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अलका आर्य का लेख : आदिवासी टीकाकरण की निगरानी

तीसरी लहर की आशंका के बीच विशेषज्ञों ने कहा है कि कोरोना संक्रमण के फैलने की रफ्तार का संकेत देने वाले आर-फैक्टर में वृद्धि होने से महामारी के फिर से सिर उठाने की चिंता सताने लगी है। जनजातीय मामलों के मंत्रालय ने आदिवासी लोगों की खास सुध ली है। आदिवासियों को तीसरी लहर के प्रकोप से दूर रखने के लिए हाल में ‘कोविड टीका संग सुरक्षित वन,धन और उद्यम’ नामक अभियान शुरू किया गया है। कोरोना संक्रमण की तीसरी लहर की आशंका के मद्देनजर जनजातीय कार्य मंत्रालय ने जो पहल शुरू की है, उसे सफल बनाने के लिए यानी लक्षित समूह उससे लाभान्वित हों, इसके लिए बराबर निगरानी की जरूरत होगी।

अलका आर्य का लेख :  आदिवासी टीकाकरण की निगरानी
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अलका आर्य

अलका आर्य

कोरोना का खतरा फिर बढ़ता दिख रहा है। केरल व पूर्वोत्तर राज्यों में नए मामलों में बढ़ोतरी से मुल्क में सक्रिय मरीजों की संख्या फिर से बढ़ने लगी है। तीसरी लहर की आशंका के बीच विशेषज्ञों ने कहा है कि कोरोना संक्रमण के फैलने की रफ्तार का संकेत देने वाले आर-फैक्टर में वृद्धि होने से महामारी के फिर से सिर उठाने की चिंता सताने लगी है। वैसे कोरोना महामारी की तीसरी लहर की आशंका के बाबत खबरें तो करीब जून में ही आने लगी थी। केंद्र व राज्य सरकारें इससे निपटने के लिए बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं मुहैया कराने के आश्वासन भी दे रही हैं। इस संदर्भ में जनजातीय मामलों के मंत्रालय ने आदिवासी लोगों की खास सुध ली है। आदिवासियों को तीसरी लहर के प्रकोप से दूर रखने के लिए हाल में 'कोविड टीका संग सुरक्षित वन,धन और उद्यम' नामक अभियान शुरू किया गया है। इस अभियान के शुभारंभ के मौके पर जनजातीय मामलों के केंद्रीय मंत्री अर्जुन मुंडा ने कहा कि यह सुनिश्चित करने के लिए कि तीसरी लहर जनजातीय क्षेत्रों को प्रभावित न करे, जनजातीय लोगों का टीकाकरण महत्वपूर्ण हो गया है। जनजातीय समुदायों को महामारी के दौरान न केवल सुरक्षित और स्वस्थ रहना, बल्कि आजीविका संबंधी गतिविधियों को जारी रखने में भी सक्षम होना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि इस अभियान के माध्यम से हमें उम्मीद है कि हम अपने वन धन विकास केंद्रों और गांवों को अपने राज्यों में पहला कोविड मुक्त और सभी प्रतिबंधों से मुक्त घोषित करने में सफल होंगे।

गौरतलब है कि मुल्क में करीब 10 करोड़ 50 लाख आदिवासी आबादी है। जहां तक इस आबादी के काेरोना टीकाकरण के आंकड़ों का सवाल है तो उसके बारे में जनजातीय मामलों की राज्य मंत्री रेणुका सिंह ने हाल ही में लोकसभा में बताया कि 15 जुलाई तक देश के 25 राज्यों के चिह्िनत 176 जिलों में 4.81 करोड़ टीके लग चुके हैं। राज्य मंत्री ने यह भी स्पष्ट कर दिया कि सरकार की प्राथमिकता में आदिवासी कहीं भी पीछे नहीं छूटे हैं। कोविड टीकाकरण अभियान आदिवासी इलाकों में भी सफल हो इसके लिए सारे प्रयास किए गए हैं। मुल्क में आदिवासियों के बीच टीकाकरण को लेकर निरंतर जागरूकता अभियान जारी रखने की जरूरत है। उसके कई कारण हैं-मुल्क के जिन राज्यों में जनजातीय समुदाय हैं, हरेक की अपनी-अपनी परंपराए हैं। बोलियां भी अलग-अलग हैं। भौगोलिक दृष्टि से बिखरे हुए हैं। सामाजिक व आर्थिक पैमाने पर भी मुख्यधारा से पीछे हैं। स्वास्थ्य सेवाओं तक उनकी पहुंच बहुत ही सीमित है। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने जनजातीय समुदायों को टीकाकरण की प्राथमिकता वाली सूची में रखने की अनुशंसा की है। यूनाइटेड नेंशस परमानेंट फोरम ऑन इन्डिजनस इश्यू के अनुसार ये लोग सामाजिक-आर्थिक रूप से अधिक हाशिए पर होने के कारण महामारी में अन्य लोगों की तुलना में अधिक संवेदनशील होते हैं, क्योंकि इनकी प्रभावशाली निगरानी, जल्दी चेतावनी देने वाली प्रणाली तक पहुंच कम होती है। स्वास्थ्य व सामाजिक सेवाएं भी आसानी से उपलब्ध नहीं होती। दूर-दराज, जंगलों के आस-पास बसने वाले जनजातीय समुदाय कोविड संक्रमण व टीकाकरण के बारे में कई भ्रम व गलत जानकारियों से घिरे हुए हैं। मसलन-यह महज साधारण सर्दी-जुकाम है। इसका टीका लगवाने से शरीर कमजोर हो जाएगा तो काम कैसे करेंगे आदि-आदि।

