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भारत की छवि खराब करने की साजिश रच रहा है थॉमसन रॉयटर्स फांउडेशन

थॉमसन रॉयटर्स फांउडेशन के उस ताज़ा सर्वे को राष्ट्रीय महिला आयोग ने खारिज कर दिया है, जिसमें भारत को महिलाओं के लिए सबसे खतरनाक देश बताया गया है राष्ट्रीय महिला आयोग के अनुसार भारत जैसे 1.3 अरब की जनसंख्या वाले देश के बारे में सर्वे को सही नहीं ठहराया जा सकता।

भारत की छवि खराब करने की साजिश रच रहा है थॉमसन रॉयटर्स फांउडेशन

थॉमसन रॉयटर्स फांउडेशन के उस ताज़ा सर्वे को राष्ट्रीय महिला आयोग ने खारिज कर दिया है, जिसमें भारत को महिलाओं के लिए सबसे खतरनाक देश बताया गया है राष्ट्रीय महिला आयोग के अनुसार भारत जैसे 1.3 अरब की जनसंख्या वाले देश के बारे में सर्वे को सही नहीं ठहराया जा सकता।

आयोग के मुताबिक भारत में महिलाएं अपने अधिकारों के प्रति जागरुक हैं और उनकी कानून तक पहुंच है। इस सर्वे में भारत से अच्छी रैंकिंग उन देशों को दी गई है जहां महिलाओं को सार्वजनिक स्थलों पर बोलने तक नहीं दिया जाता। महिला और बाल कल्याण मंत्रालय के मुताबिक भी ये रिपोर्ट केवल 548 जानकारों की राय और समझ को आधार बना कर लिखी गई है।

ये भारत की छवि खराब करने की कोशिश है। थॉमसन रॉयटर्स फांउडेशन के सर्वे के मुताबिक महिलाओं के प्रति यौन हिंसा और जबरन वेश्यावृति में धकेलने के मामले में भारत को सबसे खतरनाक देश बताया गया है। भारत को महिलाओं के लिए युद्धग्रस्त सीरिया और अफगानिस्तान से भी ज्यादा खतरनाक बताया गया है।

इस सूची में अफगानिस्तान, सीरिया और अमेरिका को दूसरे, तीसरे और चौथे स्थान पर रखा गया है। सर्वे में पश्चिम देशों में से केवल अमेरिका का ही नाम शामिल है। यह सच कि भारत में हालिया बरसों में यौन शोषण के मामले बढ़े हैं। महानगरों से लेकर गांवों, कस्बों तक में असुरक्षा के माहौल की घटनाएं सामने आई हैं।

लेकिन यह भी सच है कि अब महिलाएं यौन शोषण या हिंसा के खिलाफ़ खुलकर बोलने लगी हैं। मामलों को रिपोर्ट न करने और महिलाओं को ही दोषी ठहराने की सोच में भी बदलाव है। गौर करने वाली बात है कि पहले ऐसे केस सामने नहीं आ पाते थे क्योंकि अधिकतर मामलों में महिलाएं चुप्पी साध लेती थी।

परिवार और समाज का माहौल इतना सहयोगी नहीं था जितना आज है। इसकी सबसे बड़ी वजह हमारा सामाजिक ढांचा है। जिसमें पीड़िता के प्रति परिवार और समाज का माहौल इतना सहयोगी नहीं था जितना आज है। ऐसे में इस अध्ययन का सवालों के घेरे में आना लाजिमी है। तमाम समस्याओं के बावजूद भारत की गणतांत्रिक व्यवस्था में हर नागरिक समान है।

महिलाओं और पुरुषों के संवैधानिक अधिकारों में कोई फर्क नहीं है। गौरतलब है कि इससे पहले 2011 में हुए सर्वे में अफगानिस्तान, डैमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ कॉन्गो, पाकिस्तान, भारत और सोमालिया महिलाओं के लिए सबसे असुरक्षित देश बताए गए थे। 2011 में हुए सर्वे में भारत को भारत को चौथे स्थान में रखा गया था,

लेकिनए इस साल सारे देशों को पीछे छोड़ भारत को महिलाओं की असुरक्षा की दृष्टि से पहला स्थान दिया गया है। यह एक कटु सच है कि घर, दफ्तर, सड़क या कोई भी सार्वजनिक स्थान, यौन दुर्व्यवहार और प्रताड़ना की समस्या दुनियाभर की महिलाओं के लिए दंश बनी हुई है। भारत सरकार के मुताबिक़ महिलाओं के प्रति अत्याचार में 2007 से 2016 के बीच 83 प्रतिशत वृद्धि की बात कही गई है।

