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प्रमोद भार्गव का लेख : राेजगार बढ़ाएंगे खिलौने

मन की बात की 68वीं कड़ी में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा है कि वैश्विक खिलौना उद्योग सात लाख करोड़ रुपये से भी ज्यादा का है, लेकिन इसमें भारत की हिस्सेदारी न्यूनतम है। यदि खिलौनों के निर्माण में हमारे युवा लग जाएं तो ग्रामीण व कस्बाई स्तर पर हम ज्ञान-परंपरा से विकसित हुए खिलौनों के व्यवसाय को पुनजीर्वित कर सकते हैं। ये खिलौने हमारे लोक-जीवन, संस्कृति-पर्व और रीति-रिवाजों से जुड़े होंगे

प्रमोद भार्गव का लेख :  राेजगार बढ़ाएंगे खिलौने
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पीएम मोदी, फ़ोटो फ़ाइल

प्रमोद भार्गव

खिलौना शब्द स्मरण में आते ही, अनेक प्रकार के खिलौने स्मृति में स्वरूप ग्रहण करने लगते हैं। खिलौनों को बच्चों के खेलने की वस्तु भले ही माना जाता हो, लेकिन ये आकर्षित सभी आयु वर्ग के लोगों को करते हैं। बच्चों के श्ौशव से किशोर होने तक खिलौने उनकी परवरिश के साथ, उनमें रचनात्मक विकास में भी सहायक हैं। खिलौनों का भारत के परिप्रेक्ष्य में कमजोर पहलू यह है कि हम खिलौनों का बड़ी मात्रा में आयात चीन से करते हैं। अब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने खिलौनों के क्षेत्र में देश को आत्मनिर्भर बनने का आह्वान किया है। इस दिशा में यदि हम आगे बढ़ते हैं तो करोड़ों लोगों का रोजगार तो मिलेगा ही बड़ी मात्रा में विदेशी मुद्रा बचेगी।

भारत में खिलौना निर्माण का इतिहास अत्यंत प्राचीन है। मोहन-जोदड़ो और हड़प्पा के उत्खनन में अनेक प्रकार के खिलौने मिले हैं। रामायण, महाभारत और उपनिषदों में भी खिलौनों के प्रसंग हैं। भगवान कृष्ण की बाल लीलाएं तो इतनी अनूठी हैं कि ये बाल मनोविज्ञान का पूरा शास्त्र हैं। खिलौनों की अत्यंत प्राचीन समय से उपलब्धता इस तथ्य का प्रतीक है कि भारत में खिलौना निर्माण लाखों लोगों की आजीविका का प्रमुख साधन था और कागज, धातु व लकड़ी से स्थानीय व घरेलू संसाधनों से बनाए जाते थे। जब रबर और प्लास्टिक का आविष्कार हो गया तो इनके खिलौने भी बनने लगे। आॅटो-इंजीनियरिंग अस्तित्व में आई तो चाबी और बैटरी से चलने वाले खिलौने बनने लग गए। नौवें दशक में जब कंप्यूटर व डिजीटल क्रांति हुई तो खिलौनों का रूप परिवर्तन हो गया।

मन की बात की 68वीं कड़ी में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा है कि वैश्विक खिलौना उद्योग सात लाख करोड़ रुपये से भी ज्यादा का है, लेकिन इसमें भारत की हिस्सेदारी न्यूनतम है। यदि खिलौनों के निर्माण में हमारे युवा लग जाएं तो ग्रामीण व कस्बाई स्तर पर हम ज्ञान-परंपरा से विकसित हुए खिलौनों के व्यवसाय को पुनजीर्वित कर सकते हैं। ये खिलौने हमारे लोक-जीवन, संस्कृति-पर्व और रीति-रिवाजों से जुड़े होंगे। इससे हमारे बच्चे खेल-खेल में भारतीय लोक में उपलब्ध ज्ञान और संस्कृति के महत्व से परिचित होंगे। दूसरी तरफ रबर, प्लास्टिक व डिजीटल तकनीक से जुड़े खिलौनों का निर्माण स्टार्टअप के माध्यम से इंजीनियर व प्रबंधन से जुड़े युवा कर सकते हैं। ऐसा होता है, तो हम एक साथ तीन चुनौतियों का सामना कर सकेंगे। एक चीन के वर्चस्व को चुनौती देते हुए, उससे खिलौनों का आयात कम करते चले जाएंगे। दो खिलौने निर्माण में कुशल-अकुशल व शिक्षित-अशिक्षित दोनों ही वर्गों से उद्यमी आगे आएंगे, इससे ग्रामीण और शहरी दोनों ही स्तर पर आत्मनिर्भरता बढ़ेगी। यदि हम उत्तम किस्म के डिजीटल-गेम्स बनाने में सफल होते हैं तो इस क्षेत्र में निर्यात के द्वार खुलेंगे और खिलौनों के वैश्विक व्यापार में हमारी भागीदारी सुनिश्चित होगी।

