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प्रो. पी.के. आर्य का लेख : कुम्भ के पीछे वैज्ञानिक अवधारणा

भारतीय पौराणिक ग्रंथ कुम्भ मेले के महत्व और इसके वर्णनों से भरे पड़े हैं। समुद्र मंथन के दौरान समुद्र से निकली अनेक मूल्यवान वस्तुओं में एक अमृत कलश भी था। जिसे पाने की होड़ में छिड़े संघर्ष में कलश से अमृत की कुछ बूंदें छिटककर पृथ्वी पर चार स्थानों पर गिरीं। कालांतर में इन्हीं स्थानों पर कुम्भ के आयोजन हुए। कुम्भ मेले में स्नान के उल्लेख बौद्ध ग्रंथों में भी मिलते हैं। लगभग 2400 वर्ष पूर्व यूनानी दूत के सम्राट चंद्रगुप्त के दरबार में आने और सिकंदर के गुरु दायोजनीज के कुम्भ मेले में स्नान के वर्णन मिलते हैं। 557 ईस्वी में कुम्भ मेले में अभान नामक अखाड़े के गठन और उनके विशेष स्नान का उल्लेख मिलता है।

प्रो. पी.के. आर्य का लेख : कुम्भ के पीछे वैज्ञानिक अवधारणा
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प्रो. पी.के. आर्य

गीता, गंगा, गाय और ज्ञान ये चार स्तम्भ भारतीय संस्कृति और धर्म के मूलाधार हैं। वैश्विक परिदृश्य में संघर्षरत मानव मन को थकान और उदासी के पड़ावों से पार करने में गीता रूपी नौका सदैव ही सार्थक रही है। शारीरिक विश्राम के उपरांत तन की व्याधियों को निर्मूल करने में गंगा रूपी मां का आंचल सदा ही मनुष्य को सुख और शांति की छाया देता आया है। आर्थिक और सामाजिक उत्थान के लिए गोवंश सृष्टि के आरंभ से ही मनुज का सहचर रहा है; जबकि भारतीय ज्ञान की देशना में सदियों से सोया पड़ा विश्व, सर्वदा ही नए नूतन आयामों को स्पर्श करता रहा है। कुम्भ ऐसा ही एक दिव्य और भव्य समागम है जहां व्यक्ति देह से देवत्व के अनुभवों से दो चार होता है। यह डुबकी है भारतीय धर्म के धरातल की, जहां से मानवीय चोला पुनः पुनः अपने वास्तविक स्वरूप से साक्षात्कार करता है। इस बार का कुम्भ हरिद्वार में 14 जनवरी मकर संक्रांति से प्रारम्भ होकर 27 अप्रैल 2021 को चैत्र पूर्णिमा पर संपन्न होगा।

कुम्भ मेला भारतीय धर्म के इतिहास में चार प्रकारों से संपन्न होता रहा है। पूर्ण कुम्भ (12 वर्ष), अर्द्ध कुम्भ (6 वर्ष ), महाकुम्भ (144 वर्ष ) और सूक्ष्म कुम्भ (एक वर्ष) के अंतराल पर संपन्न होते रहे हैं। जितनी प्राचीन हमारी सभ्यता और संस्कृति है उतना ही प्राचीन कुम्भ का इतिहास है। प्रज्ञा के इस पुरा महोत्सव में भारतीय संस्कृति प्रत्येक डुबकी के उपरान्त और भी दिव्य बनकर उभरी है। गंगा की जल रश्मियों के समीप विश्रामरत रेत के कणों पर पैर पसारकर समय ने नई धार्मिक ऊंचाईयों को आत्मसात किया है। सुदूरवर्ती देशों में निवासित भारतीय धर्मप्रेमियों ने जब यह दृश्य देखा तो देखते ही रह गए। यही वजह है कि लाखों विदेशी पर्यटक कुम्भ के मोहपाश में सदा सर्वदा बंधे और खिंचें चले आये। इस बार कोरोना के चलते कुम्भ अपने नियंत्रित स्वरूप में होगा।

कुम्भ शब्द की उत्पत्ति समस्त भाषाओं की जननी संस्कृत भाषा से हुई है जिसका अभिप्रायः होता है-घट अथवा घड़ा। हिन्दू धर्म के अनेक अवसरों पर पूजन हेतु हम जिस कलश का प्रयोग करते हैं वह भी कुम्भ का ही एक रूप है। भारतीय ज्योतिष में कुम्भ नामक एक राशि भी है जो 11वें स्थान पर आती है। ऋषि प्रजापति ने जब सर्वप्रथम कुम्भ का निर्माण किया, तो इसके स्वरूप को देखकर देवता भी मुग्ध हुए बिना न रह सके। कलश के ऊपरी भाग को भगवान विष्णु, कंठ भाग को भगवान शिव और मध्य भाग को ब्रह्मा ने अपने लिए चुना। मान्यता है कि कलश की स्थापना एवं अर्चना से हम भगवान के इन्हीं तीनों स्वरूपों का ध्यान करते हैं। ऋषि प्रजापति की संतानों को इसी कारण 'कुम्भकार' कहकर सम्बोधित किया गया। संस्कृत में कुम्भ का एक अर्थ मानवीय शरीर भी होता है। सागर, नदियों, जलाशयों पोखर और तालों में जिस प्रकार जीवन पनपता है उसी प्रकार कलश में रखे गए जल में दिव्य शक्तियों का आह्वान विशेष मंत्रोपचार से संभव है। जिस तरह आकाश को वायु और पृथ्वी को सूर्य की किरणें आच्छादित रखती हैं उसी प्रकार मानवीय शरीर भी विविध मांसपेशियों और रुधिर नलिकाओं के जाल से घिरा होता है। मानव शरीर पृथ्वी, अग्नि, जल, वायु और आकाश रूपी पञ्च तत्वों से निर्मित है। जब हम काल की चाल पर उपस्थित विशेष ग्रह नक्षत्रों के संयोग में अपने शरीर को पुनः इन्हीं तत्त्वों के साथ एकाकार करते हैं तब हमारे लिए अखंड आरोग्य के नए द्वार खुलते हैं। कुम्भ में स्नान का महत्त्व इसी तथ्य की ओर इंगित करता है।