यकीनन यह चिंतनीय आंकड़ा भी है। दुष्कर्म और शोषण की बढ़ती घटनाओं के बाद भी उन पर लगाम न लग पाने की स्थिति तो और भी भयावह कही जा सकती है, लेकिन इसी सर्वे में कहा गया है कि सऊदी अरब में महिलाओं के संरक्षण का पूरा अधिकार पुरुषों के हाथ सौंप दिया जाता है। जिसे विशेषज्ञों ने मौलिक अधिकारों के खिलाफ बताया है।

ऐसे में यह समझना कठिन नहीं कि इन देशों में महिलायें अपने खिलाफ होने वाले शोषण को लेकर आवाज़ उठाने की स्थिति में ही नहीं हैं। इतना ही नहीं जहां भारतीय महिलायें हर क्षेत्र में अपनी प्रभावी उपस्थिति दर्ज करवा रही हैं। वहीं सऊदी अरब जैसे देशों में हाल के कुछ दिनों पहले तक महिलाओं के ड्राइविंग करने पर प्रतिबंध था।

भारत के इस लिस्ट में पहले नंबर पर होने पर सूची के अन्य देशों की ऐसी बातों को नज़रंदाज करना वाकई हैरान करने वाला है। गौरतलब है कि विशेषज्ञों से पूछे गए सवालों में यह प्रश्न भी शामिल था कि कहां महिलाओं के लिए आर्थिक हालात सबसे ख़राब हैं। गौर करें तो बीते कुछ बरसों में भारत में उच्च शिक्षा हासिल कर रही बेटियों से लेकर कामकाजी महिलाओं तक की संख्या बढ़ी है।

महिलाएं आत्मनिर्भर हो रही हैं। सामाजिक-पारिवारिक स्तर पर बेटे और बेटी के बीच रहे भेदभाव को पाटने की सोच देखी जा रही है। ऐसे में यह कहना गलत नहीं होगा कि असुरक्षित देशों की सूची में अव्वल रहने का तमगा देने से पहले भारत के बदलते परिवेश को ध्यान में रखना भी जरूरी था। महिलाओं की अस्मिता को ठेस पहुंचाने वाली मानसिकता दुनिया के हर कोने में मौजूद है।

यही वजह है बीते दिनों सूर्खियों में आए सोशल मीडिया के मी टू अभियान के जरिये भी यही सामने आया कि दुनिया की हर महिला कभी न कभी उत्पीड़न की शिकार रही है। यह हैशटैग एक समय में 85 देशों में ट्रेंड कर रहा था। जो यह बताने को काफी है कि दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में महिलाएं शोषण का दंश झेलती हैं।

यह मानवीय गरिमा और सम्मान से जीने के उनके हक़ को छीनने वाली स्थितियां हैं। यह समय की दरकार है कि महिलाओं के समक्ष मौजूद खतरों से निपटने के ठोस व प्रभावी उपाय किये जाएं। भारत के संदर्भ में देखें तो यहां अभियुक्तों के सजा पाने की दर का बेहद कम होना बलात्कार के मामलों के बढ़ने की अहम्ा वजह है।

इतना ही नहीं कितने ही मामलों में अभियुक्त कुछ महीने जेल में रहने के बाद जमानत पर छूट जाते हैं। सबूत के अभाव में अपराधी बेदाग बच निकलते हैं। देश में ऐसे मामलों में सजा का औसत महज 19 फीसदी है। यही वजह है कि भारत में महिलाओं की सुरक्षा के मोर्चे पर बहुत कुछ किया जाना बाकि है।

बावजूद इसके वे प्रयास जो कुछ बदलाव लाये हैं उनकी अनदेखी करना भी सही नहीं है। इस सर्वे में भी देशों की तुलना और उनकी रैंकिंग के लिए बेहतर और अधिक विश्वसनीय तरीकों का इस्तेमाल किया जाना जरूरी था। इस अध्ययन में क़रीब सात सौ करोड़ की जनसंख्या वाली पूरी दुनिया से कुल 548 लोगों की राय ली गयी है।

ऐसे में जानना भी बेहद महत्वपूर्ण है कि इन विशेषज्ञों में भारत से कितने लोग थे। कितनी महिलायें शामिल थीं। सर्वे के लिए विशेषज्ञों का चुनाव कैसे किया गया। भारत को सबसे असुरक्षित देश बताने वाले सर्वे की विश्वसनीयता और बढ़ती अगर यह यहां की स्त्रियों के बीच करवाया जाता,

लेकिन यह रिपोर्ट सिर्फ विशेषज्ञों द्वारा दिए गए विचारों के आधार पर बनी है। अध्ययन के नतीजों में भारत पाकिस्तान, अफगानिस्तान और सीरिया से भी पहले है, पूर्वाग्रह तो साफ़ नज़र आता है।

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