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प्रो. हवा सिंह का लेख : कृषि क्षेत्र में हो व्यापक सुधार

आज पंजाब, हरियाणा तथा पश्चिम उत्तर प्रदेश के किसानों को सोचना पड़ेगा कि वे किस तरह गेहूं व धान की खेती को कम करके अन्य फसलें जैसे दालें, सब्जियों, फलों की खेती करें और इसके साथ-साथ खेती से जुड़े हुए अन्य धन्धे जैसे पोल्ट्री फ़ार्म, मछली पालन व पशुपालन इत्यादि को बढ़ावा दें। सरकार को चाहिए कि ऐसे धन्धों में किसान को वित्तीय सहायता प्रदान करे। आर्गेनिक फसलों को प्रोत्साहन दिया जाए जिससे कि गुणवत्ता के कारण ऊंचे दाम भी मिलेंगे तथा निर्यात भी बढ़ेगा और भंडारण की समस्या भी ख़त्म होगी। फ़ूड प्रोसेसिंग इंडस्ट्री को बढ़ावा दिया जाए तथा खाद्य वस्तुओं का निर्यात बढ़ाया जाए और खाद्य वितरण प्रणाली में रेडिकल परिवर्तन किए जाएं।

प्रो. हवा सिंह का लेख : कृषि क्षेत्र में हो व्यापक सुधार
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प्रो. हवा सिंह

नए कृषि कानूनों को लेकर पंजाब, हरियाणा और अन्य राज्यों के हजारों की संख्या में किसान दिल्ली बॉर्डर पर कड़ाके की ठंड के बीच कानूनों को वापस लेने की मांग कर रहे हैं। सरकार की मंशा है कि इन नए कानूनों से भारतीय कृषि क्षेत्र के उत्पादन, ख़रीद, मार्केटिंग, क़ीमत भंडारण और भूमि स्वामित्व में अमूलचूल परिवर्तन आएंगे और किसान के आर्थिक सुधार में ऐतिहासिक कदम साबित होंगे। इन कानूनों का असर किसानों की रोजी- रोटी पर ही नहीं कुछ सीमा तक संभावित असर बटाई पर खेती करने वाले तथा कृषि मज़दूरों पर भी पड़ेगा। कृषि कानूनों का पक्ष तथा विरोध बहस का बड़ा मुद्दा बन गया है।

कृषि उपज, व्यापार एवं वाणिज्य (संवर्धन एंव सरलीकरण) अधिनियम 2020 किसानों को अपनी उपज देश व विदेशों में किसी भी कोने में बेचने की आज़ादी देता है। मंडी में लगने वाली फीस, कर और आढ़तियों व बिचौलियों से छुटकारा मिलेगा। किसान अपनी फसल के उचित दाम लेने के लिए सरकारी व प्राइवेट मंडी में सीधे किसी को बेच सकता है। इससे उसे उचित दाम लेने का मौका मिलेगा। खेती के आधारभूत ढांचे में निजी निवेश आएगा और नए रोजगार के अवसर पैदा होंगे। किसान संघों का मत है कि कंपनी थोक विक्रेता, निर्यातक व साहूकार बिना लाइसेंस, फीस और कर के प्राइवेट मंडियों से सीधे अनाज खरीद सकेंगे। धीरे-धीरे मंडी व एमएसपी प्रणाली खत्म हो जाएंगी, क्योंकि कुछ वर्षों तक कंपनी एमएसपी से ज़्यादा दाम देकर अनाज ख़रीदेगी और दूसरी तरफ सरकार खरीद बंद करना शुरू कर देगी। छोटे व मंझोले किसानों को अपनी उपज औने-पौने दाम पर बेचनी पड़ेगी। बिहार सरकार ने 2006 में एपीएमसी एक्ट खत्म कर दिया था। बिहार के किसान को मक्का व धान की फसल न्यूनतम समर्थन मूल्य से 30-40 प्रतिशत कम दाम पर बेचने के लिये मजबूर होना पड़ा। कृषक (सशक्ति एवं सरंक्षण) क़ीमत आश्वासन और कृषि क़रार अधिनियम 2020 के तहत किसान फ़सल की बुआई से पूर्व या उत्पादन के बाद किसी व्यापारी, कंपनी व निर्यातक के साथ अनुबंध कर सकेगा। किसानों को उन्नत बीज, खाद, कृषि उपकरण और आधुनिक तकनीक उपलब्ध होगी।

