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ममता सरकार की नाकामी का ही नतीजा- चुनाव में हिंसा

कोलकाता में भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के रोड शो के दौरान जिस तरह पथराव, आगजनी और लाठीचार्ज का मंजर हुआ वह रेखांकित करने के लिए पर्याप्त है कि राज्य में कानून-व्यवस्था नाम की कोई चीज नहीं रह गई है। चूंकि संविधान के संघीय ढांचे के तहत कानून-व्यवस्था की पूरी जिम्मेदारी राज्य सरकार की है, लिहाजा ममता सरकार कुतर्कों का हवाला देकर अपनी जिम्मेदारियों से बच नहीं सकती।

ममता सरकार की नाकामी का ही नतीजा- चुनाव में हिंसा

कोलकाता में भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के रोड शो के दौरान जिस तरह पथराव, आगजनी और लाठीचार्ज का मंजर हुआ वह रेखांकित करने के लिए पर्याप्त है कि राज्य में कानून-व्यवस्था नाम की कोई चीज नहीं रह गई है। चूंकि संविधान के संघीय ढांचे के तहत कानून-व्यवस्था की पूरी जिम्मेदारी राज्य सरकार की है, लिहाजा ममता सरकार कुतर्कों का हवाला देकर अपनी जिम्मेदारियों से बच नहीं सकती।

राज्य सरकार की नाकामी का ही नतीजा है कि वह अमित शाह के रोड शो के दौरान कानून-व्यवस्था को दुरुस्त नहीं रख सकी और उसका नतीजा यह हुआ कि अमित शाह जिस वाहन पर सवार थे उस पर भी डंडे फेंके गए। सरकार चाहे जितनी सफाई और दुहाई दे लेकिन यह प्रमाणित होता दिख रहा है कि राजसत्ता विरोधियों के दमन के लिए हर स्तर पर उतर आई है। यह सामान्य नहीं कि विपक्षी दल के नेता और उम्मीदवार अपने क्षेत्र में रोड शो करने जाएं या क्षेत्र के लोगों से मिलने जाएं उस पर सत्ताधारी दल के कार्यकर्ता हमला बोल दें।

यह सरकार की तानाशाही भरे आचरण को ही निरूपित करता है। अब तो ऐसा प्रतीत होने लगा है कि राज्य सरकार विपक्षी दलों के नेताओं को सुरक्षा देने के बजाय अपने कार्यकर्ताओं को उन पर हमला करने की छूट दे रखी है। अमित शाह के रोड शो से इतर जिस तरह घाटल सीट से भाजपा उम्मीदवार और पूर्व आईपीएस अधिकारी भारती घोष पर स्थानीय लोगों ने हमला बोला उसके बाद कहने को कुछ रह नहीं जाता है।

जब ममता बनर्जी 2011 में वामपंथी दलों के साढ़े तीन दशक के शासन को उखाड़ फेंक सत्ता में आई तो उम्मीद थी कि पश्चिम बंगाल में शांति और भाईचारे के बीज प्रस्फुटित होंगे और लोकतंत्र मजबूत होगा, लेकिन यह भ्रम शीघ्र टूट गया। सत्ता पाते ही तृणमूल ने वामदलों की तरह तुष्टीकरण की राह अपना ली और अपने कार्यकर्ताओं को हिंसक कृत्य करने की छूट दे दी। इन हिंसक कार्यकर्ताओं को पुलिस और प्रशासन का संरक्षण भी मिलने लगा।

आंकड़ों पर गौर करें तो 2014 के लोकसभा चुनाव के दौरान भी पश्चिम बंगाल में जमकर हिंसा हुई जिसमें 14 लोगों की जान गई। हजारों लोग बुरी तरह घायल हुए। 1100 से ज्यादा राजनीतिक हिंसा की घटनाएं चुनाव आयोग द्वारा दर्ज की गई। इसी वजह से चुनाव आयोग ने 2016 में राज्य विधानसभा के चुनाव को छह चरणों में कराया। गत वर्ष संपन्न पंचायत चुनाव में भी तृणमूल के कार्यकर्ताओं ने विरोधी दलों के कार्यकर्ताओं को निशाना बनाया।

अतीत में जाएं तो 1960-70 के दशक में जब नक्सल आंदोलन की शुरुआत हुई उसी समय से पश्चिम बंगाल में चुनावी हिंसा का दौर शुरू हुआ। वामपंथी दलों ने चुनाव जीतने के लिए विरोधी दलों के नेताओं और कार्यकर्ताओं की हत्या की राजनीति अपनाई और स्थायी तौर पर इसे जीत का मंत्र बना लिया। आंकड़े बताते हैं कि पश्चिम बंगाल में 1977 से 2018 तक 29 हजार से अधिक राजनीतिक हत्याएं हो चुकी हैं।

ममता बनर्जी और वामपंथी दलों के बीच छत्तीस का आंकड़ा तब तक बना रहा जब तक कि ममता ने वामपंथी दलों को सत्ता से उखाड़ नहीं फेंका। आज की तारीख में ममता की सबसे बड़ी दुश्मन वामपंथी दल नहीं बल्कि भाजपा है। बंगाल की भूमि पर भाजपा के उभार ने ममता को डरा दिया है। हालांकि 2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा को सिर्फ दो सीटें मिली, लेकिन फिर भी ममता भयभीत हैं तो उसका प्रमुख कारण यही है कि आज की तारीख में भाजपा के लिए बंगाल की भूमि उर्वर बन चुकी है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने अपनी रैलियों के जरिए भाजपा के पक्ष में सकारात्मक माहौल निर्मित किया है। इसी चिढ़ की वजह से ममता मर्यादा की लक्ष्मण रेखा को लांघकर प्रधानमंत्री पर तल्ख से तल्ख टिप्पणियां कर रही हैं। ऐसा प्रतीत हो रहा है कि ममता बनर्जी को आमचुनाव में पराजय का अंदेशा हो गया है। यही वजह है कि वह प्रधानमंत्री पर हमला बोल अपने प्रति जनता के बीच सहानुभूति पैदा करने की कोशिश कर रही हैं,

लेकिन उनकी इस राजनीतिक कलाबाजी को देश अच्छी तरह समझ-परख रहा है। गत माह पहले जिस तरह उन्होंने शारदा चिटफंड घोटाले की जांच में सीबीआई का सहयोग करने के बजाए भ्रष्टाचारियों के पक्ष में खुलकर खड़ी हुईं और उनके इशारे पर जिस तरह कोलकाता पुलिस ने सीबीआई अधिकारियों के साथ बदसलूकी की, उससे सहज ही सरकार की निष्पक्षता का अंदाजा लग जाता है।

साथ ही यह भी समझ में आ जाता है कि पश्चिम बंगाल की पुलिस चुनाव में अपना उत्तरदायित्व निभाने के बजाय तृणमूल कांग्रेस के काॅडर के रूप में काम क्यों कर रही है? सरकार का पक्ष क्यों ले रही है और विरोधी दलों पर कहर क्यों बरपा रही है? अब यह अबूझ नहीं रह गया है। सच कहें तो ममता सरकार की यही रीति-नीति ही चुनावों में राजनीतिक और चुनावी हिंसा के लिए जिम्मेदार है।

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