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राजीव गुप्ता का लेख : पूरा देश हुआ राममय

भगवान राम राष्ट्रीय चेतना के प्राण तत्व हैं सिर्फ हिन्दुओं के ही नही अपितु संपूर्ण मानवता की प्राण चेतना हैं। भगवान राम ने अपने जीवन में हमेशा समाज को जोड़ने का कार्य किया है तथा सामाजिक समरसता को चरितार्थ कर दिखाया है। श्रीराम जन्मभूमि मंदिर निर्माण शुभारंभ से पहले अयोध्या समेत पूरा देश राममय हो चुका है। कोरोना महामारी के मध्य दिवाली से पहले एक और दिवाली मनाने के लिए देश तैयार है।

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राम मंदिर निर्माण

राजीव गुप्ता

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा 5 अगस्त को श्रीराम जन्मभूमि मंदिर निर्माण का शुभारंभ करने के साथ ही लभगग 500 वर्षों के लंबे संघर्ष पर विराम लग जाएगा। साथ ही स्वतंत्रता आंदोलन के बाद स्वतंत्र भारत में चलने वाले सबसे लंबे संघर्ष की इतिश्री हो जाएगी। इस बहुप्रतीक्षित अवसर पर अयोध्या समेत पूरा देश राममय हो चुका है। कोरोना महामारी के मध्य दिवाली से पहले एक और दिवाली मनाने के लिए देश तैयार है, हालांकि केंद्र, राज्य सरकारों के निर्देशों का पालन करते हुए दिवाली जैसा त्योहार मनाया जाएगा। श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र के महामंत्री चंपत राय के अनुसार कोरोना के कारण श्रीराम जन्मभूमि तीर्थक्षेत्र द्वारा सीमित संख्या में प्रमुख लोगों को इस भव्य और ऐतिहासिक कार्यक्रम में आमंत्रित किया गया है। तथापि सिख, बौद्ध, जैन, आर्य समाजी, वैष्ण्ण संप्रदाय इत्यादि समेत 36 अध्यात्मिक परंपराओं के 135 संतों को निमंत्रण भेजा गया है अर्थात भारतवर्ष के भूगोल के सभी हिस्सों को स्पर्श किया गया है तथा नेपाल के जनकपुर के जानकी मंदिर के महंत जी भी इस कार्यक्रम में आएंगे। साथ ही मानसरोवर और लुप्त हुई सरस्वती नदी के जल सहित भारत की सभी नदियों का जल लाया गया है। गंगासागर, पुरी, सोमनाथ, रामेश्वरम, श्रीलंका के समुद्र का भी जल आया है। कार्यक्रम में बाबरी ढांचे के प्रमुख पैरोकार रहे हासिम अंसारी के सुपुत्र इकबाल अंसारी और अयोध्या के ही निवासी पद्मश्री प्राप्त किए हुए मो. शरीफ, जिन्होंने अब तक दस हजार लावारिस लाशों का अंतिम संस्कार किया है, उन्हें भी आमंत्रित किया है। लखनऊ की चांदनी शाह बानो नामक एक मुस्लिम महिला ने भगवान रामलला को राखी भेजी है, जिसे स्वीकार किया गया है। श्री राम जन्मभूमि तीर्थक्षेत्र न्यास ने विशाल हृदय का परिचय देते हुए सांप्रादायिक सौहार्द का अनुकरणीय उदाहरण प्रस्तुत किया है।

भगवान राम राष्ट्रीय चेतना के प्राण तत्व हैं सिर्फ हिन्दुओं के ही नही अपितु संपूर्ण मानवता की प्राण चेतना हैं। भगवान राम ने अपने जीवन में हमेशा समाज को जोड़ने का कार्य किया है तथा सामाजिक समरसता को चरितार्थ कर दिखाया है। उन्होंने निषादराज को अपने गले लगाया, शबरी के झूठे बेर खाए, जटायु का अंतिम संस्कार किया अर्थात्ा समाज के सभी वर्गों को उन्होंने अपनाया, सम्मान दिया। श्रीराम जन्मभूमि आन्दोलन के केंद्र में भी सामाजिक समरसता की परिकलप्ना प्रारंभ से ही रही है। 9-10 नवंबर 1989 को अयोध्या में जन्मभूमि मंदिर के शिलान्यास कार्यक्रम में पहली ईंट अनुसूचित जाति समाज से संबंध रखने वाले कामेश्वर चौपाल द्वारा रखवाया गया था और वर्तमान समय में भी उन्हीं कामेश्वर चौपाल को श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र का न्यासी भी बनाया गया है। यह सर्वविदित है कि श्रीराम जन्मभूमि आंदोलन का संघर्ष इतना सरल नहीं था अपितु इसकी बहुत कठिन डगर थी। वैसे तो श्रीराम जन्मभूमि को मुक्त करवाने के लिए संघर्ष तो मीर बाकी द्वारा श्रीराम जन्मभूमि मंदिर के स्तंभों के ऊपर एक मस्जिद बनवाने के साथ ही शुरू हो गया था। विभिन्न ऐतिहासिक तथ्यों में 1528 से 1934 के मध्य लगभग 75 संघर्षों का वर्णन आता है। जब भारत अंग्रेजों के पराधीन था तब 1934 में हुए एक संघर्ष के दौरान सजा के तौर पर हिंदुओं को 84,000 रुपये का हर्जाना तत्कालीन सरकारी कोष में जमा करवाने की चर्चा भी इतिहास के पन्नों में अंकित है । 22-23 दिसंबर 1949 की मध्यरात्रि में चमत्कार होने के साथ ही श्रीराम लला स्वत: प्रकट हो गए, ऐसा बयान भी तत्कालीन जिलाधिकारी के समक्ष श्रीराम जन्मभूमि की पुलिस चौकी पर तैनात तत्कालीन हवलदार अब्दुल बरकत द्वारा दर्ज करवाया गया था।

