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अवधेश कुमार का लेख : चीन से ऐसे निपटें हम

चीन के संदर्भ में समूची विदेश नीति में आमूल परिवर्तन किया जाए। चीन की सीमा 14 देशों से लगती है और अपनी विस्तारवादी महत्वाकांक्षा में इसने 23 देशों के साथ सीमा विवाद पैदा कर लिया है। जापान के साथ तो उसका समुद्री सीमा विवाद काफी तीखा हो चुका है। दक्षिणी चीन सागर पर दावों के कारण इंडोनेशिया, फिलीपींस, वियतनाम, मलेशिया, ताइवान और ब्रुनेई से उसका तनाव है। भारत आगे बढ़कर इन सारे देशों को साथ ले और चीन को घेरने के लिए आगे बढ़े।

अवधेश कुमार का लेख : चीन से ऐसे निपटें हम
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अवधेश कुमार

एक साथ किसी देश के जवान इतनी बड़ी संख्या में हताहत होंगे और वह भी बिना किसी उकसावे और लड़ाई के तो वहां प्रतिशोध की हुंकार उठेगी ही। मूल प्रश्न यही है कि चीन से निपटा कैसे जाए? यह प्रश्न नया नहीं है। 1949 में कम्युनिस्ट क्रांति के साथ ही चीन की माओवादी साम्राज्यवादी कम्युनिज्म ने पड़ोसी देशों के लिए समस्याएं पैदा करनी शुरु कर दी थी। 1962 के युद्ध के बाद से यह प्रश्न हम पर हथौड़ों की तरह प्रहार करता रहा है। तंग शिआओ पिंग ने राजीव गांधी के साथ जिस नीति की शुरुआत की, उसका मूल यही था कि सीमा विवाद को अगली पीढ़ी के लिए छोड़कर हमें आपसी सहयोग को आगे बढ़ाना चाहिए। उसके बाद से शांति, विश्वास स्थापना तथा सीमा व्यवहार के समझौते होते गए। किंतु चीन ने कभी भारतीय भूमि पर न अपना दावा छोड़ा, न सीमा विवाद को सुलझाने की कोशिश की और न भारत को कमजोर और दबाव में रखने की नीति बदली। पिछले कुछ वर्षों में भारत ने जिस तेजी से लद्दाख से लेकर अरुणाचल तक सड़कें, पुलें एवं सैन्य आधारभूत संरचना का विस्तार करना आरंभ किया, चीन की उदंडता बढ़ती गई है।

चीन के राष्ट्रपति शि जिनपिंग स्वयं को जीवन भर का शासक बनाने के बाद माओ से आगे निकल जाने की कल्पना में चीन को विश्व पर दबदबा रखने वाली सबसे बड़ी आर्थिक और सामरिक महाशक्ति बनाने की योजना पर आगे बढ़ रहे हैं। उन्होंने सबसे बुरी की स्थिति कल्पना करते हुए सेना से सीमा तथा आर्थिक हितों की रक्षा के लिए युद्ध की तैयारी की बात की है। चीन के विरुद्ध दूरगामी रणनीति बनाने और उस पर आगे बढ़ने के पहले शि के इस निजी और राजनीतिक लक्ष्यों को गहराई से समझना होगा। हमारा 43 हजार वर्ग किलोमीटर भूमि पर उसका कब्जा है। 14 नवंबर 1962 को समूची भूमि को वापस लेने का संसद का प्रस्ताव केवल कागजों पर तो नहीं रहना चाहिए। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी कहा है कि संप्रभुता की रक्षा के लिए भारत प्रतिबद्ध है, हम जबसे उनको रोकने-टोकने लगे हैं तब से परेशानियां बढ़ी हैं। उन्होंने सेना को वास्तविक नियंत्रण रेखा पर चीनी सैनिकों से अपने स्तर पर निपटने की खुली छूट दिए जाने की भी घोषणा कर दी। खुली छूट का अर्थ है चीनी सैनिकों से जैसे चाहें निपटें। इसमें हथियार लेकर न जाने की प्रतिबद्धता खत्म। यह बहुत बड़ा नीतिगत परिवर्तन है। थल सेना, वायुसेना और नौसेना को हाई अलर्ट पर रखा गया है। हम लद्दाख के आसमान पर वायुसेना के हेलिकॉप्टरों और लड़ाकू विमानों तक को उड़ान भरते देख सकते हैं।