भारतीय धर्म की परंपरा में 12 के अंक का अपना एक विशेष महत्व है। 2077 वर्ष पूर्व जब राजा विक्रमादित्य ने दुनिया में सबसे पहले कैलेंडर का निर्माण कराया तब उसमें 12 ही महीनों की व्यवस्था की गई। इसकी वैज्ञानिकता और प्रामाणिकता को देखते हुए बाद में अंग्रेजों ने भी इन्हीं 12 महीनों के आधार पर अपने कैलेंडर का निर्माण किया। इस प्रकार उनका कैलेंडर हमारे कैलेंडर से 56 वर्ष बाद शुरू हुआ। हिन्दू पंचांग की सभी गणनाएं आज भी विक्रमी सम्वत के अनुसार निणि होती हैं। यही नहीं 12 राशियां और घड़ी के बारह घंटे भी भारत ने ही पूरे विश्व को दिए। प्रत्येक बारह वर्ष के अंतराल पर हमारी धरती कुछ विशेष चुंबकीय प्रभावों से गुजरती है। तभी शायद हमारे भारतीय ग्रामीण परिवेश में एक में एक कहावत बहुत प्रचलित है कि 12 साल में तो कूड़े के ढेर के भी भाग्य बदल जाते हैं। प्राच्य विद्याओं के सूत्रों की ओर देखने पर पता चलता है कि आत्मा और शरीर को सूर्य और मन तथा बुद्धि को चन्द्रमा नियंत्रित करते हैं। जबकि गुरु ग्रह समस्त जीवन के कार्यकलापों को सुनिश्चित करने और कर्म की शुद्धता के कारक हैं। ज्योतिष और खगोल विज्ञान के अनुसार प्रत्येक राशि में भ्रमण के लिए गुरु को बारह वर्ष का समय लगता है। हर बारह वर्ष के बाद कुम्भ के आयोजन के पीछे यही वैज्ञानिक अवधारणा है। गुरु ग्रह हर बारह वर्ष के बाद चार अलग अलग राशियों में संचार करते हैं अतः भारत में चार अलग अलग स्थानों पर हर बारहवें वर्ष कुम्भ का आयोजन होता है। ये चार स्थान हैं हरिद्वार, प्रयागराज, उज्जैन और नासिक।

भारतीय पौराणिक ग्रंथ कुम्भ मेले के महत्व और इसके वर्णनों से भरे पड़े हैं। समुद्र मंथन के दौरान समुद्र से निकली अनेक मूल्यवान वस्तुओं में एक अमृत कलश भी था। जिसे पाने की होड़ में छिड़े संघर्ष में कलश से अमृत की कुछ बूंदें छिटककर पृथ्वी पर चार स्थानों पर गिरीं। कालांतर में इन्हीं स्थानों पर कुम्भ के आयोजन हुए। कुम्भ मेले में स्नान के उल्लेख बौद्ध ग्रंथों में भी मिलते हैं। लगभग 2400 वर्ष पूर्व यूनानी दूत के सम्राट चंद्रगुप्त के दरबार में आने और सिकंदर के गुरु दायोजनीज के कुम्भ मेले में स्नान के वर्णन मिलते हैं। 557 ईस्वी में कुम्भ मेले में अभान नामक अखाड़े के गठन और उनके विशेष स्नान का उल्लेख मिलता है । इतिहासकार इसे ही सबसे प्राचीन अखाड़ा मानते हैं। इस समय लगभग 15 अखाड़े प्रतिष्ठित हैं जिनमें शैव, नागा, वैष्णव आदि सभी आते हैं। छठी शताब्दी में सम्राट हर्षवर्धन के कार्यकाल में चीनी यात्री ह्वेनसांग के भारत भ्रमण के दौरान कुम्भ में शामिल होने के तथ्य मिलते हैं।

कुल मिलाकर कुम्भ एक ऐसा अवसर है जब भारत की धरती पर सच्चे मायनों में विविधता में एकता दृष्टिगोचर होती है। जब धार्मिकता की छांव तले मार्मिकता और कार्मिकता अपने उर्चस्व को चूमती हैं। इस बार कुम्भ ही प्रमुख स्नान ( 14 जनवरी मकर संक्रांति, 11 फ़रवरी मौनी अमावस्या, 16 फ़रवरी बसंत पंचमी, 27 फ़रवरी माघी पूर्णिमा, 13 अप्रैल नव सम्वतसर प्रतिपदा, नवरात्र और 21 अप्रैल श्री राम नवमी को होगा, जबकि शाही स्नान 11 मार्च महाशिवरात्रि, 12 अप्रैल सोमवती अमावस्या, 14 अप्रैल मेष संक्रांति और बैशाखी और 27 अप्रैल चैत्र पूर्णिमा को होगा।

(ये लेखक के अपने विचार हैं।)

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