए अलोकतांत्रिक तरीके अपना रही है।

राज्यसभा में बिल को प्रवर समिति को भेजने और समिति के सदस्यों के नाम तय करने के लिए सदन के नियमों तक का पालन नहीं किया। कांग्रेस के रुख के कारण मुस्लिम महिलाओं में भारी नाराजगी है।

मुस्लिम महिलाओं को उम्मीद है कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर संसद में कानून बनेगा और उन्हें शान से जीने का हक मिलेगा। मुस्लिम महिलाओं को आखिर कांग्रेस और दूसरे दल क्यों बराबरी का हक नहीं दिलाना चाहते हैं।

कांग्रेस के नेता आरोप लगा रहे हैं कि इससे मुस्लिम महिलाओं को न्याय नहीं मिलेगा और भारतीय जनता पार्टी राजनीतिक फायदे के लिए ऐसा कर रही है। ऐसा कहकर कांग्रेस के नेता सुप्रीम कोर्ट के 22 अगस्त को दिए गए फैसले का निरादर कर रहे हैं।

1400 साल पुरानी तीन तलाक की कुप्रथा पर सुप्रीम कोर्ट की खंडपीठ ने बहुमत से फैसला दिया था कि तलाक-ए- बिद्दत वॉइड असंवैधानिक और गैरकानूनी है। सुप्रीम कोर्ट ने सरकार को छह महीने में कानून बनाने को कहा था।

पहले केंद्र की तरफ से यहकहा गया था कि कानून बनाने की जरूरत है पर मुस्लिम समाज में लगातार जारी तीन तलाक की खबरों के बाद कानून बनाने की जरूरत महसूस की गई।

सुप्रीम कोर्ट के फैसले यह लगा कि मुस्लिम समाज में वॉट्सएप, ईमेल, एसएमएस, फोन, चिट्ठी जैसे अजीब तरीकों से तलाक देने पर रोक लगेगी, पर ऐसा नहीं हुआ। क्या मुस्लिम परंपराओं में इन सब तरीकों के जरिये तलाक देने का रिवाज था।

मुस्लिम समाज ही महिलाएं चाहती हैं कि कानून के अनुसार तलाक की व्यवस्था हो। इसके लिए वे लंबे समय से लड़ाई लड़ रही हैं। केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर कानून बनाने के लिए लोकसभा में बिल पेश किया।

वहां से पारित भी हो गया। कांग्रेस के नेताओं ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर तो बहुत वाहवाही लूटी थी और कहा था कि हमारे कारण सुप्रीम कोर्ट ने ऐसा फैसला दिया है, पर अब कांग्रेस राज्यसभा में बिल पारित कराने से क्यों पीछे भागे रही है।

यह कांग्रेस की राजनीति का एक और दोहरा रवैया उजागर हुआ है। कांग्रेस की ढोंगी राजनीति का सच जनता के सामने आ गया है। पश्चिम बंगाल की महिला मुख्यमंत्री तो खुद नमाज पढ़ती हैं अब खुलकर तीन तलाक कानून के खिलाफ सामने आ गई हैं।

कांग्रेस और दूसरे दल सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर भी अमल नहीं होना देना चाहते हैं। हैरानी की बात तो यह है कि अपने को सेक्युलर कहने वाले कम्युनिस्ट भी कांग्रेस के साथ खड़े हैं। सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर अगस्त में खुशी जाहिर करने वाले कांग्रेस के नेता राज्यसभा में बिल का विरोध कर राजनीति कर रहे हैं।

कांग्रेस के नेताओं को लग रहा है कि राजनीति में घटते असर के कारण इस तरह का नाटक जरूरी है। मुस्लिम समाज भी यह अच्छी तरह समझता है कि कांग्रेस के नेता केवल राजनीति फायदे के लिए उनका इस्तेमाल करते रहे हैं।

यह सब हम देख रहे हैं कि उत्तर प्रदेश और गुजरात के विधानसभा चुनावों में भी कांग्रेस को मुस्लिम समाज का समर्थन नहीं मिला। इतना ही विधानसभा चुनाव में बहुजन समाज पार्टी को भी उत्तर प्रदेश के मतदाताओं ने कोई तरजीह नहीं दी।

मीडिया में आई खबरों के अनुसार उत्तर प्रदेश में मुस्लिम महिलाओं ने भाजपा उम्मीदवारों का समर्थन दिया था, इस कारण भी कांग्रेस और दूसरे विरोधी दलों को शायद डर लग रहा है कि संसद में तीन तलाक के खिलाफ कानून बनने के बाद मुस्लिम महिलाओं का झुकाव भाजपा की तरफ होगा।

हमें यह भी ध्यान रखना होगा कि विरोध के बावजूद आखिर में हिन्दू कोड बिल बना और अब तीन तलाक के खिलाफ कानून तो बनेगा, कुछ समय बेशक लग सकता है।

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