कोविड टीका संग सुरक्षित वन, धन और उद्यम अभियान ऐसे ही निराधार धारणाओं का जवाब देने व टीकाकरण की रफ्तार को तेजी देने के लिए शुरू किया गया है। जनजातीय कार्य मंत्रालय के तहत आने वाले ट्राइफेड (ट्राइबल कोआपरेटिव मार्केटिंग डेवलपमेंट फेडरेशन आॅफ इंडिया), बाल अधिकारों के लिए काम करने वाली अंतरराष्ट्रीय संस्था यूनिसेफ और विश्व स्वास्थ्य संगठन मिलकर इस मुहिम का संचालन कर रहे हैं। इस मुहिम की खास बात यह है कि यह देशभर के 45,000 वन धन विकास केंद्रों के माध्यम से 50 लाख जनजातीय लोगों के बीच टीकाकरण को बढ़ावा देगा। यह अभियान मुख्यतः तीन बिंदुओं पर आधारित है-पहला प्रत्येक जीवन कीमती है, इसलिए टीकाकरण जरूरी है। दूसरा जीविका-यदि आप को यह टीका लग चुका है तो आप संक्रमित होने के डर के बिना अपने वन धन विकास केंद्र और आजीविका संबंधी गतिविधियों को जारी रख सकते हैं। यह आपको अस्पताल में भर्ती होने व अन्य आकस्मिक खर्चों से भी बचाता है। तीसरा जागरूकता। वन धन विकास केंद्रों की स्थापना भारत सरकार की वन धन विकास योजना के अंतर्गत की गई है। इन केंद्रों में जंगलों से एकत्र मूल्यवान सामग्री को स्टोर किया जाता है व उनको प्रस्संकृत करके सुरक्षित रखा जाता है। जंगल आधारित उत्पादों से आदिवासी समूहों को काम उपलब्ध कराया जाता है, ताकि वे वर्षभर व्यस्त रहें।

गौरतलब है कि जंगल देश के पांच करोड़ से अधिक जनजातीय लोगों की आजीविका का प्रमुख साधन हैं और जिन जिलों मे आदिवासी बसते हैं, उन जिलों में जंगल मौजूद होते हैं। वन धन विकास केंद्रों में आदिवासी अपनी आजीविका संबधित कार्यों व अन्य कार्यों के लिए भी आते हैं, लिहाजा जनजातीय मंत्रालय ने इन केंद्रों को विशेष तौर पर चिह्िनत करके इस मुहिम को शुरू किया है। इसकी शुरुआत छत्तीसगढ़ के बस्तर व मध्यप्रदेश के मंडला आदिवासी जिलों से की गई है। मंडला जिले में आदिवासी आबादी कुल आबादी का 58 फीसदी है तो बस्तर में यह आंकड़ा 30 फीसदी है। सरकार को उम्मीद है कि इस मुहिम को सफल बनाने में आदिवासी महिलाओं की भूमिका अहम होगी। वजह-इन केंद्रों में स्वयं सहायता समूह की भूमिका महत्वपूर्ण होती है। अधिकतर महिलाएं ही ऐसे समूह से जुड़ी होती हैं, वे ही वन साम्रगी को चुनने व भंडारण और अन्य जरूरी कार्यों को अंजाम देती हैं, तो ऐसे में स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं के साथ-साथ इन महिलाओं को भी आदिवासी लोगों के मन से अफवाहों, गलत जानकारियों व टीके को लेकर बैठे डर आदि को दूर करने का जिम्मा देने से मुहिम सफल हो सकती है।

प्रसंगवश यहां जिक्र करना जरूरी है कि आदिवासी समुदायों में कोविड-19 टीका लगवाने में महिलाओं ने पुरुषों को पीछे छोड़ दिया है, जबकि सामान्य आबादी में टीकाकरण का रुझान बताता है कि यहां पुरुषों की संख्या महिलाओं से अधिक है। इसके मद्देनजर कई संगठनों का यह भी कहना है कि जहां जरूरी हो वहां महिलाओं के लिए अलग से कोविड-19 टीकाकरण केंद्र खोले जाएं। कोरोना संक्रमण की तीसरी लहर की आशंका के मद्देनजर जनजातीय कार्य मंत्रालय ने सजगता का परिचय देते हुए जो पहल शुरू की है, उसे सफल बनाने के लिए यानी लक्षित समूह उससे लाभान्वित हों, इसके लिए बराबर निगरानी की जरूरत होगी।

(ये लेखक के अपने विचार हैं।)

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