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टोक्यो ओलंपिक : सोना-चांदी नहीं, हमारे हाथ में तो हीरे आ गए

खेल प्रेमी का मतलब ही क्रिकेट प्रेमी हो गया हो। वहां पहली बार ऐसा देखने में आया कि हॉकी मैच के दौरान देशवासी टीवी से चिपके रहे। गलियों, बाजारों में हॉकी खिलाड़ियों के चर्चे हैं। ऐसा पहली बार नहीं है कि देश में हॉकी के चर्चे हर जुबान पर हों।

टोक्यो ओलंपिक : सोना-चांदी नहीं, हमारे हाथ में तो हीरे आ गए
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संपादकीय लेख

Haribhoomi Editorial : टोक्यो ओलंपिक में हॉकी भारतीय पुरुष एवं महिला टीम ने कमाल किया है। ऐसा प्रतीत हो रहा है मानो देश में हॉकी का स्वर्णिम मेजर ध्यानचंद युग लौट आया हो। हालांकि दोनों टीमें हार चुकी हैं, हम हार की बात नहीं करेंगे, क्योंकि यह हार नहीं है। क्या हुआ अगर सोना या चांदी हाथ में नहीं है। हमारे हाथ तो हीरे आए हैं। ऐसे हीरे जो ओलंपिक में खूब चमके हैं। जिनकी चमक ने केवल भारत ही नहीं पुरी दुनिया को चकाचौंध कर दिया। महिला टीम सेमीफाइनल में अर्जेंटीना से 2-1 से हार गई, पर ब्रॉन्ज का मौका उनके पास अभी भी है। अर्जेंटीना की तेजतर्रार टीम के मुकाबले जिन्हें कहीं भी मुकाबले में नहीं माना जा रहा था, उन लड़कियों ने क्या गजब खेल दिखाया। आखिरी 10 सेकंड तक विपक्षी टीम की धड़कनें बढ़ाए रखीं। इस टीम ने हारकर भी दुनिया का दिल जीत लिया। पहले पांच मिनट में तो भारतीय हॉकी ने अर्जेंटीना को हैरान कर दिया। टीम के इसी प्रदर्शन को देखते हुए मैच खत्म होते ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने महिला हॉकी टीम की कप्तान रानी रामपाल और कोच सोजर्ड मारिजने से टेलीफोन पर बातचीत की। उन्होंने महिला हॉकी टीम के प्रदर्शन पर गर्व जताया।

पीएम ने उनसे कहा कि महिला टीम एथलीटों का एक कुशल समूह है जिन्होंने बहुत मेहनत की है और उन्हें आगे देखना चाहिए। पीएम ने यह भी कहा कि जीत और हार जीवन का हिस्सा हैं और उन्हें निराश नहीं होना चाहिए। ऐसा ही कमाल पुरुष हॉकी टीम ने दिखाया। जिस टीम को कोई गंभीरता से लेता दिखाई नहीं दे रहा था, उसके खिलाड़ियों ने पूरी दुनिया को अचरज में डाल दिया। पुरुष हॉकी दल 49 वर्ष बाद ओलंपिक में सेमीफाइनल में पहुंचा। वर्ष 1980 में भारतीय महिला हॉकी दल ने पहली बार ओलंपिक में हिस्सा लिया था। तब हालांकि सेमीफाइनल प्रारूप नहीं था। समूह के मुकाबलों में सबसे ज्यादा अंक अर्जित करनी वाले दो दल सीधे अंतिम मुकाबला खेले थे। तब भारत का महिला हॉकी दल छह दलों के अपने समूह में चौथे स्थान पर रहा। वहीं, 2016 रियो ओलंपिक में यह दल 12वें स्थान पर रहा। हॉकी में वर्षों से खराब प्रदर्शन के कारण देशवासियों को यह उम्मीद ही नहीं रहती थी कि उन्हें हॉकी में कोई पदक मिलेगा, जबकि वर्षों तक हॉकी में भारत का दबदबा रहा है। यह पहली बार है जब एक बार फिर देशवासियों की उम्मीदें बढ़ गई। अभी सफर खत्म नहीं हुआ है। अब कांस्य पदक के लिए महिला टीम का मुकाबला इंग्लैंड और पुरुष टीम का आज जर्मनी से होगा। इन दोनों मैचों का परिणाम क्या होगा, यह बात बाद का विषय हो गया है। अभी तो पूरा देश हॉकी खिलाड़ियों की मेहनत, जज्बे और हौसले को सलाम कर रहा है। जिस भारत देश के लिए कहा जाता हो कि इसकी रगों में क्रिकेट बसता है।

खेल प्रेमी का मतलब ही क्रिकेट प्रेमी हो गया हो। वहां पहली बार ऐसा देखने में आया कि हॉकी मैच के दौरान देशवासी टीवी से चिपके रहे। गलियों, बाजारों में हॉकी खिलाड़ियों के चर्चे हैं। ऐसा पहली बार नहीं है कि देश में हॉकी के चर्चे हर जुबान पर हों। एक जमाने में एशिया की परंपरागत हाॅकी का दुनिया में डंका बजता था। भारतीय हॉकी टीम ने ओलंपिक खेलों में 1928 से 1956 के बीच छह बार लगातार स्वर्ण पदक जीता। इसे भारतीय हॉकी का स्वर्णिम युग कहा जाता है। बाद में एशियाई शैली की कलात्मक और कौशलपूर्ण हाॅकी का सूरज डूबने लगा और एस्ट्रो टर्फ पर ताकत के दम पर खेली जाने वाली तेज तर्रार हाॅकी ने उसकी जगह ले ली। भारत की टीम ने 29 जुलाई 1980 को माॅस्को ओलंपिक खेलों में आखिरी बार हॉकी का स्वर्ण पदक जीता था। उसके बाद हॉकी धीरे-धीरे रसातल में जाती रही। सरकारों और नीति नियंतओं ने भी इस ओर ध्यान नहीं दिया। अब एक बार फिर हॉकी ने अपनी चमक दिखाई है। हमें ध्यान रखना होगा कि यह चमक न केवल बरकरार रहे, बल्कि पूरी दुनिया में अपनी रोशनी बिखेरे। इसके लिए देश के खेल प्रेमियों को भी आगे आकर एक बार फिर हॉकी को अपनाना होगा। अगर यह खेल फिर से गली-कूचों तक पहुंचेगा तभी नई प्रतिभाएं निखरकर सामने आएंगी और पूरी दुनिया में हमारा परचम लहराएगा।

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