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इस दीपावली अच्छा इंसान बनने का संकल्प लें

दीपावली संकल्प लेने का त्योहार होता है। अन्य पर्व-त्योहारों की तरह इसके भी सामाजिक, आर्थिक और धार्मिक पहलू होते हैं जो समाज को सामूहिकता, आपसी मेलजोल और खुशी बांटने के मौके प्रदान करते हैं।

इस दीपावली अच्छा इंसान बनने का संकल्प लें
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दीपावली संकल्प लेने का त्योहार होता है। अन्य पर्व-त्योहारों की तरह इसके भी सामाजिक, आर्थिक और धार्मिक पहलू होते हैं जो समाज को सामूहिकता, आपसी मेलजोल और खुशी बांटने के मौके प्रदान करते हैं। इसके साथ ही समाज को नए संदेश देते हैं और लोक कल्याण के रास्ते दिखाते हैं। तमसो मा ज्योतिर्गमय अर्थात प्रकाश की ओर जाइए। यह उपनिषदों का ज्ञान है। इसे भारत में हर साल मनाई जाने वाली दीपावली चरितार्थ करती है। यह याद दिलाती है कि सत्य की सदा जीत होती है झूठ का नाश होता है। इस पर्वकी महानता के कारण इसे अन्य धर्मों और विदेशों में भी मानाया जाता है। इसके शुरुआत के पीछे भी कई तरह की मान्यताएं हैं। माना जाता है कि इसी दिन अयोध्या के राजा रामचंद्र अपने चौदह वर्ष के वनवास के पश्चात लौटे थे। और लोग उनके आगमन पर घी के दिये जलाकर स्वागत किया था। परंतु क्या आज जो दीपावली हमारे सामने है, इसका जो स्वरूप हम देख रहे हैं, वह सच में इन पहलुओं को उजागर कर रही है और मनाए जाने के पीछे निहित उद्देश्यों पर खरी उतर रही है? ध्यान से देखें तो हमें निराशा ही मिलती है, यह त्योहार अपने मूल उद्देश्यों से भटकती प्रतीत हो रही है। आज इस पर आर्थिक पहलू ज्यादा हावी हो गए हैं। सामाजिक और धार्मिक सरोकार कहीं पीछे छूटने लगे हैं। जो उचित नहीं है। उदारवाद के दौर में आज बाजार की पकड़ से बच पाना कठिन होता जा रहा है। पर्व-त्यौहार भी इसकी चपेट में आ गए हैं। बाजार लोगों की खुशियों को खरीदने बेचने का काम करने लगा है। आज जब वास्तविक खुशी एक दुर्लभ वस्तु बनती जा रही है। वैसे में यह बाजार विभिन्न आकर्षक पौकिंग की बदौलत उपभोक्ता वस्तुओं को उत्सव और खुशियों का पर्याय बनाकर बेचने के मौके की तरह इस्तेमाल करने लगा है। एक ऐसा त्यौहार जो अंधकार पर प्रकाश की जीत का उत्सव है, वह सामूहिकता, भाईचारे, सच्चाई, साझेदारी और संतोष जैसे गुणों क बदले व्यक्तिगत उपभोग, लालच और तड़क-भड़क का वाहक बनता प्रतीत हो रहा है। बाजार ने त्योहार को महंगे उपभोक्ता सामानों की खरीद और महंगे उपहारों के लेन-देन तक में सीमित करने का काम करने लगा है। ऐसे में भावनाएं कहीं पीछे छूट जाती हैं। और गैर-जरूरी उपभोग, फिजूलखर्ची और दिखावा हावी हो जाता है। आज जिस तरह से आतिशबाजी का चलन बढ़ा है उसके फायदे कम नुकसान ज्यादा हो रहे हैं। त्योहारों को जितनी सादगी से मनाया जाए उनका आनंद उतना ही बढ़ता है। आज समाज में जिस तरह की बुराइयां जैसे- झूठ, दिखावा, अत्याचार, भ्रष्टाचार और हिंसा आदि बढ़ रही हैं, वैसे कभी-कभी लगता हैकि देश-समाज ने दीपावली के संदेशों को अमल में नहीं लाया है। दीपावली को समाज ने केवल रस्म अदायगी तक सीमित कर दिया है। जबकि यह तो इन संदेशों का संकल्प लेने का दिन होता है। इस दिन क्या हम ऐसी दीपावली मनाने का संकल्प लेंगे कि आसमान छूती महंगाई, घटती आय, दिन पर दिन बढ़ती बेरोजगारी और सामाजिक असुरक्षा से कराह राहे समाज के हाशिए पर खड़े एक वर्ग की जिंदगी में रोशनी खिल जाए।

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