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Editorial : आरक्षण के मसले पर गंभीरता से हो चिंतन

सुप्रीम कोर्ट ने मराठा समुदाय को सरकारी नौकरियों और शैक्षणिक संस्थानों में मिले आरक्षण को असंवैधानिक करार दिया है। यह आरक्षण आर्थिक और सामाजिक पिछड़ेपन के आधार पर दिया गया था। कोर्ट ने कहा कि 50 फीसदी आरक्षण की सीमा तय करने वाले फैसले पर फिर से विचार की जरूरत नहीं है। मराठा आरक्षण 50 प्रतिशत सीमा का उल्लंघन करता है।

Editorial : आरक्षण के मसले पर गंभीरता से हो चिंतन
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संपादकीय लेख

Haribhoomi Editorial : जातिगत आरक्षण ऐसा मुद्दा है, जिससे वर्षभर देश का कोई न कोई राज्य जूझता रहता है। नौकरी और शिक्षा में आरक्षण को लेकर लगातार आंदोलन चलते हैं। कौन भूल सकता है गुजरात के पटेल आरक्षण आंदोलन, राजस्थान का गुर्जर, महाराष्ट्र के मराठा और हरियाणा के जाट आरक्षण को। अलग-अलग समय में इन आंदोलनों ने उग्र रूप धारण कर लिया। राज्य सरकारों ने जनभावना या फिर वोट बैंक के लिए इनकी मांग को स्वीकार भी किया, लेकिन आरक्षण पर सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले ने उनके कदम रोक दिए। 1999 में सुप्रीम कोर्ट के नौ जजों की बेंच ने फैसला दिया था कि किसी भी सूरत में आरक्षण का दायरा 50 फीसदी से ज्यादा नहीं हो सकता, लेकिन इसके बावजूद देश में अभी भी कई राज्यों हरियाणा 70, तमिलनाडु 69 और तेलंगाना में 62 फीसदी आरक्षण दिया जा रहा है।

दर्जनभर राज्य सरकारें आरक्षण का दायरा बढ़ाने के समर्थन में खड़ी हैं। ऐसे ही महाराष्ट्र में अलग-अलग समुदायों और आर्थिक रूप से कमजोर लोगों को दिए गए आरक्षण को मिलाकर करीब 75 फीसदी आरक्षण हो गया था। 2001 के राज्य आरक्षण अधिनियम के बाद महाराष्ट्र में कुल आरक्षण 52 फीसदी था। 12-13 फीसदी मराठा कोटा के साथ राज्य में कुल आरक्षण 64-65 प्रतिशत हो गया था। केंद्र की ओर से 2019 में घोषित आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के लिए 10 फीसदी कोटा भी राज्य में प्रभावी है, जिसके चलते आरक्षण का दायरा 75 प्रतिशत तक जा पहुंचा है। इस पर फैसला सुनाते हुए बुधवार को सुप्रीम कोर्ट ने मराठा समुदाय को सरकारी नौकरियों और शैक्षणिक संस्थानों में मिले आरक्षण को असंवैधानिक करार दिया है। यह आरक्षण आर्थिक और सामाजिक पिछड़ेपन के आधार पर दिया गया था। कोर्ट ने कहा कि 50 फीसदी आरक्षण की सीमा तय करने वाले फैसले पर फिर से विचार की जरूरत नहीं है। मराठा आरक्षण 50 प्रतिशत सीमा का उल्लंघन करता है।

उच्चतम न्यायालय के इस आदेश से एक बार फिर साफ हो गया कि राज्य सरकारों को आरक्षण के मुद्दे पर गंभीर चिंतन करना होगा। राज्यों को यह अधिकार नहीं कि वे किसी जाति को सामाजिक-आर्थिक पिछड़ा वर्ग में शामिल कर लें। राज्य सिर्फ ऐसी जातियों की पहचान कर केंद्र से सिफारिश कर सकते हैं। राष्ट्रपति उस जाति को राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग के निर्देशों के मुताबिक सामाजिक आर्थिक पिछड़ा वर्ग की लिस्ट में जोड़ सकते हैं। यह बात सही है कि जब देश में आरक्षण व्यवस्था लागू की गई थी तब के और आज के हालात में बहुत अंतर है। कुछ वर्ग और समुदाय ऐसे हैं जिन्हें आरक्षण की दरकार है, लेकिन इसका मतलब यह तो नहीं कि किसी अन्य के अधिकारों का हनन किया जाए।

सही बात तो यह है कि आरक्षण जरूरत है, अधिकार नहीं। शिक्षा और सरकारी नौकरियों में आरक्षण एक नीति के रूप में तभी सफल होगा, जब बीच-बीच में इसकी समीक्षा होती रहे। आज भी देश में बहुत लोग पिछड़े हुए हैं, उन्हें आरक्षण से जोड़ने की जरूरत है। जो मानक पहले तय किए गए थे, वो तत्कालीन परिस्थितियों पर आधारित थे, अब उन आधारों और नीतियों का वर्तमान की परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए विस्तार से आकलन करके पुनर्निर्धारण किया जाना चाहिए। आरक्षण का आधार सही है या नहीं इस पर गंभीरता से और विवेकपूर्ण विचार करने की जरूरत है। इसके लिए हमारी सरकारों को गंभीरता से चिंतन करना होगा।

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