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डाॅ. एल. एस. यादव का लेख : कोरोना का सच सामने आना जरूरी

चीन की पीएलए के दस्तावेजों में दर्शाया गया है कि जैव हथियार के हमले से दुश्मन के चिकित्सा तंत्र को ध्वस्त किया जा सकता है। दस्तावेजों में अमेरिकी वायु सेना के कर्नल माइकन जे, के कार्यों का भी उल्लेख किया गया है, जिन्होंने इस बात की आशंका जताई थी कि तीसरा विश्व युद्ध जैविक हथियारों से लड़ा जा सकता है। दस्तावेजों में इस बात का भी उल्लेख है कि चीन में वर्ष 2003 में फैला सार्स एक मानव निर्मित जैव हथियार हो सकता है, जिसे आतंकियों ने जानकर फैलाया हो। सांसद टाॅम टगेनघट और आस्ट्रेलियाई राजनेता जेम्स ने कहा कि इन दस्तावेजों ने कोविड-19 की उत्पत्ति के बारे में चीन की पारदर्शिता को लेकर चिन्ता पैदा कर दी है।

डाॅ. एल. एस. यादव का लेख : कोरोना का सच सामने आना जरूरी
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डॉ. एल. एस. यादव

डाॅ. एल. एस. यादव

पिछले कुछ समय से कोरोना वायरस की उत्पत्ति को लेकर चीन दुनिया के निशाने पर है। यह वायरस कैसे पैदा हुआ और किस तरह से इसने पूरी दुनिया का अपनी चपेट में लिया, इसे लेकर अलग-अलग दावे किए गए, परंतु अब एक नए अध्ययन में यह सामने आया है कि चीन के वैज्ञानिकों ने वुहान इंस्टीट्यूट आॅफ वायरोलाॅजी में कोविड-19 के वायरस को तैयार किया था। डेली मेल की खबर के मुताबिक ब्रिटेन के प्रोफेसर एंगस डल्गलिश और नार्वे के वैज्ञानिक डाॅ. विर्गर सोरेनसेन ने दावा किया है कि उनके पास एक साल से भी अधिक वक्त से चीन में वायरस के रेट्रो इंजीनियरिंग के सबूत हैं। प्रोफेसर डल्गलिश लंदन में सेंट जार्ज यूनिवर्सिटी में कैंसर विज्ञान के प्रोफेसर हैं। वहीं डाॅ. सोरेनसेन एक वायरोलाॅजिस्ट और इम्यूनोर कंपनी के अध्यक्ष हैं। उनकी कंपनी कारोना की वैक्सीन तैयार करने में जुटी है।

अमेरिका तथा कुछ पश्चिमी देशों ने नए साक्ष्यों के आधार पर कोरोना वायरस की उत्पत्ति को लेकर चीन को घेरना शुरू कर दिया है। अमेरिकी खुफिया एजेंसियों की ताजा रिपोर्ट ने इस बात की आशंका को और अधिक मजबूत किया है कि चीन के वुहान स्थित वायारोलाॅजी प्रयोगशाला में ही कोरोना वायरस की उत्पत्ति हुई थी। वाॅल स्ट्रीट जर्नल अखबार ने 23 मई को अमेरिकी खुफिया रिपोर्ट के हवाले से यह उजागर किया कि वुहान स्थित वायारोलाॅजी लैब के तीन शोधकर्ता नवम्बर 2019 में बीमार पड़े थे और इसके एक महीने बाद चीन में कोरोना के पहले मामले की पुष्टि की गई थी, इसीलिए मशहूर अमेरिकी विशेषज्ञ डाॅ. एंथोनी फासी ने वायरस के मानवनिर्मित होने के तथ्य को मजबूत मानते हुए इसकी ज्यादा खोजबीन करने की बात कही है। अमेरिकी षिक्षा मंत्री जेवियर बेसेरा ने विश्व स्वास्थ्य संगठन की मंत्री स्तरीय बैठक में यह मांग उठाई है कि इसकी पारदर्शी एवं वैज्ञानिक आधार पर नए सिरे से जांच होनी चाहिए। आगे क्या होगा यह भविष्य में पता चलेगा।

मई 2021 के दूसरे सप्ताह में यह बात चर्चा का विषय बन गई कि 6 साल पुराने दस्तावेजों के मुताबिक चीनी वैज्ञानिक कोरोना वायरस की मदद से जैविक हथियार तैयार करने पर काम कर रहे थे जिससे तीसरा विश्व युद्ध लड़ा जा सके। अमेरिकी अधिकारियों को मिले इस दस्तावेज में 6 साल से जैव और जेनेटिक हथियार तैयार करने की बात कही गई है। अमेरिकी विदेश विभाग को प्राप्त दस्तावेजों के आधार पर यह दावा किया गया कि युद्ध में विजय हासिल करने के लिए जैविक हथियार मुख्य भूमिका निभाएंगे। इसमें उनके प्रयोग का सही समय भी बताया गया है और शत्रु के चिकित्सा तंत्र पर इसके असर की चर्चा भी की गई है। इन दस्तावेजों को लेकर सबसे पहले आस्ट्रेलिया के समाचार पत्र 'द आस्ट्रेलियन' में एक रिपोर्ट प्रकाशित हुई थी जिसे बाद में ब्रिटेन के समाचार पत्र 'द सन' ने भी प्रकाशित किया। अमेरिकी विदेश विभाग के हाथ लगे दस्तावेज दर्शाते हैं कि चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (पीएलए) के कमांडर जैव हथियारों को लेकर घातक पूर्वानुमान लगा रहे थे। दस्तावेजों के मुताबिक वर्ष 2015 में ये उन सैन्य वैज्ञानिकों एवं वरिष्ठ चीनी स्वास्थ्य अधिकारियों द्वारा लिखे गए थे जो कोविड-19 की उत्पत्ति के संबंध में जांच कर रहे थे। चीन के इस शोध पत्र का शीर्षक है 'सार्स और जैविक हथियार के रूप में मानव निर्मित अन्य वायरसों की प्रजातियों की अप्राकृतिक उत्पत्ति।' चीनी वैज्ञानिकों ने सार्स कोरोना वायरस का जैविक हथियार के नए युग के तौर पर उल्लेख किया था, कोविड जिसका एक उदाहरण है।