इस तरह सैन्य स्तर पर युद्ध की अवस्था से पहले की स्थिति कायम कर दी गई है। इससे चीन को सीधा संदेश गया है। किंतु आक्रोश जितना हो मुकाबला करने के लिए शांति और संतुलन के साथ दूरगामी स्थायी नीति की आवश्यकता है। सैन्य लामबंदी तत्काल आवश्यक इसलिए है ताकि चीन को लगे कि भारत अब जैसे को तैसा सैन्य व्यवहार के लिए पूरी तरह तैयार हो चुका है। चीन द्वारा गलवान घाटी पर लगातार अपना दावा करने के बाद भारत ने साफ कर दिया है कि वहां की स्थिति स्पष्ट है और आपको पीछे जाना ही होगा। हालांकि चीन थोड़ा पीछे हट भी जाए तो समस्या का समाधान नहीं होगा। सैन्य मोर्चे के साथ हमें चीन संबंधी अपनी पूरी नीति को नए सिरे से निर्धारित करने की जरुरत है। चीन के साथ बेहतर संबंध बनाने की तमाम कोशिशों के बावजूद भारत उसके इरादे के खिलाफ जागरुक नहीं था ऐसा नहीं कहा जा सकता। किंतु दूरगामी नीति बनाकर मुखरता से काम नहीं किया गया।

जैसे हम जम्मू कश्मीर वाले पाकिस्तानी भाग को पाक अधिकृत कश्मीर कहते हैं उसी तरह अक्साई चिन को चीन अधिकृत लद्दाख कहना शुरु करें। इससे एक अलग भाव पैदा होता है तथा संदेश जाएगा कि भारत इसे वापस लेने की कार्रवाई आज न कल करेगा। चीन कभी हमारा पड़ोसी नहीं था। हमारा पड़ोसी तिब्बत था। 1951 में चीन ने उसे हड़प लिया। 1959 में तिब्बती धर्मगुरु तथा वहां के शासक दलाई लामा को भारत में शरण लेनी पड़ी। सवाल है कि हमने दलाई लामा और तिब्बतियों को शरण क्यों दी? भारत खुलकर तिब्बत की आजादी का समर्थन करे। अमेरिका, यूरोप और एशिया में भी जापान, दक्षिण कोरिया जैसे देश तिब्बत पर चीन की नीति के विरुद्ध हैं, दलाई लामा को देशों ने उच्चतम पुरस्कार दिए हैं, तिब्बत के पक्ष में संसदों में प्रस्ताव तक पारित हुए हैं। किंतु यह मसला भारत का है और इसे ही मुखर होना होगा। भारत चीन सीमा नाम की कोई चीज नहीं है, भारत तिब्बत सीमा है। तो इसका यही नामकरण कर दिया जाए। साथ ही चीन द्वारा हड़पे गए पूर्वी तुर्कीस्तान, दक्षिणी मंगोलिया की आजादी का समर्थन करे, हांगकांग और मकाउ के लोगों के संघर्ष में साथ होने का ऐलान किया जाए। यह सब चीन की दुखती नस है। इनके नागरिकों को हम अपने यहां आने के लिए वीजा का प्रावधान खत्म करें।

कहने का तात्पर्य यह कि चीन के संदर्भ में समूची विदेश नीति में आमूल परिवर्तन किया जाए एवं सघन कूटनीति हो। चीन की सीमा 14 देशों से लगती है और अपनी विस्तारवादी महत्वाकांक्षा में इसने 23 देशों के साथ सीमा विवाद पैदा कर लिया है। जापान के साथ तो उसका समुद्री सीमा विवाद काफी तीखा हो चुका है। दक्षिणी चीन सागर पर दावों के कारण इंडोनेशिया, चीन, फिलीपींस, वियतनाम, मलेशिया, ताइवान और ब्रुनेई से उसका तनाव है। भारत आगे बढ़कर इन सारे देशों को साथ ले एवं चीन को घेरने के लिए आगे बढ़ें।

इसके साथ आता है चीन को आर्थिक रुप से धक्का देने का प्रश्न। भारत से चीन को व्यापार में करीब 50 अरब डॉलर का लाभ पिछले वर्ष हुआ है। इस समय चीनी सामग्रियों के बहिष्कार का माहौल है। बेशक, औषधियों के लिए कच्चा माल से लेकर ऐसे अनेक सामान के लिए हम उस पर निर्भर हैं, इसलिए एकबारगी सब पर शुल्क बढ़ाना या आयात रोक देना राष्ट्रीय हित में नहीं होगा। अनेक सामग्रियां हैं जिनको रोका जा सकता है। जहां तक इलेक्ट्रोनिक सामग्रियों तथा नई संचार तकनीक का प्रश्न है हम स्वयं इसमें सक्षम होने की कोशिश करें। ताइवान, जापान, दक्षिण कोरिया जैसे इन मामलों में अग्रणी देशों का सहयोग लेकर 5 जी के हुुवाई कंपनी को रोक सकते हैं।

इस तरह कठोर, मुखर और दूरगामी रणनीतियों के साथ भारत आगे बढ़े तो चीन को समुचित जवाब मिलेगा एवं शी का दुनिया का सर्वोच्च महाशक्ति का शासक होने तथा सभी पड़ोसियों को दबदबे में रखने का सपना ध्वस्त हो सकेगा। पूरे देश को लंबे समय के लिए धैर्य के साथ एकजुट होकर तात्कालिक क्षति, परेशानियों को झेलते हुए विजय और लक्ष्य प्राप्ति के संकल्प के साथ आगे बढ़ना होगा। क्या हम इसके लिए तैयार हैं?

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