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निरंकार सिंह का लेख : गांधी से कम नहीं तिलक

तिलक और गांधी की तुलना रोचक है। लोकमान्य तिलक और महात्मा गांधी दोनों ही अपने युग की सर्वश्रेष्ठ राष्ट्रवादी विभूतियां थीं। दोनों ही नेताओं के व्यक्तित्व स्वतंत्रता संग्राम के जीवंत प्रतीक थे। जिस तरह प्रथम महायुद्ध के पश्चात्ा भारत के राजनीतिक रंगमंच पर गांधी जी का एकछत्र आधिपत्य रहा, उसी प्रकार महायुद्ध से पहले लोकमान्य तिलक भारतीय जनमानस के सम्राट थे। राजनीति में तिलक जन्मजात योद्धा थे।

निरंकार सिंह का लेख : गांधी से कम नहीं तिलक
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निरंकार सिंह

राजनीतिक नेतृत्व और स्वतंत्रता संग्राम को लेकर तिलक और महात्मा गांधी की तुलना रोचक है। लोकमान्य तिलक और महात्मा गांधी दोनों ही अपने युग की सर्वश्रेष्ठ राष्ट्रवादी विभूतियां थीं। दोनों ही नेताओं के व्यक्तित्व स्वतंत्रता संग्राम के जीवंत प्रतीक थे। जिस तरह प्रथम महायुद्ध के पश्चात्ा भारत के राजनीतिक रंगमंच पर गांधी जी का एकछत्र आधिपत्य रहा, उसी प्रकार महायुद्ध से पहले लोकमान्य तिलक भारतीय जनमानस के सम्राट थे। राजनीति में तिलक जन्मजात योद्धा थे। उनके आदर्श थे श्रीकृष्ण, कौटिल्य, शिवाजी और पेशवा। उनकी जैसे को तैसा नीति में आस्था थी। भारत में ब्रिटिश शासन के नकारात्मक पक्ष को उन्होंने अच्छी तरह समझा था। उनका अंग्रेजों की न्याय परायणता में बिल्कुल विश्वास नहीं था। वे कहा करते थे कि हमें स्वराज्य अंग्रेजों से दान के रूप में नहीं मिल सकता। तिलक राजनीति में साध्य और साधन के अभेद को स्वीकार नहीं करते थे। उनका मत था कि यदि हमारे साध्य श्रेष्ठ हैं तो हम उन्हें पाने के लिए जिस तरह के साधनों का चाहे प्रयोग कर सकते हैं। तिलक के क्रांतिकारियों से संबंध अवश्य थे, लेकिन वे भारत में सशस्त्र क्रांति की संभावना से इनकार करते थे। उनकी सांविधानिक साधनों में आस्था थी।

तिलक आजीवन संघर्ष में डटे रहे। उन्होंने भारत की सोई हुई जनता को तंद्रा से जगा दिया और गांधीजी को स्वराज्य की बुनियाद तैयार करके दे दी। गांधी जी ने तिलक द्वारा तैयार की हुई बुनियाद पर ही स्वतंत्रता की इमारत खड़ी की। उन्होंने अपनी सारी प्रतिभा, ऊर्जा और धन सम्पत्ति स्वतंत्रता की वेदी पर निछावर कर दी। तिलक भारतीय तथा पाश्चात्य तत्वज्ञान के प्रकांड पंडित थे। हिन्दू धर्म के नवनीत गीता के संबंध में उनकी व्याख्या गीता रहस्य उनकी विद्वता का स्थायी स्मारक है। उनका जन्म 23 जुलाई 1856 को महाराष्ट्र के रत्नगिरि में हुआ था। उन्होंने 1876 में प्रथम श्रेणी में बीए फिर उसके बाद 1879 में एलएलबी की। 1881 में तिलक और उनके सहयोगियों ने एक प्रेस खरीदा और फिर वहां से मराठी में केसरी तथा अंग्रेजी में मराठा साप्ताहिक का प्रकाशन करने लगे। 24 अक्टूबर 1884 को उन्होंने डेकन एजुकेशन सोसाइटी नामक संस्था की स्थापना की। बाद में वे कांग्रेस में शामिल हो गए।

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के नरम दल के लिए तिलक के विचार जरा ज्यादा ही उग्र थे। नरम दल के लोग छोटे सुधारों के लिए सरकार के पास वफादार प्रतिनिधिमंडल भेजने में विश्वास रखते थे। तिलक का लक्ष्य स्वराज था, छोटे-मोटे सुधार नहीं और उन्होंने कांग्रेस को अपने उग्र विचारों को स्वीकार करने के लिए राजी करने का प्रयास किया। इस मामले पर सन 1907 ई. में कांग्रेस के सूरत अधिवेशनश में नरम दल के साथ उनका संघर्ष भी हुआ। राष्ट्रवादी शक्तियों में फूट का लाभ उठाकर सरकार ने तिलक पर राजद्रोह और आतंकवाद फैलाने का आरोप लगाकर उन्हें छह वर्ष के कारावास की सजा दे दी और मांडले, बर्मा, वर्तमान म्यांमार में निर्वासित कर दिया। मांडले जेल में तिलक ने अपनी महान कृति भगवत गीता रहस्य लेखन शुरू किया। तिलक ने इस रूढि़वादी सार को खारिज कर दिया कि यह पुस्तक संन्यास की शिक्षा देती है।

