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तीन तलाक के खिलाफ कठोर कानून जरूरी, जानिए क्यों सताता है मुस्लिम महिलाओं को ये डर

तीन तलाक पर संसद में बिल पेश किया जाना मुस्लिम महिलाओं के इतिहास में एक स्वर्णिम दिन के रूप में अंकित होगा।

तीन तलाक के खिलाफ कठोर कानून जरूरी, जानिए क्यों सताता है मुस्लिम महिलाओं को ये डर

तीन तलाक पर संसद में बिल पेश किया जाना मुस्लिम महिलाओं के इतिहास में एक स्वर्णिम दिन के रूप में अंकित होगा। शरीयत व्यवस्था में तीन तलाक मुस्लिम महिलाओं के लिए एक जीवनभर सताने वाला डर था। यह काले कानून से कम नहीं था।

एक बार में तीन बार-तलाक..तलाक..तलाक बोल कर वैवाहिक संबंध खत्म करने की 1400 साल पुरानी प्रथा-तलाक ए-बिद्दत को देश की सर्वोच्च अदालत सुप्रीम कोर्ट ने शून्य, असंवैधानिक और गैरकानूनी करार दिया था।

शीर्ष अदालत ने सरकार से छह महीने में फौरी तीन तलाक प्रथा के खिलाफ कानून बनाने को कहा था। उच्चतम न्यायालय के निर्देश का पालन करते हुए ही केंद्र सरकार ने मुस्लिम महिला (विवाह अधिकार संरक्षण) विधेयक, 2017 (द मुस्लिम वूमन प्रोटेक्शन ऑफ राइट्स ऑन मैरिज बिल) संसद में पेश किया है।

शरीयत में तलाक-ए-अहसन और तलाक-ए-हसन नाम से विवाह विच्छेद के दो और प्रावधान हैं, जिसमें एक निश्चित समय के अंतराल के बाद तलाक कहने का प्रावधान है और सुलह की गुंजाइश रखी गई है।

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तलाक-ए-बिद्दत की सबसे अमर्यादित व्यवस्था हलाला है, जिसमें तीन तलाक के बाद पति-पत्नी फिर से साथ रहना चाहे तो पुनर्विवाह से पहले महिला को कम से कम एक दिन के लिए दूसरे पुरुष की पत्नी बननी पड़ती है। हलाला के दौरान मुस्लिम महिलाओं को गंभीर मानसिक वेदना से गुजरना पड़ता है।

तीन तलाक पर सुप्रीम कोर्ट

शीर्ष अदालत ने फौरी तीन तलाक को गैरकानूनी करार देकर लाखों मुस्लिम महिलाओं की मर्यादा की रक्षा की थी। अब सरकार तीन तलाक के खिलाफ विधेयक लाकर इसे कानून का अमलीजामा पहनाने की कोशिश कर रही है, जिसमें एक बार में तीन तलाक कहना क्रिमिनल अपराध होगा और इस अपराध के दोषियों को तीन साल कारावास की सजा होगी।

तीन तलाक पर कानून

बिल के मुताबिक, जुबानी, लिखित या किसी इलेक्ट्रॉनिक (वॉट्सएप, ईमेल, एसएमएस) तरीके से एकसाथ तीन तलाक (तलाक-ए-बिद्दत) देना गैरकानूनी और गैर जमानती होगा। इसमें महिला अपने नाबालिग बच्चों की कस्टडी और गुजारा भत्ते का दावा भी कर सकेगी। निश्चित रूप से यह बिल सायरा बानो, जकिया हसन जैसे सैकड़ों मुस्लिम महिलाओं के अथक संघर्ष की जीत है।

तीन तलाक पर मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड

मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड अगर समय के साथ तीन तलाक को खत्म करने की कोशिश करता तो आज अदालत को दखल नहीं देना पड़ता और सरकार को बिल नहीं लाना पड़ता। इस्लामिक देश बांग्लादेश, मिस्र, मोरक्को, इंडोनेशिया, मलेशिया और पाकिस्तान समेत 22 मुस्लिम देशों में पहले से ही तीन तलाक की प्रथा अंत की जा चुकी है।

तीन तलाक बिल और कानून

लेकिन भारत जैसे धर्मनिरपेक्ष व लोकतंत्रिक गणतंत्र में तीन तलाक का जारी रहना चिंतनीय था। तीन तलाक के खिलाफ आए बिल जब कानून बन जाएगा, तो इससे मुस्लिम महिलाओं की गरिमा की हिफाजत होगी, उन्हें कानूनी सुरक्षा मिलेगी और उन्हें सम्मान से जीने की हक मिलेगा। उनके पास तीन तलाक के खिलाफ एक कानूनी हथियार होगा।

तीन तलाक पर धर्म-मुस्लिम समाज

कहीं से भी यह विधेयक सरकार का शरीयत में दखल नहीं माना जाना चाहिए। तीन तलाक बिल पर राजनीति भी दुर्भाग्यपूर्ण है। राजनीतिक दल एतिहासिक कुरीतियों को उलीचकर आने वाली पीढ़ियों के लिए बंदिशों से मुक्त खुला आकाश बनाने का मार्ग प्रशस्त करेंगे, तो यह उनकी बड़ी देश सेवा होगा। धर्म के नाम पर तीन तलाक की जड़ता को तोड़ने में अहम भूमिका निभाने वाली प्रगतिशील मुस्लिम बेटियों की जिजीविषा सलाम व स्वागत योग्य है। तीन तलाक के खिलाफ कठोर कानून जरूरी है।

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