7-8 अप्रैल, 1984 को विश्व हिंदू परिषद द्वारा दिल्ली के विज्ञान भवन में धर्म संसद बुलाई गई थी, जिसमें अयोध्या-मथुरा की जन्मभूमि और काशी में विश्वनाथ मंदिर की भूमि को मुक्त कराने का संकल्प लिया गया था। इस संकल्प के साथ ही महंत अवैद्यनाथ महाराज जी की अध्यक्षता में जन्मभूमि मुक्ति यज्ञ समिति का गठन हुआ। अक्टूबर- नवम्बर 1985 की धर्म संसद में ताला खुलवाने का आह्वान किया गया और फरवरी 1986 में जिला जज ने ताला खोलने का निर्णय दे दिया। मार्च 1987 से जन्मभूमि मुक्ति के लिए आक्रमक शुरूआत की गई। नवम्बर 1989 को अयोध्या में श्रीराम जन्मभूमि मंदिर का शिलान्यास किया गया और वहीं से 30 अक्टूबर 1990 को अयोध्या में कारसेवा करने की घोषणा कर दी गई। 1990 में जब लालकृष्ण आडवाणी सोमनाथ से अपना रथ लेकर अयोध्या के लिए निकले तो जहां-जहां से वह रामरथ निकला, उसके साथ हजारों रामभक्त जुड़ते गए परंतु यह बहुत कम लोगों को ज्ञात होगा कि अपने भाषण शैली से लाखों लोगों को सम्मोहित कर लेने वाले नरेन्द्र मोदी ने उस दौरान एक भी भाषण नहीं दिया। वे पर्दे के पीछे रहकर उस रामरथ यात्रा की पूरी योजना बनाते रहे। जब आडवाणी का रामरथ बिहार के समस्तीपुर में पहुंचा तो सांप्रादायिक सौहार्द का उदाहरण देते हुए तत्कालीन मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव ने रथ को रोक दिया परंतु कारसेवक पैदल ही अयोध्या के लिए निकल पड़े।

कानून-व्यवस्था का हवाला देते हुए उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव ने कारसेवकों पर गोली चलवा दी जिसमें दो दर्जन से अधिक कारसेवक शहीद हो गए। हिन्दुओं में जनाक्रोश बढ़ गया और 1991 में मुलायम सिंह यादव की सरकार गिर गई। भारतीय जनता पार्टी के कल्याण सिंह उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने। 1992 में फिर अयोध्या में कारसेवा हुई और लाखों कारसेवक पहुंच गए। अंतत: 6 दिसम्बर, 1992 को बाबरी ढांचे को कारसेवकों ने गिरा दिया। उसके बाद कल्याण सिंह ने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया। तत्पश्चात राजनीतिक उठापटक अधिकाधिक शुरू हो गई और इन सभी राजनीतिक संघर्षों से जूझते हुए 2014 में नरेन्द्र मोदी की अगुआई में केन्द्र में भाजपा की सरकार बनी और 2017 में उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ की अगुआई में भाजपा की सरकार बनी तबसे हिन्दुओं में श्रीराम जन्मभूमि मंदिर बनने की आस पुन: जगी और 2019 में भारत की सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय से श्रीराम जन्मभूमि मंदिर के निर्माण का रास्ता प्रशस्त हुआ। 5 अगस्त की वह शुभ घड़ी आ गई है जब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी अयोध्या में श्रीराम जन्मभूमि मन्दिर के भव्य निर्माण के कार्य का शुभारंभ करेंगे। इस प्रकार राम मंदिर के निर्माण की कहानी का इतिहास बहुत संघर्षशील एवं रोचक है। साथ ही श्रीराम जन्मभूमि तीर्थक्षेत्र न्यास ने भारतीय संस्कृति के उत्कृष्ट चिन्तन और उदघोष वसुधैव कुटुंबकं और सर्वधर्म समभाव का एक उदाहरण प्रस्तुत किया है।

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