चीन की पीएलए के दस्तावेजों में दर्शाया गया है कि जैव हथियार के हमले से दुश्मन के चिकित्सा तंत्र को ध्वस्त किया जा सकता है। दस्तावेजों में अमेरिकी वायु सेना के कर्नल माइकन जे, के कार्यों का भी उल्लेख किया गया है, जिन्होंने इस बात की आशंका जताई थी कि तीसरा विश्व युद्ध जैविक हथियारों से लड़ा जा सकता है। दस्तावेजों में इस बात का भी उल्लेख है कि चीन में वर्ष 2003 में फैला सार्स एक मानव निर्मित जैव हथियार हो सकता है, जिसे आतंकियों ने जानबूझकर फैलाया हो। सांसद टाॅम टगेनघट और आस्ट्रेलियाई राजनेता जेम्स पेटरसन ने कहा कि इन दस्तावेजों ने कोविड-19 की उत्पत्ति के बारे में चीन की पारदर्शिता को लेकर चिन्ता पैदा कर दी है। अमेरिकी विश्लेषकों के मुताबिक कम से कम 18 वैज्ञानिक हाई रिस्क लैब में काम कर रहे थे। जिनका कहना था कि जैसे दूसरे विश्व युद्ध में परमाणु बम ने विजय दिलवाई थी उसी तरह तीसरे विश्व युद्ध में जैव हथियार विजय दिलाएंगे।

अमेरिकी विषेशज्ञों का कहना है कि इस रिपोर्ट के आने के बाद इस बात को लेकर सवाल और चिन्ता दोनों उत्पन्न हो गए हैं कि चीन ने आखिर किस उद्दे्श्य से ऐसा किया इन विशेषज्ञों का कहना है कि अधिक नियंत्रण के बावजूद ऐसे हथियार अत्यधिक घातक सिद्ध हो सकते हैं। आॅस्ट्रेलियन स्ट्रेटजिक पाॅलिसी इंस्टिटयूट के एक्जिक्यूटिव डायरेक्टर पीटर जेनिंग्स के मुताबिक ऐसे हथियार भले ही आत्मरक्षा के लिए तैयार किए गए हों, लेकिन इनके इस्तेमाल का निर्णय वैज्ञानिकों के हाथ में नहीं होगा। कोरोना वायरस को जैविक हथियार की तरह विकसित करने की तैयारी के आरोपों पर चीन ने सफाई भी है। चीन ने दावों को झूठा बताते हुए कहा है कि यह कदम उसकी छवि को खराब करने की अमेरिकी कोशिश है। चीन की विदेश मंत्रालय की प्रवक्ता हुआ चनयिंग ने कहा कि मैंने रिपोर्ट देखी है। कुछ लोग चीन को बदनाम करने प्रयास कर रहे हैं, लेकिन इतना तो स्पष्ट है कि तथ्यों को गलत तरीके से प्रस्तुत किया जा रहा है। ऐतिहासिक रूप से देखा जाए तो जैविक हथियारों के खतरे का आभास 1925 में ही हो गया था और इन हथियारों के विकास व इस्तेमाल पर रोक के लिए विश्व स्तर पर अनेक सम्मेलन हुए, लेकिन कोई विशेष सफलता नहीं मिली और इसके इस्तेमाल के मामले सामने आते रहे। फिर 1972 में बायोलाॅजिकल वेपन कन्वेंशन की स्थापना हुई और 26 मार्च 1975 को 22 देशों ने इसकी सदस्यता ली। इसके बावजूद इस अभियान में अधिक सफलता नहीं मिली।

1980 के दशक में इराक ने मस्टर्ड गैस, सरिन और ताबुन का इस्तेमाल ईरान के खिलाफ किया। इसके बाद टोक्यो सबवे सिस्टम में सरिन नर्व गैस हमले ने हजारों लोगों को घायल कर दिया और बड़ी संख्या में लोग मृत्यु को प्राप्त हुए। सोवियत संघ के विघटन के बाद जब शीत युद्ध की समाप्ति हुई तो ऐसे हथियारों के प्रयाग में कमी आई लेकिन 9/11 के हमले के बाद एक बार फिर जैविक हथियरों के इस्तेमाल की आहट सुनाई दी और यह थी एंथ्रेक्स पाउडर के साथ पत्रों की। वर्ष 2002 में अमेरिका इसका शिकार बना जब एंथ्रेक्स नामक बैक्टिीरिया वाले पत्र लोगों को संक्रमित करने लगे थे। अब मौजूदा समय में पूरी दुनिया कोरोना महामारी से संघर्ष कर रही है जिसकी शुरुआत वर्ष 2019 के अन्त में चीन के वुहान से हुई थी।

(ये लेखक के अपने विचार हैं।)

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