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ब्रिटेन के विभाजन का संकट फिलहाल टलते ही कैमरन की मुश्किलें हुईं शांत

वर्ष 1801 के कानून के तहत इंग्लैंड, स्कॉटलैंड, वेल्स और उत्तरी आयरलैंड मिलकर यूके बना।

ब्रिटेन के विभाजन का संकट फिलहाल टलते ही कैमरन की मुश्किलें हुईं शांत
यूनाइटेड किंगडम (यूके) के अखंड इतिहास के लिए 19 सितंबर बेहद ऐतिहासिक दिन है। यूके की एकता को लेकर चिंतित ब्रिटेन के पीएम डेविड कैमरन के लिए भी और ब्रिटिश महारानी एलिजाबेथ के लिए भी। इस दिन 55 फीसदी स्कॉटिश जनता ने आजादी के लिए किए गए जनमत संग्रह में यूके के साथ ही रहने का फैसला किया। अब स्कॉटलैंड अलग नहीं होगा। उसका यूके से 307 साल पुराना रिश्ता बना रहेगा। 1707 में स्कॉटलैंड ग्रेट ब्रिटेन का हिस्सा बना था। इंग्लैंड और स्कॉटलैंड मिलकर ग्रेट ब्रिटेन बना था, वर्ष 1801 के कानून के तहत इंग्लैंड, स्कॉटलैंड, वेल्स और उत्तरी आयरलैंड मिलकर यूके बना। स्कॉटलैंड की 32 काउंसिल में से 28 ने आजादी के खिलाफ ‘ना’ के लिए वोट किया, जबकि केवल चार परिषद- ग्लासगो, डंडी सिटी, वेस्ट डनबर्टनशायर और नार्थ लनार्कशायर के लोगों ने आजादी के पक्ष में ‘हां’ के लिए वोट किया। कुल वोट में से 15 लाख 12 हजार लोगों ने अलग स्कॉटलैंड के पक्ष में वोट दिया, जबकि 18 लाख 77 हजार लोगों ने यूके के साथ रहने के लिए वोट दिया। स्कॉटलैंड यूके में रहे, इसके लिए 18 लाख 52 हजार वोटों की जरूरत थी। इस जनमत संग्रह के नतीजे पर गौर करें तो फौरी तौर पर ब्रिटिश सरकार के लिए राहत की बात लगती है कि उसका एक अंग अलग नहीं हुआ और दुनिया में 210वां नया देश नहीं बना, लेकिन काउंसिल वाइज इसके नतीजे को देखें, तो ‘हां’ वाले चार के अलावा 13 ऐसे काउंसिल हैं, जिनमें आजादी के पक्ष में और विरोध में पड़े वोट प्रतिशत में अधिक अंतर नहीं है। केवल तीन से आठ प्रतिशत का अंतर है। कुल वोटिंग में भी केवल तीन लाख 40 हजार वोट का ही अंतर है। कहने का तात्पर्य यह कि ब्रिटिश सरकार के लिए संकट केवल टला है, लेकिन खत्म नहीं हुआ है। आगे आजादी की आग कभी भी सुलग सकती है, क्योंकि यह आग 50 साल से राख में दबी है। ब्रिटिश सरकार के लिए दूसरी चिंता की बात है कि आखिर जनमत संग्रह की नौबत क्यों आई? तो वजह साफ है कैमरन सरकार के प्रति घोर असंतोष। यह अचानक नहीं बढ़ा है, बल्कि 35 सालों तक चले इंग्लैंड की आयरन लेडी व पूर्व पीएम माग्रेट थैचर युग, पूर्व ब्रिटिश पीएम टॉनी ब्लेयर काल में बदले न्यू लेबर व अब डेविड कैमरन के नेतृत्व वाली कंजर्वेटिव पार्टी की सरकार की नवउदारवादी आर्थिक नीतियों में लगातार स्कॉटिश मूल्यों को नजरअंदाज करने का नतीजा है। इससे स्कॉट लोगों को अपनी अर्थव्यवस्था और समाज के बारे में फिक्र होने लगी। स्कॉटलैंड इस बात से परेशान है कि कैमरन सरकार दवाइयों तक का निजीकरण करना चाहती है, जबकि ब्रिटिश सरकार को औद्योगिक शहर ग्लासगो वाले स्कॉटलैंड से ही सबसे अधिक आय होती है। अब अगर ब्रिटिश सरकार चाहती है कि स्कॉटिश जनता आजादी की मांग नहीं करे तो उसे उनकी शिकायतें दूर करनी होगी। अगर स्कॉटलैंड अलग हो गया होता तो यूके में डेविड केमरन के इस्तीफे की मांग उठती, एलिजाबेथ के अधिकारों में कटौती होती, दुनिया में अलग होने के लिए कई जनमत संग्रह की मांग उठती और भारत पर भी कश्मीर में जनमत संग्रह की मांग उठती।
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