नीति आयोग का मत है कि छोटी खेती गैरलाभकारी है। बिग फ़ार्मिंग से किसानों को लाभ होगा। कंपनी और किसान का अनुबंध के संबंध में कोई विवाद होता है तो उसका निपटारा जिला सत्र के अधिकारी व कैंसिलेशन बोर्ड में 60 दिन के भीतर हो जाएगा। किसान संगठनों का मत है कि अनुबंध खेती का प्रभाव अपनी भूमि पर खेती करने वालों पर ही नहीं बल्कि बटाई व रेहन पर खेती करने वालों के साथ जुड़े मज़दूरों पर भी पड़ेगा। 2011 की जनगणना के अनुसार 49.40 करोड़ भूमिहीन व्यक्ति थे तथा 1.2 करोड़ किसान बटाई की खेती करते थे। उन की रोज़ी रोटी भी प्रत्यक्ष या अप्रत्य़क्ष रूप से प्रभावित होगी। ग्रामीण क्षेत्र में बड़ी संख्या में लोग बेरोज़गार हो जाएंगे। आवश्यक वस्तु संशोधन अधिनियम 2020 के तहत उत्पादों को प्राप्ति, भंडारण व वितरण करने की स्वतंत्रता से बड़े किसान तथा व्यापारियों को लाभ होगा। इन कानूनों से ग्रामीण क्षेत्रों में वेयर हाउस, कोल्ड स्टोरेज, खाद्य प्रसंस्करण इत्यादि उद्योग आने से रोज़गार के अवसर बढ़ेंगे। छोटा किसान अपनी फ़सल को दूसरे स्थान पर बेचने व भंडारण करने में असमर्थ है। सीज़न के समय कार्पोरेट और थोक व्यापारी सस्ते दामों पर आनाज़ ख़रीदेंगे व स्टोर कर लेंगे। भारतीय खाद्य निगम ख़रीद करना बंद कर देगी और जन विरतण प्रणाली खत्म होना शुरू हो जाएगी। 80 करोड़ जनसंख्या की रोज़ी- रोटी की गारंटी ख़तरे में पड़ जाएगी। सरकार व आंदोलित किसानों को यथार्थ समझना पड़ेगा। 1980 तक ग्रामीण क्षेत्रों में ग़रीबी की दर में कमी आई। 1990 में व्यापार व औद्योगिक क्षेत्रों में निजीकरण, उदारीकरण व वैश्वीकरण शुरू हुआ, परंतु कृषि क्षेत्र उससे अछूता रहा। पंजाब में 1960-1962 में गेहूं व धान की फ़सल 27.3 व 2.5 लाख हेक्टेयर पर उगाई जाती थी जो 2018 -2019 में बढ़कर 43.1 व 39.6 लाख हेक्टेयर हो गई। पंजाब मे दालें 1960 -1961 में 19.4 लाख हेक्टेयर में बुवाई होती थी जो घटकर 2018-2019 में 0.4 लाख हेक्टेयर रह गई।

हरियाणा की स्थिति भी लगभग ऐसी ही है। इसका मुख्य कारण गेहूं व धान पर एश्योर्ड न्यूनतम समर्थन मूल्य मिलता रहा, जबकि दूसरी फसलों पर किसानों को न्यूनतम समर्थन मूल्य नहीं मिल पाया। न्यूनतम समर्थन मूल्य केवल 7 % किसानों को मिल रहा है। पंजाब व हरियाणा में 90% गेहूं व धान की फ़सल न्यूनतम समर्थन मूल्य पर ख़रीदी जाती है। पंजाब व हरियाणा की मंडी व्यवस्था विश्व भर में सबसे अच्छी है। इसका मुख्य कारण भारत में सबसे पहले 1907 में लैंड क्लोनाइजे़शन एक्ट के विरुद्ध सरदार अजीत सिंह की अगुवाई में किसान आंदोलन हुआ और उनको देश निकाला की सज़ा दी गई। 1924 से 1945 तक यूनियनिस्ट पार्टी पंजाब में सत्ता में रही और चौधरी छोटूराम की अगुआई में कई कृषि क़ानून बनाए गए और उनके फलस्वरूप पंजाब के किसानों की आर्थिक दशा में बड़ा सुधार हुआ। आज पंजाब, हरियाणा तथा पश्चिम उत्तर प्रदेश के किसानों को सोचना पड़ेगा कि वे किस तरह गेहूं व धान की खेती को कम करके अन्य फ़सलें जैसे दालें, सब्जियों, फलों की खेती करें और इसके साथ साथ खेती से जुड़े हुए अन्य धन्धे जैसे पोल्ट्री फ़ार्म, मछली पालन व पशुपालन इत्यादि को बढ़ावा दें।

सरकार को चाहिए कि ऐसे धन्धों में किसान को वित्तीय सहायता प्रदान करे। आर्गेनिक फसलों को प्रोत्साहन दिया जाए जिससे कि गुणवत्ता के कारण ऊंचे दाम भी मिलेंगे तथा निर्यात भी बढ़ेगा और भंडारण की समस्या भी ख़त्म होगी। फ़ूड प्रोसेसिंग इंडस्ट्री को बढ़ावा दिया जाए तथा खाद्य वस्तुओं का निर्यात बढ़ाया जाए और खाद्य वितरण प्रणाली में रेडिकल परिवर्तन किए जाएं। कुछ विशेष मुद्दों जैसे कंपनी व थोक व्यापारियों को न्यूनतम मूल्य पर फ़सल ख़रीदने और इसका उल्लंघन करने पर सजा का प्रावधान करना। विवाद सुलझाने की व्यवस्था को और मज़बूत करना, जिससे छोटे किसानों के अधिकारों की सुरक्षा हो सके। एफसीआई तथा मंडी में भ्रष्टाचार को कम करने के लिए ठोस क़दम उठाना। न्यूनतम समर्थन मूल्य की गारंटी देना इत्यादि। किसानों व कृषिक्षेत्र की समस्या का हल जल्दी से जल्दी निकाला जाना चाहिए। इस आंदोलन को कुचलने से देश को गंभीर परिणाम का सामना करना पड़ सकता है।

(ये लेखक के अपने विचार हैं।)

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