लोकमान्य तिलक ने गीता को कर्मयोग विषयक टीका की और पराधीन भारत को कर्म का संदेश दिया। तिलक का दर्शन बहुत कुछ गीता का दर्शन है। तिलक ने सामाजिक जीवन में उत्सवों, मेलों और त्योहारों का महत्व स्वीकार किया है। उनके अनुसार पुराने जमाने की यात्राएं, मेले आदि धार्मिक, सामाजिक तथा सांस्कृतिक जीवन के सूचक थे। उनका कहना था कि इन छोटे-बड़े मेलों और उत्सवों की अगर प्रतिष्ठित लोगों का सहारा मिल जाए तो उनसे देश का काफी लाभ हो सकता है। यह काम खर्चीला भी नहीं है। तिलक का सुझाव था कि इन बड़े-बड़े मेलों को विराट सभाओं का रूप दिया जा सकता है। इन मेलों में लोगों को यह बताया जा सकता है कि देश की वर्तमान दशा कैसी है और उसे कैसे उन्मत किया जा सकता है। तिलक ने ने ही शिवाजी उत्सव तथा गणेश उत्सव आरम्भ किए थे।

भारतीय स्वाधीनता आंदोलन के कालखंड की दृष्टि से तीन सबसे बड़ी विभूतियां हैं, तिलक, गांधी जी और सुभाष चन्द्र बोस। इन तीनों की अपनी–अपनी कार्य पद्धति थी, अलग–अलग व्यक्तत्वि था और नेतृत्व के अपने अलग प्रतिमान थे। बीसवीं सदी के प्रारम्भिक बीस वर्षों की राजनीति तिलक का युग है। वे भारतीय राजनीति के पहले लोकदेव थे। तिलक ने अपने देशवासियों के मन में ब्रिटिश शासन के प्रति विरोध का भाव ही पैदा नहीं किया, उन्होंने इस विरोध को वाणी दी और उसे रचनात्मक दिया दी। उन्होंने लोगों को अनुशासन, एकता और संयम का पाठ पढ़ाया। तिलक चालीस वर्षो तक भारतीय राजनीति पर छाए रहे।

सार्वजनिक जीवन के पहले बीस वर्षो तक तिलक की गतिविधियां अधिकतर महाराष्ट्र तक सीमित रही। लेकिन भारतीय राजनीति में उग्रवाद के विकास के साथ–साथ उन्हें अखिल भारतीय ख्याति मिलती गई। बंगाल विभाजन विरोधी आंदोलन ने तिलक को अखिल भारतीय नेता के रूप में प्रतिष्ठा दी। 1908 मेें उनके मुकदमें और फिर 6 वर्ष के मांडले कारावास ने उन्हें जीवित शहीद की गरिमा से मंडित किया। 1907 को सूरत कांग्रेस के बाद वे कांग्रेस से निकल गए थे, लेकिन 1914 में जेल से वापस आने पर तिलक फिर कांग्रेस में शामिल हुए और देश के सबसे प्रभावशाली नेता समझे जाने लगे। ब्रिटिश सरकार की भेदक दृष्टि सदा ही उनके ऊपर बनी रही और उसने उन्हें परेशान करने का कोई अवसर हाथ से नहीं जाने दिया। भारतीय राजनीति को तिलक की सबसे बड़ी देन थी, भूखे, नंगे, अशिक्षित, कमजोर, शोषित, जनसाधारण को आजादी की लड़ाई के लिए तैयार करना। अपने राजनीतिक कार्यों के लिए तिलक ने जितने कष्ट सहे, कम लोगों ने सहे थे।

स्वतंत्रता आंदोलन और अपने निर्भीक विचारों के लिए उन्हें कई बार जेल जाना पड़ा। तिलक का निधन एक अगस्त 1920 को लगभग 64 वर्ष की आयु में हुआ। गांधी जी ने उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए कहा कि लोकमान्य तिलक तो एक ही था। लोगों ने उन्हें जो पदवी दी, जो सम्मान दिया वह राजाओं के खिताबों से लाख गुना कीमती था। दरअसल तिलक राष्ट्रीय स्वाधीनता संग्राम के उन कुछ नेताओं में से थे जिन्होंने सक्रिय राजनीति में भाग लेने के साथ–साथ उसे वैचारिक दृष्टि से भी समृद्ध बनाया। सक्रिय राजनीति के प्रति उनकी देन को सभी ने सराहा है। संत निहाल सिंह का कहना है , यदि तिलक न होते तो भारत अब भी पेट के बल सरक रहा होता, उसका सिर धूल में दबा होता और उसके हाथ में दर्खास्त होती। तिलक ने भारत की पीठ को बलिष्ठ बनाया। मुझे विश्वास है कि देश अब सीधा होकर चलने लगेगा और तब देश उस व्यक्ति को आशीर्वाद देगा, जिसने धूल में से उठा कर उसे खड़ा कर दिया।

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