इस व्यापार में अनंत संभावनाएं हैं। दरअसल भारत में संगठित खिलौना बाजार शुरूआती चरण में है। लेकिन इसमें बहुत तेजी से विकास हो रहा है। इसमें प्रतिवर्ष 10 से 12 प्रतिशत वृद्धि दर्ज की जा रही है। फन स्कूल इंडिया कंपनी की इस बाजार में प्रमुख भागीदारी है। यह कंपनी विदेशी खिलौनों का वितरण भी भारत में करती है। इनमें हेसब्रो, लोगो, डिज्नी, वार्नर ब्रदर्स, टाकरा-टोमी और रेवेंसबर्ग ब्रांडस शामिल हैं। फिलहाल भारत में संगठित खिलौना बाजार खुदरा मूल्यों के आधार पर करीब तीन हजार करोड़ रुपये का है। अभी ये खिलौने चीन और ब्रिटेन से आयात किए जा रहे हैं। यदि हम इन खिलौने के निर्माण और वितरण में सफल हो जाते हैं तो भारत का खिलौना बाजार पांच सौ करोड़ का हो सकता है। खिलौना कारोबार की बढ़ती मांग को दृष्टिगत रखते हुए रिलायंस इंइस्ट्रीज की सहयोगी संस्था रिलायंस ब्राण्ड्स लिमिटेड ने ब्रिटेन के खिलौना ब्रांड हैमलेज ग्लोबल होल्डिंग्स लिमिटेड का करीब 620 करोड़ रुपये में अधिग्रहण किया है।

खिलौनों का एक खतरनाक पहलू भी है। भारतीय गुणवत्ता परिषद की एक रिपोर्ट के अनुसार भारत में आयात होने वाले 66.90 प्रतिशत खिलौने बच्चों के लिए खतरनाक हैं। एक अध्ययन में क्यूसीआई ने पाया कि अनेक खिलौनों में मौजूद मैकेनिकल और केमिकल जाचों में गुणवत्ता की कसौटी पर खरे नहीं उतरे। सुरक्षा मानकों पर खरे नहीं उतरने के बाद भारत ने चीनी खिलौना कंपनियों के निर्यात पर पाबंदी लगा दी थी। भारत में तीन हजार करोड़ के खिलौना व्यापार में चीनी की भागीदारी लगभग 50 प्रतिशत है। वैसे भी गलवान घाटी में भारत के बीस सैनिको के शहीद होने के बाद चीनी सामान का बाहिष्कार चरम पर हैं। इधर प्रधानमंत्री ने घरेलू खिलौना उद्योग को बढ़ावा देने का आह्वान करके चीन को बड़ा झटका दिया है। लेकिन सरकार वाकई चीनी उद्योग और उद्योगपतियों को पछाड़ना चाहती है तो नीतियों को उदार बनाने के साथ प्रशासन की जो बाधाएं पैदा करने की मानसिकता है, उस पर भी अंकुश लगाना होगा। तभी उद्यामिता विकसित होगी। दरअसल प्रोत्साहन और आत्मविश्वास ही आत्मनिर्भरता के द्वार खोलने की कुंजी है।

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